भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३६५
बहु परिवार देखिकै फूली मूरुख मूढ़ अयानारे ॥
टेढ़ो चलै मरोरत मुच्छैं, बिषयबास लपटानारे ।
आपनको ऊंचो करिजानै मातो मद अभिमानारे ॥
पीर फकीर औलिया योगी रहें न राजा रानारे ।
धरणि अकास सूरशशि नाशैं तेरा क्या उनमानारे ॥
ठाढ़े घातकरैं शिरपै यम ताने तीर कमानारे ।
पलक पैंड़पै तकितकिमारैं काल अचानक बानारे ॥
श्वासनिकसि फटि आंखिजाहिं जब कायाजरै निदानारे ।
तोको बांधि नरक लै जैहैं करिहैं अगिनि तपानारे ॥
अजहूं चेत सीखिले गुरुकी करिले ठौर ठिका नारे ।
अमर नगर पहिंचान सिदौसी तब नहिं आवन जानारे ॥
हरिकी भक्ति साधुकी संगति यह मत वेद पुरानारे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं परम पुरातन ज्ञानारे ॥
राग सोरठै ॥
यह तन बालू का सा डेरा ।
जैसे दामिनि दमक चमकको क्षणनहिं रहत उजेरा ॥
मैड़ी मण्डप मुल्क खजानो अरु परिवार घनेरा ।
सो सब कौतुक सों दीखतहै राम सँभार सबेरा ॥
गज घोड़ा अरु चाकर चेरा आखिर कोई न तेरा ।
जिनके कारण भ्रर्मत डोलै करता मेरा मेरा ॥
थोड़े से जीवनके काजे बहुतक करत बखेरा ।
कालबलीकी खबरि नहीं है करहि अचानक घेरा ॥
कहैं शुकदेव समझ नर भोंदू छांड़ि विषय उरझेरा ।
चरणदास हरिनाम भजन बिन कैसे होय निबेरा ॥