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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

ब्रजचरित्रवर्णन । ६
रतन चौकहै पीठ हथेली । लगी जँजीर मुँदरियन भेली ॥
सोहैं छाप छला अरु मुँदरी । नुहसत पहिरे सुन्दर अंगुरी ॥
इकीस चिह्न चरणनमें धारे । झुनुक झुनुक पैंजनिझनकारे ॥
मन्द मन्द विहँसत मुसकाई । रणजीत* मीतछविकहीनजाई ॥
नितकिशोर अरुनित्तकिशोरी । द्वादश वरष अवस्था भोरी ॥
राधे भूषण छवि कह गाऊं । नाव लेत मनमें शरमाऊं ॥
हूं मैं दास नाव रणजीत । भक्तिदान मोहिं दीजैरीत ॥
बहुत सखी जिनके निजसंगा । रासकेलि खेलें बहुरंगा ॥
वनके चौंसठि खम्भे माहीं । होत अखण्ड रास वहि ठाहीं ॥
झुनुक झुनुक सखियन पगबाजैं । घुँघुरू अधिकमहाध्वनिगाजैं ॥
दिव्य भूषण पहिरे पियप्यारी । शशिव१दनी तिरगुणते न्यारी ॥
नवल किशोरी गोरी सारी । सुघर सयानी चतुर नारी ॥
दिव्यवस्त्र अरु मधुर शरीरा । अधिक रूप छवि गहर गंभीरा ॥
कजरारी कच२ लटकैं बेनी । अंजन नैन सैन पियदेनी ॥
चूड़ामणि गहनो छवि नीको । शीशफूल अरु वेनीटीको ॥
नथबुलाक अरु बन्दी झलकें । घूंघुरवाली लटकैं अलकैं ॥
मुखऊपर अलकैं छवि ऐसी । चन्दचढ़ी दो नागिनि जैसी ॥
करणफूल सँग झुमके मलकें । सब सखियनके भूषण झलकें ॥
चम्पाकली नौलड़ी माला । चन्दनहार सुपहिरे वाला ॥
कठुला जैसे गले जनेऊ । अरु हिय चौकी महा अभेऊ ॥
फूलमाल सखियां सब पहिरे । गुंजनकी माला हिय लहिरे ॥
बांहन में बाजूबंद बांधे । वंकबला बांहन पर साधे ॥
सदा सुहागिनि पहिरे चूरी । सुवक पछैली वँगरी रूरी ॥
१ चन्द्रमाकासा वदन २ बाल ॥
प्रथम पाठ * रणजित मित ॥

१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
॰कँगनी अरु पहिरे जहँगीरी। रतनन चौक आरसी धीरी॥
छाप छला अरु पहिरे गूंठी। नुहसत पहिरे अजब अनूठी॥
पांवनमें पग वेवर बाजैं। नखशिखलों आभूषण साजैं॥
झुनुक झुनुक नाचै अरु गावैं। ठुमुक ठुमुक निरतैं अरु धावैं॥
कबहूं थइथइ थइथइ करें। कबहुँ कर ऊपर कर धरैं॥
कबहूं घिनन घिनन अँग मोरैं। भाव बताय तान बहु तोरैं॥
कबहूं कर उठाय गति चालैं। साँग उपांग¹ बतावत हालैं॥
हो अनुराग राग बहु गावैं। घुँघुरूकीगतिअधिक बजावैं॥
कोइ नाचै कोई गावै। कोइमृदंग कोइ ताल बजावै॥
बैन सरू काहू कर राजै। कोउ तँबूरा नारी साजै॥
उपँग लिये कर कोउ सहेली। अमृत कुण्डली² कोउअलबेली॥
कोइ बीन कोइ लिये मुहचङ्गा। मगनरूप सबही निज सङ्गा॥
दो० कहा बुद्धि कहा कहसकूं, रासकेलि को साज।
बाजे हैं बहुभांति के, वर्णत आवै लाज॥
कबहूं करसों कर मिला, नृत्यत श्रीगोपाल॥
कबहुं बैठे सांवरो, नृत्यत सुन्दरबाल॥
कबहूं हँसिकरि निकट बुलावैं। कबहूं फूलमाल पहिरावैं॥
कबहूं मन्द मन्द मुसकावैं। बैन सैन दै नृत्य बतावैं॥
वृन्दावन में ऐसी लीला। चरणदासको जहां वसीला॥
जो कोइ इनको ध्यान लगावै। अमर लोक निहचै करिपावै॥
सिमिटो मन कबहूं नहिं फूटै। सोवत जागत ध्यान न छूटै॥
जो कोइ इनको ध्यान न करिहै। भरमि भरमि चौरासी परिहै॥
सुरनर मुनिसबही मिलि ध्यावैं। शिव ब्रह्मादिक अन्त न पावैं॥
वेद विना यह भेद न पावै। आप भरमि अरु जग भरमावै॥
१ सब विधियों सहित २ द्वारा॥

