भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३६३
मग माहीं ठग बाग लगाये । बहुत मुसाफिर जित परचाये ॥
अरु उनको बिष लड्डू खवाये । मारि लिये स्वादन के घाट ॥
सावधान कोइ हाथ न आये । बचकर चले सो निरभय धाये ॥
उनके छलके पेच न खाये । नेक न लागी तिनको आंट ॥
मन चंचलका घोड़ा कीजै । ध्यान लगाम ताहि मुखदीजै ॥
ह्वै असवार ताहि गहि लीजै । भवसागर का चौड़ा फांट ॥
चरणदास शुकदेव चितावै । अपना जानि तोहिं समझावै ॥
तेरे भले कि बात बतावै । बारबार कहुं तोको डांट ॥
राग आसावरी ॥
गुरु मुख यह जग झूठ लखाया ।
साधसंत अरु वेद कहतहैं और पुराणन गाया ॥
मृगतृष्णा के नीर लोभाना सीपी रूपा जाना ।
फटिक शिलापर पीक परी है मूरुख लाल लोभाना ॥
स्वप्ने में सब ठाट ठटो है कुल नाते परिवारा ।
दृष्टि खुली जब सबही नाशे रहो नहीं आकारा ॥
ताते चेत भजन कर हरिको हां मत मनको पागौ ।
वा घरगये बहुरि नहिं आवै आवागमन न लागौ ॥
या स्वप्नेमें लाभ यही है चरणदास सुखभाखो ।
योगेश्वर जापद मिलिरहिया तुरियाहित चितराखो ॥
राग बरवा ॥
या तनको कुहगर्व करतहै ओला ज्यों गलजावैरे ।
जैसे बर्तन बनो काँचको ठबकलगे बिगसावैरे ॥
झूठ कपट अरु छल बल करिकै खोंटे कर्म कमावैरे ।
बाजीगरके बांदर कीज्यों नाचत नाहिं लजावैरे ॥