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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 690 में से

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पृष्ठ 43

॰ १२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पढ़ पुराण भेद नहिं जानैं । साधुनसों झगड़ो बहु ठानै ॥
ग्रंथ पुजाय हरि कूं विसरावैं । झूठे वाद विवाद बढ़ावैं ॥
व्यभिचारिणिहोइहैं बहुनारी । बोलैं झूठ बहुत परकारी ॥
शुकदेव कहे राजासूं बैना । सो अब देखे अपने नैना ॥
राजा डांड़ि बांधि करि लूटैं । पूजैं भूत रामसों छूटैं ॥
गऊ विष्ठा सो खाती जानी । पंडित देखे बहु अभिमानी ॥
दम्भ कपट बहु पूजा दौरी । कलुवा जाहर पूजैं बौरी ॥
पण्डित वेद पढ़े बिसरावैं । स्याने भोपे को शिर नावैं ॥
हरि के साधुन को विसरावैं । तजैं राम औरन को ध्यावैं ॥
हरिकी भक्ति सदा चलिआई । वेद पुराणन में जो गाई ॥
इनको समझि भये जो ज्ञानी । नाभा जिनकी भक्ति बखानी ॥
जिनकी महिमासबजगज्ञानी । सबजानत हैं चतुरा ज्ञानी ॥
पीपा सदना सैना नाई । धना जाट अरु मीराबाई ॥
नामदेव रैदास चमारा । तुलसी माधो मीर विचारा ॥
कूंबा कुम्हरा फत्तू सका । सेऊ सम्मन रङ्का वङ्का ॥
करमैती अरु करमा वाई । दास कवीरा वाणीगाई ॥
जैदेवा अरु नरसी महता । दास मलूक कड़ा में रहता ॥
अन्तानन्द कील अरु जंगी । देव मुरारि निपट सरवंगी ॥
नरहरि लालदास हरिवंसा । रंगनाथ बनवारी हंसा ॥
नानक सूरदास और दादू । सनक सनन्दन कहिये आदू ॥
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण शवरी । हनूमान शङ्कर और गवरी ॥
बाल्मीकि अँबरीष सुदामा । मोरध्वज राजा संग्रामा ॥
बहुतक भक्त और जो भये । नाम न जानूं जात न कहे ॥
कई कोटि वैष्णवों बाके । सबही गये मुक्ति के नाके ॥
चरणदास हरिभक्ति विचारी । सुमिरिसुमिरि पहुँचेनरनारी ॥