ब्रजचरित्रवर्णन । ११
वेद पुराण संहिता गावैं । चारोंयुग हरिभक्ति बतावैं ॥
दो० इत उत भटको जग फिरै, कीन्हों नाहिं विचार ।
सत्य पुरुष जानों नहीं, कैसे उतरै पार ॥
द्वापर बीतो कलियुग आयो । राजाको शुकदेव सुनायो ॥
कलियुगकी दुर्बुद्धि बताऊं । सुनहुपरीक्षित कहि समुझाऊं ॥
ओछी बुद्धि मनुज की होगी । सकलविकल अरु मनके रोगी ॥
सूक्ष्म ज्ञान महाअभिमानी । नहीं मानिहैं वेद पुरानी ॥
परमेश्वर की निन्दा करि हैं । भूत मसानी चित में धरि हैं ॥
खेतरपाल १ भूमिया मानैं । कुत्रिमको कर्ता करिजानैं ॥
परमेश्वर की बात न भावै । एसो उत्तर तुरत बतावै ॥
कहैं राम् कहां है भाई । हमहूँ को तु देहु दिखाई ॥
दो० चहूँओर हरिको विभव, सातद्वीप नौखण्ड ।
चरणदास* कहैं सुन अधिर, किन रच्यो ब्रह्माण्ड ॥
भक्ति विना दीखै नहीं, इन नयनन हरिरूप ।
साधुन को परगट भयो, विना भक्ति हरिरूप ॥
साधुसन्तकी निन्दा करिहैं । भजन करै तासों वहु अरि हैं ॥
करि अभिमान आपमें जरिहैं । गुरुको कहो नेक नहिं करिहैं ॥
पंथ खड़े करि हैं छत्तीसा २ । भरमपूजि तजिहैं हरि ईसा ॥
दम्भ झूठ की सेवा करिहैं । झूठे पंथन में जा लरिहैं ॥
गऊ ब्राह्मण भ्रष्टल होई । बाप पूत में परिहै दोई ॥
विद्या दान कपट व्यवहारा । राजा दुष्ट दुखित संसारा ॥
वेद पढ़े करि हैं अभिमाना । हम पंडित अरु सब अज्ञाना ॥
१गांव का चौकीदार २ छत्तीस प्रकारके पंथ ॥
प्रथमपाठ * चरण दाससुन

॰ १२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पढ़ पुराण भेद नहिं जानैं । साधुनसों झगड़ो बहु ठानै ॥
ग्रंथ पुजाय हरि कूं विसरावैं । झूठे वाद विवाद बढ़ावैं ॥
व्यभिचारिणिहोइहैं बहुनारी । बोलैं झूठ बहुत परकारी ॥
शुकदेव कहे राजासूं बैना । सो अब देखे अपने नैना ॥
राजा डांड़ि बांधि करि लूटैं । पूजैं भूत रामसों छूटैं ॥
गऊ विष्ठा सो खाती जानी । पंडित देखे बहु अभिमानी ॥
दम्भ कपट बहु पूजा दौरी । कलुवा जाहर पूजैं बौरी ॥
पण्डित वेद पढ़े बिसरावैं । स्याने भोपे को शिर नावैं ॥
हरि के साधुन को विसरावैं । तजैं राम औरन को ध्यावैं ॥
हरिकी भक्ति सदा चलिआई । वेद पुराणन में जो गाई ॥
इनको समझि भये जो ज्ञानी । नाभा जिनकी भक्ति बखानी ॥
जिनकी महिमासबजगज्ञानी । सबजानत हैं चतुरा ज्ञानी ॥
पीपा सदना सैना नाई । धना जाट अरु मीराबाई ॥
नामदेव रैदास चमारा । तुलसी माधो मीर विचारा ॥
कूंबा कुम्हरा फत्तू सका । सेऊ सम्मन रङ्का वङ्का ॥
करमैती अरु करमा वाई । दास कवीरा वाणीगाई ॥
जैदेवा अरु नरसी महता । दास मलूक कड़ा में रहता ॥
अन्तानन्द कील अरु जंगी । देव मुरारि निपट सरवंगी ॥
नरहरि लालदास हरिवंसा । रंगनाथ बनवारी हंसा ॥
नानक सूरदास और दादू । सनक सनन्दन कहिये आदू ॥
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण शवरी । हनूमान शङ्कर और गवरी ॥
बाल्मीकि अँबरीष सुदामा । मोरध्वज राजा संग्रामा ॥
बहुतक भक्त और जो भये । नाम न जानूं जात न कहे ॥
कई कोटि वैष्णवों बाके । सबही गये मुक्ति के नाके ॥
चरणदास हरिभक्ति विचारी । सुमिरिसुमिरि पहुँचेनरनारी ॥

ब्रजचरित्रवर्णन । १३
दो०-लिखिपढ़ि समझि विचार करि, सदा करौ हरिध्यान ।
कृष्णभक्ति दृढ़ करि गहौ, मिटै सकल अज्ञान ॥
कविच साङ्गीत ॥
मुकुट जटित शिर अधिक विराजत गहे बँसुरिया अधर धरन् ।
शंख चक्र गदा पद्म विराजत कोटि मदन छवि चरणन् ॥
गिरिवर नखधारे असुरन मारे सन्तन के दुख हरनन् ।
जन चरणदास चरणनको चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
कुमकुम बिन्दी दीपित भालं उदधिजात की द्युति हरनं ।
मकराकृत कुण्डल अति राजत झुमक दामिनी छवि धरनं ॥
कटि किंकिणि पैंजनि पग बजत मुक्तमाल सुरसुर वरनं ।
जनचरणदास चरणनको चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
सुन्दर बाल लाल सँग लीन्हे रासकरत अति मनमगनं ।
घुमिरि घुमिरि झुकि झुकि कर निरतत खुटर खुटर नाटकवरनं ॥
मधुर मधुर ध्वनि बजत गजत घन झनक झनक झांझा झरनं ।
जनचरणदास चरणनको चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
रास रचावैं सब सचुपावैं सांवरे वदन छवि वर्णनं ।
धुक धुक धूधूकरि नृत्यत तकृत तकृत ताधिननननं ॥
झुनुक झुनुक नूपुर झनकारत झनक झनक झनझनझननं ।
जनचरणदास चरणन को चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
क०-नन्दके कुमार हौं तो कहौं बार बार मोहिं लीजिये
उबारि ओट अपनी में कीजिये । काम अरु क्रोध को काटो
जम बेड़ा प्रभु मांगौं एकनाम मोहिं भक्तिदान दीजिये ॥ और
की छुटायो आश सन्तनको दीज साथ वृन्दावन निवास*
मोहिं फेरिहू पतीजिये । कहै चरणदास मेरि होय नाहि हास
प्रथमपाठ '* बास ॥'

