भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ स्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
माया उपजै विनशै अतिही । चेतन ब्रह्म अमरहै नितही ॥
पारब्रह्म पुरुषोत्तम जानो । चरणदास के सो मन मानो ॥
दो०-अमरलोक बिच पुरुषहै, ब्रह्म जु सबके माहिं ।
माया दरशत है सबै, ब्रह्म दीखतै नाहिं ॥
अब सुन अमरलोक की वानी । त्रैगुण रहित परम सुखदानी ॥
तेज पुंजके ऊपर राजै । अहंविराट सो बाहर गाजै ॥
ताको ज्योति कहत नरलोई । तेजपुंज कहियत है मोई ॥
सूरज मण्डल ताहि बतावै । जोगी जोग जुगत सों पावै ॥
सूरज मण्डल जैहैं चीरा । वालोकै कोइ पैहैं वीरा ॥
कोटिभानु कोसो उजियारो । तेज पुंजको रूप विचारो ॥
तीनि लोकसों बाहर होई । सात भवन सों बाहर सोई ॥
ताके ऊपर अविचल लोका । पापपुण्य दुख सुख नहिं शोका ॥
काल न ज्वाल अवधि नहिं होई । रनजीतदास जहाँ सुरतिसमोई ॥
महाअगोचर¹ गुप्तसों गुप्ता । जहां विराजत हैं भगवंता ॥
अमरलोक गौ लोक कहावै । चौथा पद निर्वान बतावै ॥
अगमपुरी बेगमपुर ठाऊं । कहा बुद्धिसों सब गति गाऊं ॥
कंछुइक वरणि बताऊं वाको । ब्रह्मासुत सतजुग में भाषो ॥
पुहुपद्वीप है श्वेत अकारा । सब ब्रह्माण्डनसूं है न्यारा ॥
जो कोइ जाय बहुरि नहिं आवै । आवागमन सकल बिसरावै ॥
जो कोइ गयो बहुरि नहिं आयो । देही दिव्यरूप अति पायो ॥
सोलह बरष उमर नित रहै । अजर अमर निधि आनँद लहै ॥
बूढ़ा बाला होय न तरुणा । षोड़श भानुरूप जहाँ धरणा ॥
तत्त्वस्वरूपी काया पावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥
१ देखने में न आवै ॥