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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १५
मारो निस्तारो तुमहि, मोको गति नहिं आन ७२
गंगाजल सम श्याम तुम, मैं हों तुम्हरा मीन ।
तुम माता मैं पुत्रवत, समझो सत्य प्रवीन ७३
तुम गैया मैं बत्स सम, मैं पतंग तुम दीप ।
यही चाह चित में बसे, निशिदिन रहों समीप ७४
कहनलगे श्रीकृष्ण तब, सुनहु श्याम चरनदास ।
तुमरे हिय माहीं रहै, हमरो सदा निवास ७५
सन्त हमारी आतमा, यामें नहिं संदेह ।
रोम रोम में रमि रहै, ज्यों बादर में मेह ७६
आज्ञा जो हमने दई, लीजे प्यारे मान ।
भक्ति प्रचारो भक्त में, करो जियन कल्यान ७७
जो आज्ञा करिहों यही, कही चरणही दास ।
देखो चाहूँ सांवरे, सुन्दर रास बिलास ७८
ह्वै प्रसन्न बोले लला, मूंदो अपने नैन ।
आज्ञा दूँ तब खोलियो, हे प्रीतम सुख दैन ७६
मूंदे तबहीं नैन निज, चरणदास तेहि बार ।
बोले पुनि श्रीश्यामघन, देखो पलक उघार ८०
दृगन खोल देखन लगे, तेजोमय उजियार ।
रत्न जटिल अवनी लखी, जगमग जोति अपार ८१
ऋतु बसंत संतत तहाँ, अनगिन बाग बहार ।
फूले फूल अनेक जहाँ, लहरत लता अपार ८२
फुलवारी क्यारी बनी, न्यारी नाना रंग ।
तरुन माहिं बहु वरन के, बोलत विविधि विहंग ८३
बीच विविधि कुंजस्थली, छाई बेलि वितान ।
तिन में सेवा हित रहें, सहचरि सखी सुजान ८४

१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ठौर ठौर सुंदर सुखद, भरे सरोवर नीर ।
कमल खिले बहु रंग के, रोचक बहत समीर ८५
बँग्ला अरु बारहदरी, बनी अनेकन और ।
तिन पर सूवा सारिका, क्रीड़त मोरी मोर ८६
मध्य महारमनीक इक, रतन जटित सुढार ।
बन्यों चौतरा अति सरस, मंडल गोलाकार ८७
चौसठ खम्भा तासु पर, जटित- जवाहर लाल ।
पचरँग चुन्नी चमकनी, बूंटा वेलि सुढाल ८८
चौंसठ खम्भा पर बनो, रंग महल रस खान ।
मणि माणिक बहुँ दिसि जड़े, जगमग जोति महान ८६
चौंसठ कलश सुहावने, ध्वज पताक धजदार ।
लहरत फहरत तड़ित सम, दमकत दुति मनहार ६०
चौंसठ खम्भा मध्य में, विछी विछायत खूब ।
नरम रेशमी गलीचा, अतिशय सरस अजूब ६१
गुलदस्ता सुंदर सजे, सुमन अनेकन रंग ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १७
चहों ओर ठाड़ी सखी, मनहुँ प्रेम की माल ६७
चमर मोर छल अरु छरी, लिये खरी कोइ बाल ।
इतरदान लीने कोऊ, कोउ कर लिये रुमाल ६८
पानदान लेकर कोऊ, कोउ फूलन की माल ।
कोउ दरपन अरपन करत, छविलखि होत निहाल ६६
सन्मुख श्यामा श्याम के, खड़े सखिन के वृन्द ।
इकटक निरखत युगलको, मनहुँ चकोरी चंद १००
सखी रास रस करन को, बजवत बीन मृदंग ।
कोउ सितार कोउ सरंगी, कोउ बजात मुहचंग १०१
मधुर मजीरा कोउ अली, लिये बजावत संग ।
कोऊ अलापत सप्तस्वर, हिय में भरी उमंग १०२
कोउ उघटत सांगीतअली, नृतत गति नव ढंग ।
भाव बतात नचात दृग, लचकावत कटि अंग १०३
जै जै जुगल किशोर कहि, कोऊ रही हरषाय ।
गोदन भर अति मोद मन, सुमन रही वरषाय १०४
चरणदास तहां अपन का, देखे सखी सरूप ।
नव यौवन सुकुमार तन, नख शिख सुंदर रूप १०५
सिंहासन के सन्निकट, रही दोऊ कर जोर ।
तब हँसि बोले श्री हरिः, चितय चपल दृगकोर १०६
अब नीके लखि लीजिये, लीला रास विलास ।
सुख रासी दासी चरन, आव हमारे पास १०७
चरणदासि कर गहि उठे, श्री मत गोपीनाथ ।
पुनि लालन निरतन लगे, प्राण प्रिया लै साथ १०८
वाम अंग श्री राधिका, दहिने चरणहिदासि ।
मध्य बिहारी लाल जू, नृतत उमँगि हुलासि १०६
चहों ओर आली नचत, मंडल गोल बनाय ।

