भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रजचरित्रवर्णन । ११
वेद पुराण संहिता गावैं । चारोंयुग हरिभक्ति बतावैं ॥
दो० इत उत भटको जग फिरै, कीन्हों नाहिं विचार ।
सत्य पुरुष जानों नहीं, कैसे उतरै पार ॥
द्वापर बीतो कलियुग आयो । राजाको शुकदेव सुनायो ॥
कलियुगकी दुर्बुद्धि बताऊं । सुनहुपरीक्षित कहि समुझाऊं ॥
ओछी बुद्धि मनुज की होगी । सकलविकल अरु मनके रोगी ॥
सूक्ष्म ज्ञान महाअभिमानी । नहीं मानिहैं वेद पुरानी ॥
परमेश्वर की निन्दा करि हैं । भूत मसानी चित में धरि हैं ॥
खेतरपाल १ भूमिया मानैं । कुत्रिमको कर्ता करिजानैं ॥
परमेश्वर की बात न भावै । एसो उत्तर तुरत बतावै ॥
कहैं राम् कहां है भाई । हमहूँ को तु देहु दिखाई ॥
दो० चहूँओर हरिको विभव, सातद्वीप नौखण्ड ।
चरणदास* कहैं सुन अधिर, किन रच्यो ब्रह्माण्ड ॥
भक्ति विना दीखै नहीं, इन नयनन हरिरूप ।
साधुन को परगट भयो, विना भक्ति हरिरूप ॥
साधुसन्तकी निन्दा करिहैं । भजन करै तासों वहु अरि हैं ॥
करि अभिमान आपमें जरिहैं । गुरुको कहो नेक नहिं करिहैं ॥
पंथ खड़े करि हैं छत्तीसा २ । भरमपूजि तजिहैं हरि ईसा ॥
दम्भ झूठ की सेवा करिहैं । झूठे पंथन में जा लरिहैं ॥
गऊ ब्राह्मण भ्रष्टल होई । बाप पूत में परिहै दोई ॥
विद्या दान कपट व्यवहारा । राजा दुष्ट दुखित संसारा ॥
वेद पढ़े करि हैं अभिमाना । हम पंडित अरु सब अज्ञाना ॥
१गांव का चौकीदार २ छत्तीस प्रकारके पंथ ॥
प्रथमपाठ * चरण दाससुन