१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
श्याम कहूं मैं पुकारि मेरी श्रवन* सुनि लीजिये ६४ ऊहीं हाथ
कुचगहि† पूतना के प्राण सोखे पाय ऊंची‡ पदवी निज धाम
को सिधारी है। ऊहीं हाथ श्रीधरको मुखमाड़ो दहीसेती
छातीपर पांव दै मरोरि जीभ डारी है ॥ ऊहीं हाथ कूबरी के
कूबकाड़ सीधो कियो ऊहीं हाथ मस्तक+ गज खैंचि मूठ मारी
है। ऊहीं हाथ बांह चरणदास कहै आय गहो ऊहीं हाथ
जमुना में नाथ्यो नागकारी है ॥
इति श्रीचरणदासजीकृतव्रजचरित्रसम्पूर्णम् ॥
प्रथमपाठ * श्रौन † गहि ‡ ऊंचो पद + मत्त ॥

अथ अमरलोकअखण्डधामवर्णन ॥
दो०-प्रणमों श्री शुकदेव को, सो हैं गुरू दयाल ।
काम क्रोध मोह लोभ से, काढ़े मेरे साल ॥
वाणी विमल प्रकाश दी, बुधि निर्मल की तात ।
मोहि मूरख अज्ञानको, नहिं आवत ही बात ॥
अमरलोक वर्णन करों, वेही करं सहाय ।
दृष्टिहिये मम खोलिकरि, सबही देहिं दिखाय ॥
भेद लियो गुरुदेव सों, अद्भुत रचौं ग्रन्थ ।
साखी वेद पुराण मैं, जानी सुनियो सन्त* ॥
भेद अगोचर कोइकोइ जानै । गुरू दिखावै तौ पहिंचानै ॥
पता कहैं कछु वेद पुराना । ज्योंका त्यों उनहूं न बखाना ॥
कछु कछु मत मारगहू भाखैं । फिरि भूलैं समुझैं नहिं साखैं ॥
हरि कृपा प्रकट मैं गाया । किया उजागर खोलिदिखाया ॥
दो०-महा कठिन दुर्लभ हुता, अमरलोक का भेद ।
ताको मैं बीजक कियो, भाषो भेद अभेद ॥
निराकार तौ ब्रह्म है, माया है आकार ।
दोनों पदही को लिये, ऐसा पुरुष निहार ॥
माया जीव दोउ ते न्यारा । सो निज कहिये पीव हमारा ॥
क्षर अक्षर निहअक्षर तीनो । गीता पढ़ि सुनि इनको चीन्हौं ॥
गीता अक्षर जीव बतावै । क्षरमाया सोइ दृष्टि दिखावै ॥
निहअक्षर है पुरुष अपारा । ज्ञानी पण्डित ल्योह विचारा ॥
जीवआतम परमातम दोऊ । परमातम जानत हैं कोऊ ॥
आतम चीन्हि परमातम चीन्हो । गीतामध्य कृष्ण कहि दीन्हो ॥
प्रथमपाठ *- सत्य ।

१६ स्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
माया उपजै विनशै अतिही । चेतन ब्रह्म अमरहै नितही ॥
पारब्रह्म पुरुषोत्तम जानो । चरणदास के सो मन मानो ॥
दो०-अमरलोक बिच पुरुषहै, ब्रह्म जु सबके माहिं ।
माया दरशत है सबै, ब्रह्म दीखतै नाहिं ॥
अब सुन अमरलोक की वानी । त्रैगुण रहित परम सुखदानी ॥
तेज पुंजके ऊपर राजै । अहंविराट सो बाहर गाजै ॥
ताको ज्योति कहत नरलोई । तेजपुंज कहियत है मोई ॥
सूरज मण्डल ताहि बतावै । जोगी जोग जुगत सों पावै ॥
सूरज मण्डल जैहैं चीरा । वालोकै कोइ पैहैं वीरा ॥
कोटिभानु कोसो उजियारो । तेज पुंजको रूप विचारो ॥
तीनि लोकसों बाहर होई । सात भवन सों बाहर सोई ॥
ताके ऊपर अविचल लोका । पापपुण्य दुख सुख नहिं शोका ॥
काल न ज्वाल अवधि नहिं होई । रनजीतदास जहाँ सुरतिसमोई ॥
महाअगोचर¹ गुप्तसों गुप्ता । जहां विराजत हैं भगवंता ॥
अमरलोक गौ लोक कहावै । चौथा पद निर्वान बतावै ॥
अगमपुरी बेगमपुर ठाऊं । कहा बुद्धिसों सब गति गाऊं ॥
कंछुइक वरणि बताऊं वाको । ब्रह्मासुत सतजुग में भाषो ॥
पुहुपद्वीप है श्वेत अकारा । सब ब्रह्माण्डनसूं है न्यारा ॥
जो कोइ जाय बहुरि नहिं आवै । आवागमन सकल बिसरावै ॥
जो कोइ गयो बहुरि नहिं आयो । देही दिव्यरूप अति पायो ॥
सोलह बरष उमर नित रहै । अजर अमर निधि आनँद लहै ॥
बूढ़ा बाला होय न तरुणा । षोड़श भानुरूप जहाँ धरणा ॥
तत्त्वस्वरूपी काया पावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥
१ देखने में न आवै ॥

