भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 56, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंअमरलोकअखण्डधामवर्णन । २३
करणफूल सँग बन्दी लागी । झुमके थिरकें महा सुभागी ॥
अंजन आंजे नैन ढरारे । तीखे १ अनियारे पिय प्यारे ॥
घूंघुरवारी २ अलकैं लटकैं । वेसरिनासा छवि लिये मटकैं ॥
चम्पाकली नौलरी माला । चन्दनहार सुपहिरे बाला ॥
कठुला जैसे गले जनेऊ । ओर हियचौकी महा अभेऊ ॥
सखी शिंगार हार सब साधैं । बाजूवँद बाहुन पर बांधैं ॥
सदा सुहागिनि पहिरे चूरी । सुवक पछेली बँगरी रूरी ॥
कँगनी अरु पहिरे जहाँगीरी । रतनचौक छवि लगी जँजीरी ॥
छाप छला अरु पहिरें मुँदरी । नुहसत पहिरें सुन्दर अँगुरी ॥
पांवन में पगनेवरि बाजैं । नख शिखलों आभूषण साजैं ॥
और सखी विखरीं वन माहीं । सो काहू विधि गिनी न जाहीं ॥
दो० सुन्दर छवि पियरे वसन, झुण्ड सखिन के जान ।
कोउ पुञ्ज ऊदे वसन, सुघर सवारी आन ॥
लालवसन बहुतक सखी, श्वेत वसन बहुनार ।
नीलवसन बहु भामिनी, सबको रूप अपार ॥
हरे वसन नारी घनी, घनी गुलाबी वेष ।
बहुत झुण्ड कइ रंगसों, गायसकें नहिं शेष ॥
निज वन चौंसठि खंभे माहीं । होत अखण्ड रास वहिठाहीं ॥
झुण्ड सबैयों वनि वनि आवैं । हुलसिहुलसिलालन ढिग धावैं ॥
रासकेलि खेलें बहु रंगा । मदा विहार करें पिय संगा ॥
कवहूँक घुमरि घुमरि घुमरावैं । नैन सैन दै भाव बतावैं ॥
कवहूँक थेइ थेइथेइ थेइ करें । कवहूँक अँगुली नासा धरैं ॥
कवहूँक कर उठाय गति चालैं । मांग उपांग बनावत हालैं ॥
कवहूँक ठुमुक-ठुमुकपगधावैं । घुँघुरूकी गतिअधिक बजावैं ॥
होअनुराग रागनीगावैं । वाजेअद्भुत अधिक बजावैं ॥
१ तिरछे २ छल्लेकी समान लहरी जिनमें होती हैं ॥
४