भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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शब्दवर्णन ३६१
राग मालश्री ॥
थिर नहीं रहना है आख़िर मौतनिदान ।
देखत देखत बहुतक बिनशे आवत तुम्हरी बार ।
यतन करौ कोइ नाना विधि के बचै नहीं नरनार ॥
वे योगेश्वर वशकरि मौतै जड़िये वज्र किवाँड़ ।
ह्वै बैठे ज्यों मरना नाहीं माटी ह्वै गये हाड़ ॥
कित गये रावण कुंभकरणसे हरणाकुश शिशुपाल ।
शंकर दियो अमर वर जिनको सोभी खाये काल ॥
यह तन बर्तन कांचकोरे ठत्रक लगे खिलिजाय ।
आज मरै क कोटि वर्षलौं अन्त नहीं ठहराय ॥
बीतत अवधि अलावा आवै छोड़ि जगतकी आस ।
गुरु शुकदेव बतावै तोको समुझु चरणहींदास ॥
क्षणभंगी छलरूप यह तन ऐसारे ।
जाको मौत लगी बहु विधि सों नाना अंग ले बान ।
विष अरु शस्त्र रोग बहुतकहैं और बिघन बहुहान ॥
निश्चय बिनशै बचै न क्योंहीं यत्न किये बहुदान ।
ग्रह नक्षत्र अरु