भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
एक रूप एकै गति पाई । एक बरण एकै सबदाई ॥
संशय शोक रोग नहिं दहै । मगनरूप मन आनँद लहै ॥
षोड़शवर्ष अवस्था नितही । गुण पौरुषहरिजनके अतिही ॥
दिव्यभूषण दिव्यवस्त्र अङ्गा । श्यामगात सुन्दर छवि अङ्गा ॥
जुलफैं लटकिरहीं कजियारी । कुण्डलछविसोहत अधिकारी ॥
नासामोती सुब्रक सुढारा । सुन्दरतिलक लगतअति प्यारा ॥
दीरघ दृग कछूक अरुणाई । माथे मुकुट जटित ललिताई ॥
घरघर दिव्य आसन सिंहासन । और महासुखहैं हरिदासन ॥
दो० भौ मेटन अरुतिम हरण, तुमहिं नवाऊं शीस ।
चरणदास चरणन पर्यो, भक्तिकरो बकसीस ॥
शुकदेव गुरु कृपाकरी, दीन्हो भेद लखाय ।
साधुनके पग पूजतैं, सकलव्याधि मिटिजाय ॥
आस पास हरिजन रहें, मध्य ईश दरबार ॥
रसिक केलि बहु कुंजहैं, ललित द्वारहैं चार ॥
राजमहल जनपति रहें, कापै बरण्यो जाय ।
गिनत शारदाछविअधिक, गौरीसुत थकिजाय ॥
अनन्त भानु* कोसोउजियारो । वा 'मण्डल को रूप विचारो ॥
समतुल और कास को लाऊं । बैन सैन दै ताहि बताऊं ॥
चन्द सूर² वह ठौर न चीन्हो । दृष्टान्त देन†को पटतर दीन्हो ॥
आदि अनादि पुरातम धामा । जैसे आदिपुरुष घनश्यामा ॥
श्वेत‡रूप स्वरूप सुगन्धा । सहज महक जहँ उठत सुगन्धा ॥
चार द्वार बहु बाजन बाजैं । अनहद शब्द महाध्वनिगाजैं ॥
दिव्यरूप जो लगे किवाँरा । तिनके आगे बाग सुढारा ॥
१ सुन्दर २ सूर्य ॥
*प्रथम पाठ भानु अनन्त भानुसरिस।हितदृष्टान्त सो।श्वेतहि रूप ॥