भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुवचन ॥
अब मैं वर्णन करत हौं, एशिष धर्म जहाज ।
तामें बैठे विधि सहित, रहनी गहनी साज ॥
जो कोई करणी ना करै, बहुत करै बकवाद ।
रीता जानौ तासु को, छूटै ना जग व्याध ॥
कथनी कै पूजी नहीं, करणी है ततसार ।
तामें लाभहि लाभ है, बदला दे कर्तार ॥
सूरति कीन्ही साधु की, तन मन लागी आग ।
बिन करणी कैसे बुझै, हरिसों नाहीं लाग ॥
कथनी कथि दंभी भये, कहैं दूर की बात ।
अन्तरमें करणी नहीं, मनहीं माहिं लजात ॥
दंभी उनको जानिये, जगमें सिद्ध दिखात ।
तनमन बचन नसाधिया, तिहुँविधि रोपी घात ॥
तनमन साधै साधु सो, वचन साधि जो लेय ।
उज्ज्वल करणीकै सहित, रामभक्ति चितदेय ॥
तनसों करणीही करै, मनसों निश्चय लाय ।
वचन जो ऐसा बोलिये, जो सबहीको सुहाय ॥
बिन करणी १थोथी सब बातें । जैसे बिन चंदाकी रातें ॥
तातै समुझि करो तुम करणी । बिन बोये नहिं उपजै धरणी ॥
जैसा बोवै तैता लुनिये । जानत ज्ञानी पण्डित गुनिये ॥
कीकर नींव बवै सोइ पावै । अरु मेवा वोवै सोइ खावै ॥
पिछिली करणी अबकै पावै । ताहीको नर करम बतावै ॥
होनहार अरु भाग वही है । परालब्धै सोइ बड़ोकही है ॥
खोटी करणी से दुख भारी । होवै रंक पुरुष अरु नारी ॥
१ बेकार २ चन्दुर .३ भाग्य ॥