भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रजचरित्रवर्णन । ६
रतन चौकहै पीठ हथेली । लगी जँजीर मुँदरियन भेली ॥
सोहैं छाप छला अरु मुँदरी । नुहसत पहिरे सुन्दर अंगुरी ॥
इकीस चिह्न चरणनमें धारे । झुनुक झुनुक पैंजनिझनकारे ॥
मन्द मन्द विहँसत मुसकाई । रणजीत* मीतछविकहीनजाई ॥
नितकिशोर अरुनित्तकिशोरी । द्वादश वरष अवस्था भोरी ॥
राधे भूषण छवि कह गाऊं । नाव लेत मनमें शरमाऊं ॥
हूं मैं दास नाव रणजीत । भक्तिदान मोहिं दीजैरीत ॥
बहुत सखी जिनके निजसंगा । रासकेलि खेलें बहुरंगा ॥
वनके चौंसठि खम्भे माहीं । होत अखण्ड रास वहि ठाहीं ॥
झुनुक झुनुक सखियन पगबाजैं । घुँघुरू अधिकमहाध्वनिगाजैं ॥
दिव्य भूषण पहिरे पियप्यारी । शशिव१दनी तिरगुणते न्यारी ॥
नवल किशोरी गोरी सारी । सुघर सयानी चतुर नारी ॥
दिव्यवस्त्र अरु मधुर शरीरा । अधिक रूप छवि गहर गंभीरा ॥
कजरारी कच२ लटकैं बेनी । अंजन नैन सैन पियदेनी ॥
चूड़ामणि गहनो छवि नीको । शीशफूल अरु वेनीटीको ॥
नथबुलाक अरु बन्दी झलकें । घूंघुरवाली लटकैं अलकैं ॥
मुखऊपर अलकैं छवि ऐसी । चन्दचढ़ी दो नागिनि जैसी ॥
करणफूल सँग झुमके मलकें । सब सखियनके भूषण झलकें ॥
चम्पाकली नौलड़ी माला । चन्दनहार सुपहिरे वाला ॥
कठुला जैसे गले जनेऊ । अरु हिय चौकी महा अभेऊ ॥
फूलमाल सखियां सब पहिरे । गुंजनकी माला हिय लहिरे ॥
बांहन में बाजूबंद बांधे । वंकबला बांहन पर साधे ॥
सदा सुहागिनि पहिरे चूरी । सुवक पछैली वँगरी रूरी ॥
१ चन्द्रमाकासा वदन २ बाल ॥
प्रथम पाठ * रणजित मित ॥