अमरलोकअखण्डधामवर्णन । १७
पांचतत्त्व विनहै थिरथायो । ना वह वन्यो न कृत्यवनायो ॥
ओर छोर कछु दीखत नाहीं । कवसौं है और कवसों नाहीं ॥
है अडोल मर्जाद न ताकी । वेपरमान वेद यों भाषी ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । कछू कछू धरिध्यान वतावै ॥
अनन्तभानु के सो उजियारो । पिण्ड ब्रह्माण्ड दोउते न्यारो ॥
लोकमध्य अविचल निजधामा । श्वेतरूप अगमपुर नामा ॥
अगमपुरी निरधारा सूची । हंसलहैं जिनकी मति ऊंची ॥
वेहद लोक वन्यो अतिभारी । असंख्यभानु कीसी उजियारी ॥
दो० हद्दकहूँ तौ है नहीं, वेहद कहूँ तौ नाहिं ।
ध्यान स्वरूपी कहतहौं, वैन सैन के माहि ॥
अतिउज्ज्वल रवि दृष्टिन ठहरे । मणि हीरा लागे जहाँ गहरे ॥
कई रङ्गके हीरा भाखे । कलश कँगूरा स्थिरराखे ॥
ताभीतर वहु द्रुम* अशोगा । अक्षयवृक्ष फललगे

१६ स्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
माया उपजै बिनशै अतिही । चेतन ब्रह्म अमरहै नितही ॥
पारब्रह्म पुरुषोत्तम जानो । चरणदास के सो मन मानो ॥
दो०-अमरलोक बिच पुरुषहै, ब्रह्म जु सबके माहिं ।
माया दरशत है सबै, ब्रह्म दीखतै नाहिं ॥
अब सुन अमरलोक की बानी । त्रैगुण रहित परम सुखदानी ॥
तेज पुंजके ऊपर राजै । अहंविराट सो बाहर गाजै ॥
ताको ज्योति कहत नरलोई । तेजपुंज कहियत है सोई ॥
सूरज मण्डल ताहि बतावै । जोगी जोग जुगत सों पावै ॥
सूरज मण्डल जैहैं चीरा । वालोकै कोइ पैहैं वीरा ॥
कोटिभानु कोसो उजियारो । तेज पुंजको रूप विचारो ॥
तीनि लोकसों बाहर होई । सात भवन सों बाहर सोई ॥
ताके ऊपर अविचल लोका । पापपुण्य दुख सुख नहिं शोका ॥
काल न ज्वाल अवधि नहिं होई । रनजीतदास जहाँ सुरतिसमोई ॥
महाअगोचर¹ गुप्तसों गुप्ता । जहां विराजत हैं भगवंता ॥
अमरलोक गौ लोक कहावै । चौथा पद निर्वान बतावै ॥
अगमपुरी बेगमपुर ठाऊं । कहा बुद्धिसों सब गति गाऊं ॥
कछुइक बरणि बताऊं वाको । ब्रह्मसुत सतजुग में भाषो ॥
पुहुपद्वीप है श्वेत अकारा । सब ब्रह्माण्डनसूं है न्यारा ॥
जो कोइ जाय बहुरि नहिं आवै । आवागमन सकल बिसरावै ॥
जो कोइ गयो बहुरि नहिं आयो । देही दिव्यरूप अति पायो ॥
सोलह बरष उमर नित रहै । अजर अमर निधि आनँद लहै ॥
बूढ़ा बाला होय न तरुणा । षोडश भानुरूप जहाँ धरणा ॥
तत्त्वस्वरूपी काया पावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥
१ देखने में न आवै ॥