१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निरखत छवि रस माधुरी, हर्ष न हृदय समाय ११०
लेत स्वल्पगति लाड़लो, बहुबिधि भाव बताय ।
नैन नचा लचकाय कटि, ताथेइया मुख गाय १११
अंग संग दै अधर रस, प्यावत प्रेम बढ़ाय ।
चरणदासि को श्यामघन, लेत भुजन भर धाय ११२
मुकट लटक मन को हरत, अलक रही बलखाय ।
छुटी कपोलन लाल के, चित को लेत चुराय ११३
मकराकृत कुंडल श्रवन, नाक बुलाक सुढार ।
मोती मटकत अधर पर, अजब सुराहीदार ११४
पाजामा कछनी ललित, पीत रंग मनहार ।
नख शिख लो भूषन सजे, गल फूलन के हार ११५
रंग रँगीली लाड़िली, मदन मनोहर लाल ।
नटवर गति ले ले नई, रस बस कीनी बाल ११६
श्री राधे रासेश्वरी, सखियन की सरदार ।
दरसायो चरनंदासि को, नित नवरास बिहार ११७
पुनि राजे दम्पति तबहि, सिंहासन पर जाय ।
चरणदासि को कर कृपा, लइनिज निकटबुलाय ११८
हँसि बोले श्री हरि बचन, करके प्रेम अपार ।
चरणदासि जा जक्त में, भक्ति करो विस्तार ११६
तबहि दासि दोउ जोर कर, आज्ञा सिर धर लीन ।
परिक्रमा करके बहुर, चरण प्रणाम सुकीन १२०
नैन मूंदि निज लीजिये, कही कृष्ण भगवान ।
दृग मूंदे तब दास ने, ताही समय पिछान १२१
पुनि आकाशबानी भई, चक्षु खोल चरनदास ।
दृग खोलतही आ गये, बंशीवट के पास १२२
संतरूप आपन लखो, श्याम चरन के दास ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १६
बिछुरन दम्पति मन समझ, अतिशय भये उदास १२३
धरनि गिरे व्याकुल विरह, देह दशा विसराय ।
नैनन जल धारा बही, करत हाय हरि हाय १२४
इसी भांति बीतो दिवस, होय गई पुनि रैन ।
प्रगट भये शुकदेव मुनि, निजशिष्यको सुखदैन १२५
श्री सतगुरु नैनन निरखि, उठ करि चरण प्रणाम ।
व्याकुल हो बिलपन लगे, बिनश्रीश्यामाश्याम १२६
विनय करी कर जोर के, दम्पति दरस कराय ।
नाहीं तो तन त्यागि के, जीव निकस यहजाय १२७
श्री शुक मेस्तक शिष्य के, धरो कृपा कर हाथ ।
बंशीवट नीचे लखे, श्याम राधिका साथ १२८
गलबैंयां दीने युगल, नवल लाड़िली लाल ।
मंद मंद मुसकात मुख, रूप राशि छवि जाल १२६
श्री दम्पति के दरस कर, छके श्याम चरनदास ।
रोम रोम में प्रगट भयो, परमानंद हुलास १३०
शिष्य के मस्तक से तभी, मुनि लियो हाथ उठाय ।
दृष्टि परे दम्पति न तब, अचरजभयोअधिकाय १३१
श्री शुक मुनिचरनन परे, श्यामचरन के दास ।
धन्यवाद श्री गुरुन को, कीनो सहित हुलास १३२
पुनि गुरु शिष्य दोऊन में, ज्ञान गोष्टि सम्वाद ।
रह्यो रैन में रंग अति, उर उपजो आह्लाद १३३
प्रात होत शुक मुनि कही, सुनो श्याम चरनदास ।
दिल्ली जाके तुम करो, श्री हरि भक्ति प्रकास १३४
शिष्य करी तब दंडवत, श्री गुरुचरनों माहिं ।
शीश उठा देखन लगे, शुक मुनि दरसे नाहिं १३५
श्रीशुक मुनि धर ध्यानउर, श्यामचरन के दास ।

