भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ अमरलोकअखण्डधामवर्णन ॥
दो०-प्रणमों श्री शुकदेव को, सो हैं गुरू दयाल ।
काम क्रोध मोह लोभ से, काढ़े मेरे साल ॥
वाणी विमल प्रकाश दी, बुधि निर्मल की तात ।
मोहि मूरख अज्ञानको, नहिं आवत ही बात ॥
अमरलोक वर्णन करों, वेही करं सहाय ।
दृष्टिहिये मम खोलिकरि, सबही देहिं दिखाय ॥
भेद लियो गुरुदेव सों, अद्भुत रचौं ग्रन्थ ।
साखी वेद पुराण मैं, जानी सुनियो सन्त* ॥
भेद अगोचर कोइकोइ जानै । गुरू दिखावै तौ पहिंचानै ॥
पता कहैं कछु वेद पुराना । ज्योंका त्यों उनहूं न बखाना ॥
कछु कछु मत मारगहू भाखैं । फिरि भूलैं समुझैं नहिं साखैं ॥
हरि कृपा प्रकट मैं गाया । किया उजागर खोलिदिखाया ॥
दो०-महा कठिन दुर्लभ हुता, अमरलोक का भेद ।
ताको मैं बीजक कियो, भाषो भेद अभेद ॥
निराकार तौ ब्रह्म है, माया है आकार ।
दोनों पदही को लिये, ऐसा पुरुष निहार ॥
माया जीव दोउ ते न्यारा । सो निज कहिये पीव हमारा ॥
क्षर अक्षर निहअक्षर तीनो । गीता पढ़ि सुनि इनको चीन्हौं ॥
गीता अक्षर जीव बतावै । क्षरमाया सोइ दृष्टि दिखावै ॥
निहअक्षर है पुरुष अपारा । ज्ञानी पण्डित ल्योह विचारा ॥
जीवआतम परमातम दोऊ । परमातम जानत हैं कोऊ ॥
आतम चीन्हि परमातम चीन्हो । गीतामध्य कृष्ण कहि दीन्हो ॥
प्रथमपाठ *- सत्य ।