अमरलोकअखण्डधामवर्णन । १७
पांचतत्त्व विनहै थिरथायो । ना वह बन्यो न कृत्यबनायो ॥
ओर छोर कछु दीखत नाहीं । कबसों है और कबसों नाहीं ॥
है अडोल मर्याद न ताकी । वेपरमान वेद यों भाषी ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । कछू कछू धरिध्यान बतावै ॥
अनन्तभानु के सो उजियारो । पिण्ड ब्रह्मण्ड दोउते न्यारो ॥
लोकमध्य अविचल निजधामा । श्वेतरूप अगमपुर नामा ॥
अगमपुरी निरधारा सूची । हंसलहैं जिनकी मति ऊंची ॥
बेहद लोक बन्यो अतिभारी । असंख्यभानु कीसी उजियारी ॥
दो० हदकहूँ तौ है नहीं, बेहद कहूँ तौ नाहिं ।
ध्यान स्वरूपी कहतहौं, बैन सैन के माहि ॥
अतिउज्ज्वल रवि दृष्टिन ठहरे । मणि हीरा लागे जहाँ गहरे ॥
कई रङ्गके हीरा भाखे । कलश कँगूरा स्थिरराखे ॥
ताभीतर बहु द्रुम* अशोगा । अक्षयवृक्ष फललगे निरोगा ॥
कल्पवृक्ष बहुरंग विरङ्गा । फल ओर पात फूल इक सङ्गा ॥
कोमलदल शोभा अतिभारी । अजर पुरुप दर्शन अधिकारी ॥
चेतनरूप गहर अतिछाहीं । साधु रहत तिनकी परछाहीं ॥
षोड़श भानु सम देह स्वरूपा । हरिरस मदमाते निधिरूपा ॥
उन वृक्सनके निचनिच मंदिर । अनगिन महल महामठ सुन्दर ॥
महलमहलपर ध्वजा पताका । पुरुपोत्तमपुरुप†नामलिखिराखा॥
ध्वजा पाताका लहरत ऐसे । खिमत वीजुरी बहुतक जैसे ॥
रतन जटिल तिनकी अँगनाई । बैठत उठत चलत हरषाई ॥
काम क्रोध नहिं लोभ अधीरा । निर्मल दिशा शील गुणधीरा ॥
जहां न आलस नींद जँभाई । भूखप्यास मलता नहिं भाई ॥
मैल पसीना आंसू नाईं । दिव्य देहधरि रहे गुमाईं ॥
प्रथमपाठ* द्रुम बहुत †सु ॥

१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
एक रूप एकै गति पाई । एक बरण एकै सबदाई ॥
संशय शोक रोग नहिं दहै । मगनरूप मन आनँद लहै ॥
षोड़शवर्ष अवस्था नितही । गुण पौरुषहरिजनके अतिही ॥
दिव्यभूषण दिव्यवस्त्र अङ्गा । श्यामगात सुन्दर छवि अङ्गा ॥
जुलफैं लटकिरहीं कजियारी । कुण्डलछविसोहत अधिकारी ॥
नासामोती सुब्रक सुढारा । सुन्दरतिलक लगतअति प्यारा ॥
दीरघ दृग कछूक अरुणाई । माथे मुकुट जटित ललिताई ॥
घरघर दिव्य आसन सिंहासन । और महासुखहैं हरिदासन ॥
दो० भौ मेटन अरुतिम हरण, तुमहिं नवाऊं शीस ।
चरणदास चरणन पर्यो, भक्तिकरो बकसीस ॥
शुकदेव गुरु कृपाकरी, दीन्हो भेद लखाय ।
साधुनके पग पूजतैं, सकलव्याधि मिटिजाय ॥
आस पास हरिजन रहें, मध्य ईश दरबार ॥
रसिक केलि बहु कुंजहैं, ललित द्वारहैं चार ॥
राजमहल जनपति रहें, कापै बरण्यो जाय ।
गिनत शारदाछविअधिक, गौरीसुत थकिजाय ॥
अनन्त भानु* कोसोउजियारो । वा 'मण्डल को रूप विचारो ॥
समतुल और कास को लाऊं । बैन सैन दै ताहि बताऊं ॥
चन्द सूर² वह ठौर न चीन्हो । दृष्टान्त देन†को पटतर दीन्हो ॥
आदि अनादि पुरातम धामा । जैसे आदिपुरुष घनश्यामा ॥
श्वेत‡रूप स्वरूप सुगन्धा । सहज महक जहँ उठत सुगन्धा ॥
चार द्वार बहु बाजन बाजैं । अनहद शब्द महाध्वनिगाजैं ॥
दिव्यरूप जो लगे किवाँरा । तिनके आगे बाग सुढारा ॥
१ सुन्दर २ सूर्य ॥
*प्रथम पाठ भानु अनन्त भानुसरिस।हितदृष्टान्त सो।श्वेतहि रूप ॥

अमरलोकअखण्डधामवर्णन । १६
हरो बाग अद्भूत है भाई । दूजे द्वार महा अरुणाई ॥
तीजे द्वार बाग पियराई । चौथे ऊदो है थिरथाई ॥
उन बागन के आसा पासा । बहुत भवन जहाँ साधुनिवासा ॥
मैड़ी* मण्डप बहुत सुढारी । श्वेत वरण सुन्दर अधिकारी ॥
साधु सन्त जहाँ हरिजन पूरे । दास भाव भावना झूरे ॥
षोड़श भानु की‡ सुन्दरताई । जगत जीति पहुँचै जो जाई ॥
सखाभाव पहुँचत वहि ठांई । सखीभाव भीतर को जांई ॥
धरै स्वरूप अनूपम भारी । सदा सुहागिनिहरिपिय प्यारी ॥
परमपुरुष पुरुषोत्तम पावैं । निकटरहैं नित केलि बढ़ावैं ॥
चारौ मुक्ति¹ जहां कर जोरैं । भाव बताय तान बहु तोरैं ॥
दरशन, कारणकी सुखदाई । धरे स्वरूप रहैं हरपाई ॥
रतनजटित जहँ भूमि सुहाई । कोटि भानु छवि रहतलजाई ॥
एकसमय नित ऋतु छवि पावत । शीत उष्ण पावस नहिंआवत ॥
ऋतु वसन्त पीरी छवि सोहैं । वनघन कुंजलता मनमोहैं ॥
निज वृन्दावन है वह ठाहीं । सदा बसो मेरे मनमाहीं ॥
दिव्य फूल फूले बहुरंगा । बिन ऋतु फूले रंगविरंगा ॥
सकल सखी विचरत हरिसंगा । गोरी सखी श्याम हरी अंगा ॥
दो०-पुहुप जु फूले नित रहें, मोरैं ना कुम्हिलायँ ।
कई वरण कइरंगसों, अति सुगन्ध हरपायँ ॥
उन पुहुपन को नाम न जानौं । कहा नाम लै ताहि बखानौं ।
बहुत वृक्ष कुंजन घनछाहीं । फल अरु फूल लगे उनमाहीं ॥
काहू द्रुम न फल नहिं फूला । पुहुपरूप ह्वै आपहि झूला ॥
कोऊ लाल रूप ह्वै छायो । कोऊ श्वेत रूप मन भायो ॥
१ सायुज्य सारूप्य सामीप्य सालोक्य ॥
प्रथमपाठ * मन्दिर † दाससुभाव ‡ कि ॥

