भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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अमरलोकअखण्डधामवर्णन । १७
पांचतत्त्व विनहै थिरथायो । ना वह वन्यो न कृत्यवनायो ॥
ओर छोर कछु दीखत नाहीं । कवसौं है और कवसों नाहीं ॥
है अडोल मर्जाद न ताकी । वेपरमान वेद यों भाषी ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । कछू कछू धरिध्यान वतावै ॥
अनन्तभानु के सो उजियारो । पिण्ड ब्रह्माण्ड दोउते न्यारो ॥
लोकमध्य अविचल निजधामा । श्वेतरूप अगमपुर नामा ॥
अगमपुरी निरधारा सूची । हंसलहैं जिनकी मति ऊंची ॥
वेहद लोक वन्यो अतिभारी । असंख्यभानु कीसी उजियारी ॥
दो० हद्दकहूँ तौ है नहीं, वेहद कहूँ तौ नाहिं ।
ध्यान स्वरूपी कहतहौं, वैन सैन के माहि ॥
अतिउज्ज्वल रवि दृष्टिन ठहरे । मणि हीरा लागे जहाँ गहरे ॥
कई रङ्गके हीरा भाखे । कलश कँगूरा स्थिरराखे ॥
ताभीतर वहु द्रुम* अशोगा । अक्षयवृक्ष फललगे