भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमरलोकअखण्डधामवर्णन । १६
हरो बाग अद्भूत है भाई । दूजे द्वार महा अरुणाई ॥
तीजे द्वार बाग पियराई । चौथे ऊदो है थिरथाई ॥
उन बागन के आसा पासा । बहुत भवन जहाँ साधुनिवासा ॥
मैड़ी* मण्डप बहुत सुढारी । श्वेत वरण सुन्दर अधिकारी ॥
साधु सन्त जहाँ हरिजन पूरे । दास भाव भावना झूरे ॥
षोड़श भानु की‡ सुन्दरताई । जगत जीति पहुँचै जो जाई ॥
सखाभाव पहुँचत वहि ठांई । सखीभाव भीतर को जांई ॥
धरै स्वरूप अनूपम भारी । सदा सुहागिनिहरिपिय प्यारी ॥
परमपुरुष पुरुषोत्तम पावैं । निकटरहैं नित केलि बढ़ावैं ॥
चारौ मुक्ति¹ जहां कर जोरैं । भाव बताय तान बहु तोरैं ॥
दरशन, कारणकी सुखदाई । धरे स्वरूप रहैं हरपाई ॥
रतनजटित जहँ भूमि सुहाई । कोटि भानु छवि रहतलजाई ॥
एकसमय नित ऋतु छवि पावत । शीत उष्ण पावस नहिंआवत ॥
ऋतु वसन्त पीरी छवि सोहैं । वनघन कुंजलता मनमोहैं ॥
निज वृन्दावन है वह ठाहीं । सदा बसो मेरे मनमाहीं ॥
दिव्य फूल फूले बहुरंगा । बिन ऋतु फूले रंगविरंगा ॥
सकल सखी विचरत हरिसंगा । गोरी सखी श्याम हरी अंगा ॥
दो०-पुहुप जु फूले नित रहें, मोरैं ना कुम्हिलायँ ।
कई वरण कइरंगसों, अति सुगन्ध हरपायँ ॥
उन पुहुपन को नाम न जानौं । कहा नाम लै ताहि बखानौं ।
बहुत वृक्ष कुंजन घनछाहीं । फल अरु फूल लगे उनमाहीं ॥
काहू द्रुम न फल नहिं फूला । पुहुपरूप ह्वै आपहि झूला ॥
कोऊ लाल रूप ह्वै छायो । कोऊ श्वेत रूप मन भायो ॥
१ सायुज्य सारूप्य सामीप्य सालोक्य ॥
प्रथमपाठ * मन्दिर † दाससुभाव ‡ कि ॥