२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रंग रंग के वृक्ष बखाने । सो पुरुषोत्तम के मनमाने ॥
वनके माहिं बहुत जहाँ क्यारी । पुहुप रंग छवि न्यारी न्यारी ॥
कई भांति को बास तरंगा । मगनरूप बोलत सुरभंगा ॥
वनबिच श्वेतरूप छविनाना । गोल चौतरो रूपनिधाना ॥
इकरस चेतन परम सढोला । कोटि भानु छवि अमरअडोला ॥
जहाँ परिकर्मा सखी सहेली । बारह भानु रूप अलबेली ॥
दिव्य दमक जहाँ हीरा लागे । सात रंगके झिलमिल ताके ॥
ऊदा लाल श्वेत अरु पीरा । हरित श्याम लहरी अतिधीरा ॥
तापर चौसठ खम्भा दमकै । मानों कोटि भानु छाव झमकैं ॥
खम्भन लगे लाल ओर मुक्ता । पन्ना लगे बेलि की जुगता ॥
मूंगा लाल फिरोजा भारी । ध्यान धरो ताको नर नारी ॥
ये सब लगे बखानों ऐमे । जैसी जुगत लगे हैं जैसे ॥
जड़ लालनको विद्रुम डारी । पन्ना पात वृक्ष गतिधारी ॥
चुन्नी पँचरँग फूल सुहाये । फल मुक्ताहल झुकत झुकाये ॥
और बनी बहु चित्तरकारी । बेलि बड़ बूटा अधिकारी ॥
हीरा मोती चेतन होई । जानै साधू बिरला कोई ॥
दो०-ताकी छवि अति ललित है, शोभा सरस सुजान ।
लगो चंदोवा दिव्य अति, चेतन करो बखान ॥
लगे चंदोवा झालरि मोती । मानौ उडुगणै झिलमिलज्योती ॥
झालर बनी चंदोवा केरी । दिव्य दृष्टि करि साधुन हेरी ॥
तापर रंगमहल की शोभा । चेतन आनँद सुखकी गोभा ॥
स्थिर इकरस भीत सुढारी । बने झरोखा अद्भुत बारी ॥
अजब कँगूरा सुबक सुढारे । चौंसठ कलश लगै अतिप्यारे ॥
१ आदित्य, दिवाकर, भास्कर, प्रभाकर, सहंसांशु, त्रैलोक्यलोचन,
हरिदश्व, विभावसु, दिनकर, द्वादशात्मक, त्रिमूर्ति, सूर्य. २ नक्षत्र ॥

अमरलोकअखण्डधामवर्णन । २१
रतनजटितकी खिड़की सोहैं। ताके आगे दिनकर कोहैं ॥
भीत झरोखा कलशन माहीं। नग पन्ना लागे सब ठाहीं ॥
दो० मणि हीरा माणिक लगे, रंगमहल के माहिं ।
बिन पहुंचे निज धामके, क्योंहूँ दीखत नाहिं ॥
आसपास बहु कुंज हैं, बीच लालको धाम ।
चरणदास को दीजिये, सखियन में विश्राम ॥
जैसे चौसठ खम्भ हैं, तैसे करों बखान ।
छत्र सिंहासन वर्णहूँ, ओर सखियन की आन ॥
तीस खम्भमें खम्भा बीस । तामें चौदह खम्भा ईस ॥
परम बिछौना है थिरथाये । मानौ सूरज लक्ष छवि छाये ॥
तापर सिंहासन बड़भागी । श्वेतरूप चेतन अनुरागी ॥
सिंहासन पर कछू बिछायो । शोभा ताकी कहत न लजायो ॥
धरो गेंदवा तकिया नीके। छत्तर सोहै ऊपर पियके ॥
पियकी शोभा कहा बखानूं । आदि अन्त ताको नहिं जानूं ॥
अक्षर पुरुष पुरुषोत्तम स्वामी । सब जीवनको अन्तरयामी ॥
पारब्रह्म अविचल अविनाशी । वायें अङ्ग रूपकी राशी ॥
गोरी राधा कृष्ण श्यामघन । सिंहासन पर ललितमुदितमन ॥
आसन जहाँ अखिलजगदीशा । मुकुट चन्द्रिका सोहै शीशा ॥
मकराकृत कुण्डल छवि ऐसी । जग में कहा बखानूं जैसी ॥
जुलफें श्याम भुवङ्गम कारी । कजियारी अरु घुंघुरवारी ॥
सहज सुगन्ध रहे महकाई । लांबी चिकनी अरु बलखाई ॥
बांकी भौंह कुटिल अनियारी । तिरछी पलकें लागें प्यारी ॥
रस के माते घूम घुमारे । ललचौंहैं दृग हैं कजरारे ॥
१ जो कभी जूदा न हो ॥
प्रथमपाठ
जल ॥

