भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ श्रीगुरुचेलासंवादधर्मजहाजप्रारम्भ ॥
शिष्यवचन ॥
दो०-अर्ज करै कर जोरिकै, यह चरणनको दास ।
एहो श्रीशुकदेव जी, कछु पूंछन की आंस ॥
गुरुवचन ॥
पूंछौ मनको खोल करि, मेटौ सब सन्देह ।
अरु तुम्हरे हिरदय बिषे, सदा हमारो गेह ॥
शिष्यवचन ॥
मैंतो चरणहि दासहौं, तुम तौ परम दयाल ।
एकन पग पनहीं नहीं, एक चढ़ें सुखपाल ॥
यही जु मोहिं बताइये, एक मुक्ति को जाहिं ।
एक नरकको जाय करि, मार यमोंकी खाहिं ॥
एकदुखी इक अतिसुखी, एक भूप इक रंक ।
एकन को विद्या बड़ी, एक पढ़े नहिं अंक ॥
एकन को मेवा मिलै, एकन चनेभि नाहिं ।
कारण कौन दिखाइये, करि चरणनकी छाहिं ॥
यही मोहिं समझाइये, मनका धोखा जाइ ।
ह्वै करि निस्संदेह मैं, चरण रहौं लपटाइ ॥
गुरुवचन ॥
जिन जैसी करणी करी, तैसेही फल पाय ।
भुगतत हैं वे जगत में, ताको बदला आय ॥
शिष्यवचन ॥
कही तुम्हारी हिय धरी, व्यासपुत्र शुकदेव ।
सुगत कुगत करणीनको, भिन्न भिन्न कहु भेव ॥