भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 54, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंअमरलोकअखण्डधामवर्णन । २१
रतनजटितकी खिड़की सोहैं। ताके आगे दिनकर कोहैं ॥
भीत झरोखा कलशन माहीं। नग पन्ना लागे सब ठाहीं ॥
दो० मणि हीरा माणिक लगे, रंगमहल के माहिं ।
बिन पहुंचे निज धामके, क्योंहूँ दीखत नाहिं ॥
आसपास बहु कुंज हैं, बीच लालको धाम ।
चरणदास को दीजिये, सखियन में विश्राम ॥
जैसे चौसठ खम्भ हैं, तैसे करों बखान ।
छत्र सिंहासन वर्णहूँ, ओर सखियन की आन ॥
तीस खम्भमें खम्भा बीस । तामें चौदह खम्भा ईस ॥
परम बिछौना है थिरथाये । मानौ सूरज लक्ष छवि छाये ॥
तापर सिंहासन बड़भागी । श्वेतरूप चेतन अनुरागी ॥
सिंहासन पर कछू बिछायो । शोभा ताकी कहत न लजायो ॥
धरो गेंदवा तकिया नीके। छत्तर सोहै ऊपर पियके ॥
पियकी शोभा कहा बखानूं । आदि अन्त ताको नहिं जानूं ॥
अक्षर पुरुष पुरुषोत्तम स्वामी । सब जीवनको अन्तरयामी ॥
पारब्रह्म अविचल अविनाशी । वायें अङ्ग रूपकी राशी ॥
गोरी राधा कृष्ण श्यामघन । सिंहासन पर ललितमुदितमन ॥
आसन जहाँ अखिलजगदीशा । मुकुट चन्द्रिका सोहै शीशा ॥
मकराकृत कुण्डल छवि ऐसी । जग में कहा बखानूं जैसी ॥
जुलफें श्याम भुवङ्गम कारी । कजियारी अरु घुंघुरवारी ॥
सहज सुगन्ध रहे महकाई । लांबी चिकनी अरु बलखाई ॥
बांकी भौंह कुटिल अनियारी । तिरछी पलकें लागें प्यारी ॥
रस के माते घूम घुमारे । ललचौंहैं दृग हैं कजरारे ॥
१ जो कभी जूदा न हो ॥
प्रथमपाठजल ॥