२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बांके दीरघ ओर ललचौहैं । चितवत सखियन के मन मोहैं ॥
सुवक बुलाक नाक में सोहै । ध्यान करत मेरो मन मोहै ॥
बिजुरीसी मुसकानि पियाकी । मनखैंचनि अरुभाल हियाकी ॥
वदन श्यामघन कहाबखानूं । कोटि भानु छवि मुखपर वारूं ॥
दिव्य नीमा* अंग माहीं सोहै । सूरज कोटि कला छवि मोहै ॥
कंठी कंठ धुकधुकी झमकै । तामधिकौस्तुभमणिअतिदमकै ॥
मोतियन की माला वनमाला । हुलसैं देखि धाम की बाला ॥
दिव्य बद्वि†गलजंद जड़ाऊ । नौरतनन के बाजू बाजू ॥
पहुँची कड़ा कहा छवि गाऊं । सम तुल ताकी कहा वताऊं ॥
दिव्य जहांगीरी दोउ‡करमाहीं । ताकी सम कछु कलमें नाहीं ॥
रतन चौक में लाल विराजैं । शोभा गावत मो मन लाजैं ॥
रतन चौकहै पीठ हथेली । लगी जँजीर मुँदरियन भेली ॥
चौकी सुघर हिये पर राजै । कटिकिंकिणिघुँघुरूध्वनि वाजै ॥
जुगलचरण पैंजनि झनकारैं । दिव्य टोरे तिनमें ठनकारैं ॥
कोटि चन्द्र दश नखपर वारूं । तलुअन चिह्न इक्कीस निहारूं ॥
वायें अंग राधिका प्यारी । कोटि चंद्रछवि मुखपर वारी ॥
जुगल सखी लै चँवर दुरावैं । हिये हरषि महासुख पावैं ॥
खंभ खंभ ढिग सखी सहेली । चौदहखड़ीं ईश अलबेली ॥
औरसखी बहुतक बहिठाऊं । शोभा जिनकी कहत लजाऊं ॥
नित्य किशोरी गोरी सारी । पांच तत्त्व त्रैगुणैँ तें न्यारी ॥
दिव्य वस्त्र दिव्यभूषण जाना । अधिकरूप छवि वारह भाना ॥
कजियारी कच लटकैं बैनी । मुतियन मांग भरैं छवि पैनी ॥
चूड़ामणि गहनो अति नीको । शीशफूल अरु बेनो टीको ॥
१ जोकि समुद्रमथन में समुद्रसे निकसी थीं २ सत्, रज, तम ॥
प्रथमपाठ *दिव्यप्रभा अंग अंगन †वैंधी ‡कर ॥

अमरलोकअखण्डधामवर्णन । २३
करणफूल सँग बन्दी लागी । झुमके थिरकें महा सुभागी ॥
अंजन आंजे नैन ढरारे । तीखे १ अनियारे पिय प्यारे ॥
घूंघुरवारी २ अलकैं लटकैं । वेसरिनासा छवि लिये मटकैं ॥
चम्पाकली नौलरी माला । चन्दनहार सुपहिरे बाला ॥
कठुला जैसे गले जनेऊ । ओर हियचौकी महा अभेऊ ॥
सखी शिंगार हार सब साधैं । बाजूवँद बाहुन पर बांधैं ॥
सदा सुहागिनि पहिरे चूरी । सुवक पछेली बँगरी रूरी ॥
कँगनी अरु पहिरे जहाँगीरी । रतनचौक छवि लगी जँजीरी ॥
छाप छला अरु पहिरें मुँदरी । नुहसत पहिरें सुन्दर अँगुरी ॥
पांवन में पगनेवरि बाजैं । नख शिखलों आभूषण साजैं ॥
और सखी विखरीं वन माहीं । सो काहू विधि गिनी न जाहीं ॥
दो० सुन्दर छवि पियरे वसन, झुण्ड सखिन के जान ।
कोउ पुञ्ज ऊदे वसन, सुघर सवारी आन ॥
लालवसन बहुतक सखी, श्वेत वसन बहुनार ।
नीलवसन बहु भामिनी, सबको रूप अपार ॥
हरे वसन नारी घनी, घनी गुलाबी वेष ।
बहुत झुण्ड कइ रंगसों, गायसकें नहिं शेष ॥
निज वन चौंसठि खंभे माहीं । होत अखण्ड रास वहिठाहीं ॥
झुण्ड सबैयों वनि वनि आवैं । हुलसिहुलसिलालन ढिग धावैं ॥
रासकेलि खेलें बहु रंगा । मदा विहार करें पिय संगा ॥
कवहूँक घुमरि घुमरि घुमरावैं । नैन सैन दै भाव बतावैं ॥
कवहूँक थेइ थेइथेइ थेइ करें । कवहूँक अँगुली नासा धरैं ॥
कवहूँक कर उठाय गति चालैं । मांग उपांग बनावत हालैं ॥
कवहूँक ठुमुक-ठुमुकपगधावैं । घुँघुरूकी गतिअधिक बजावैं ॥
होअनुराग रागनीगावैं । वाजेअद्भुत अधिक बजावैं ॥
१ तिरछे २ छल्लेकी समान लहरी जिनमें होती हैं ॥
४

