भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमरलोकअखण्डधामवर्णन । १७
पांचतत्त्व विनहै थिरथायो । ना वह बन्यो न कृत्यबनायो ॥
ओर छोर कछु दीखत नाहीं । कबसों है और कबसों नाहीं ॥
है अडोल मर्याद न ताकी । वेपरमान वेद यों भाषी ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । कछू कछू धरिध्यान बतावै ॥
अनन्तभानु के सो उजियारो । पिण्ड ब्रह्मण्ड दोउते न्यारो ॥
लोकमध्य अविचल निजधामा । श्वेतरूप अगमपुर नामा ॥
अगमपुरी निरधारा सूची । हंसलहैं जिनकी मति ऊंची ॥
बेहद लोक बन्यो अतिभारी । असंख्यभानु कीसी उजियारी ॥
दो० हदकहूँ तौ है नहीं, बेहद कहूँ तौ नाहिं ।
ध्यान स्वरूपी कहतहौं, बैन सैन के माहि ॥
अतिउज्ज्वल रवि दृष्टिन ठहरे । मणि हीरा लागे जहाँ गहरे ॥
कई रङ्गके हीरा भाखे । कलश कँगूरा स्थिरराखे ॥
ताभीतर बहु द्रुम* अशोगा । अक्षयवृक्ष फललगे निरोगा ॥
कल्पवृक्ष बहुरंग विरङ्गा । फल ओर पात फूल इक सङ्गा ॥
कोमलदल शोभा अतिभारी । अजर पुरुप दर्शन अधिकारी ॥
चेतनरूप गहर अतिछाहीं । साधु रहत तिनकी परछाहीं ॥
षोड़श भानु सम देह स्वरूपा । हरिरस मदमाते निधिरूपा ॥
उन वृक्सनके निचनिच मंदिर । अनगिन महल महामठ सुन्दर ॥
महलमहलपर ध्वजा पताका । पुरुपोत्तमपुरुप†नामलिखिराखा॥
ध्वजा पाताका लहरत ऐसे । खिमत वीजुरी बहुतक जैसे ॥
रतन जटिल तिनकी अँगनाई । बैठत उठत चलत हरषाई ॥
काम क्रोध नहिं लोभ अधीरा । निर्मल दिशा शील गुणधीरा ॥
जहां न आलस नींद जँभाई । भूखप्यास मलता नहिं भाई ॥
मैल पसीना आंसू नाईं । दिव्य देहधरि रहे गुमाईं ॥
प्रथमपाठ* द्रुम बहुत †सु ॥