२४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ
दो० कहा बुद्धि कहा कहिसकूं, रासकेलि को साज ।
अद्भुत लीला होय रही, वर्णत आवै लाज ॥
अखण्ड धाम लीला अमर, नित वृन्दावन रास ।
नित विहार जहाँ होत है, चरणदास को वास ॥
गौरीसुत नहिंगा सकैं, नहीं शारदा वाम२ ।
चरणदास कहा बुद्धि है, बरणि सकै निज धाम ॥
बड़ी दया मोपै करी, कृष्ण कुँवर सुन लाल ।
वाणी आप बनायकै, कीन्हो मोहिं निहाल ॥
मम हिरदय में आयकै, तुमही कियो प्रकास ।
जी कछु कहौ सो तुम कहौ, मेरे मुखसों भास ॥
आदि पुरुष परमातमा, तुमहिं निवाऊं माथ ।
चरणन पास निवास दै, कीजै मोहिं सनाथ ॥
तुम्हरी भक्ति न छांड़िहूँ, तनमनशिरक्यों न जाव ।
तुम साहिब मैं दासहूँ, भलो बनो है दाव ॥
शुकदेव गुरु कृपा करी, मूरुख भये प्रवीन ।
मम मस्तकपर कर

अथ श्रीगुरुचेलासंवादधर्मजहाजप्रारम्भ ॥
शिष्यवचन ॥
दो०-अर्ज करै कर जोरिकै, यह चरणनको दास ।
एहो श्रीशुकदेव जी, कछु पूंछन की आंस ॥
गुरुवचन ॥
पूंछौ मनको खोल करि, मेटौ सब सन्देह ।
अरु तुम्हरे हिरदय बिषे, सदा हमारो गेह ॥
शिष्यवचन ॥
मैंतो चरणहि दासहौं, तुम तौ परम दयाल ।
एकन पग पनहीं नहीं, एक चढ़ें सुखपाल ॥
यही जु मोहिं बताइये, एक मुक्ति को जाहिं ।
एक नरकको जाय करि, मार यमोंकी खाहिं ॥
एकदुखी इक अतिसुखी, एक भूप इक रंक ।
एकन को विद्या बड़ी, एक पढ़े नहिं अंक ॥
एकन को मेवा मिलै, एकन चनेभि नाहिं ।
कारण कौन दिखाइये, करि चरणनकी छाहिं ॥
यही मोहिं समझाइये, मनका धोखा जाइ ।
ह्वै करि निस्संदेह मैं, चरण रहौं लपटाइ ॥
गुरुवचन ॥
जिन जैसी करणी करी, तैसेही फल पाय ।
भुगतत हैं वे जगत में, ताको बदला आय ॥
शिष्यवचन ॥
कही तुम्हारी हिय धरी, व्यासपुत्र शुकदेव ।
सुगत कुगत करणीनको, भिन्न भिन्न कहु भेव ॥

२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुवचन ॥
अब मैं वर्णन करत हौं, एशिष धर्म जहाज ।
तामें बैठे विधि सहित, रहनी गहनी साज ॥
जो कोई करणी ना करै, बहुत करै बकवाद ।
रीता जानौ तासु को, छूटै ना जग व्याध ॥
कथनी कै पूजी नहीं, करणी है ततसार ।
तामें लाभहि लाभ है, बदला दे कर्तार ॥
सूरति कीन्ही साधु की, तन मन लागी आग ।
बिन करणी कैसे बुझै, हरिसों नाहीं लाग ॥
कथनी कथि दंभी भये, कहैं दूर की बात ।
अन्तरमें करणी नहीं, मनहीं माहिं लजात ॥
दंभी उनको जानिये, जगमें सिद्ध दिखात ।
तनमन बचन नसाधिया, तिहुँविधि रोपी घात ॥
तनमन साधै साधु सो, वचन साधि जो लेय ।
उज्ज्वल करणीकै सहित, रामभक्ति चितदेय ॥
तनसों करणीही करै, मनसों निश्चय लाय ।
वचन जो ऐसा बोलिये, जो सबहीको सुहाय ॥
बिन करणी १थोथी सब बातें । जैसे बिन चंदाकी रातें ॥
तातै समुझि करो तुम करणी । बिन बोये नहिं उपजै धरणी ॥
जैसा बोवै तैता लुनिये । जानत ज्ञानी पण्डित गुनिये ॥
कीकर नींव बवै सोइ पावै । अरु मेवा वोवै सोइ खावै ॥
पिछिली करणी अबकै पावै । ताहीको नर करम बतावै ॥
होनहार अरु भाग वही है । परालब्धै सोइ बड़ोकही है ॥
खोटी करणी से दुख भारी । होवै रंक पुरुष अरु नारी ॥
१ बेकार २ चन्दुर .३ भाग्य ॥