२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बृन्दाबन से गवन कर, दिल्ली कियो निवास १३६
रहन लगे आनन्द सों, कृष्ण ध्यान गलतान ।
नर नारिन उपदेश दे, भजन करें भगवान १३७
दूर देश रमत करन, जावें श्री महाराज ।
भक्ति प्रचारें जक्त में, परमारथ के काज १३८
रूप अनेकन धार के, भक्तन करी सहाय ।
जल थल देश बिदेश में, चरणदास प्रगटाय १३६
बैष्णव नागरिदास को, जगन्नाथ निज रूप ।
दरसायो करि के कृपा, सुंदर अधिक अनूप १४०
बैजनाथ विप्रने लखे, श्री महाराज सुजान ।
चरण प्रछाले गंगजल, शिष्य ह्वगए अस्थान १४१
बैष्णव परमानंद की, मनसा पूरन कीन ।
कृष्ण रूप निज है प्रभो, दर्श दयानिधि दीन १४२
जोग जीत गुरु छोन कों, दरसायो निज धाम ।
अमर लोक सँग ले गये, जहां श्री राधे-श्याम १४३
राम सखी सह वपु गई, श्याम सुँदर के संग ।
जा पहुँची निज धाम में, जहां रास रस रंग १४४
श्री मति कुंजो मात कों, दरस कराये श्याम ।
तन को तज के फिर गई, अमरलोक निजधाम १४५
बिबिचारी जय करन को, कियो कृतारथ जाय ।
अमर लोक में ले गये, दम्पति दरस कराय १४६
स्वर्ग प्रवाही गंगजल, सेवक दिये न्हवाय ।
जय जय श्रीमहाराज की, सकल उठे मुख गाय १४७
साधू परमानंद को, डसो सर्प ने आय ।
श्यामचरण के दास प्रभु, लीनो तुरत जिवाय १४८
दो कन्या पैदा हुई, सेवक के घर आन ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । २१
निज प्रभुता सों पुत्र किए, चरणदास भगवान १४९
रक्षा कीनी बैल सों, शिष्य प्रेम गलतान ।
घोड़े से लीनो बचा, निरमलदास सुजान १५०
जमुना में न्हावत हुते, मुक्तानंद सु संत ।
ग्राह ग्रसे लीने छुड़ा, चरनहि दास तुरंत १५१
दूसर आतम राम को, दीने नर्क दिखाय ।
भय मानो यमदूत लखि, चरण शरणलइ आय १५२
बैठे जमुना नाव में, डूबन लागे संत ।
ध्यान धरो महाराज को, दिये उवार तुरंत १५३
छै महिने पहिले कह्यो, आवन नादिरशाह ।
परचय पा चरनन परे, शाह मुहम्मदशाह १५४
माना नादिरशाह ने, भक्त राज इर्शाद ।
मुरशद पीर पिछान के, कीना निज दिलशाद १५५
गिलचे आये क़तल को, कियो तरवार प्रहार ।
हाथ हुवे जड़ सबन के, तब मन मानी हार १५६
नौधा प्रेमा - पराको, निशिदिन बरसे रंग ।
सदा होइ हरिकीरतन, बाजत बीन मृदंग १५७
सेवक साधू सन्त सब, रहें ध्यान लवलीन ।
युगल लगन में मग्ननित, प्रेम सिंधु मन मीन १५८
भक्ति हरी को कर दियो, श्री महाराज प्रचार ।
भारत में करने लगे, प्रेम भक्ति नर नार १५९
सर्परूप श्री हरी ने, पार्षद दिया पठाय ।
आवो प्यारे धाम अब, दियो संकेत जनाय १६०
तब निज सन्तनको बुला, बोले श्री महाराज ।
हमजावें हरिधाम को, कर मन वांछित काज १६१
भक्ति भजन करते रहो, सुमरो श्री हरिनाम ।

२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हरि गुरु उर विश्वासरख, रहो सदा निष्काम १६२
तुम सब तन तजि आयहो, निश्चय मेरे धाम ।
प्रेम प्रीति कर प्यारसों, बोले गुरु गुण ग्राम १६३
श्री हरि आज्ञा सिरधरी, करी तयारी धाम ।
दशम द्वार निज पुरगये, जहाँ श्रीराधे श्याम १६४
-सम्बत अठारह सौ हुते, ऊपर उन्तालीस ।
देहत्याग चरनदास प्रभु, गये धाम जगदीस १६५
अस्सी बर्ष भूतल बिषे, राजे श्री महाराज ।
सरसमाधुरी भक्ति हरि, जक्त प्रचारन काज १६६
✱ श्रीमत्श्यामचरणदासाचार्यमहिमा ✱
चरणदास के चरण में, जो जन आये धाय ।
सूरज मण्डल बेधकर, बसे अमरपुर जाय १६७
भेजे श्यामा श्याम ने, करन जगत उद्धार ।
चरनदास ने कृपाकर, किये पतित भवपार १६८
चार पदारथ प्रेम सो, सबको कीने दान ।
चरणदास ने दयाकर, कियो जक्त कल्यान १६६
नवधा प्रेमा अरु परा, दियो भक्ति उपदेश ।
किये कृतारथ जीवजग, पार न पावत शेष १७०
ज्ञान दियो ज्ञानीन को, जोगिन को दियो जोग ।
भक्तनको दइ भक्ति हरि, मेटे भव दुख रोग १७१
ज्ञानी विज्ञानी बड़े, जोगिन के सिरताज ।
रसिका चारज मुकुटमणि, चरणदास महाराज १७२
दयावान दाता बड़े, परदुख भंजन हार ।
पतितन के पावन करन, चरणदास अवतार १७३
सब सद्गुण सम्पन्न हैं, सब लायक महाराज ।

श्रीमत्श्यामचरणदासाचार्यमहिमा । २३
सदा सहायक जनन के, मण्डन सन्त समाज १७४
लोक और परलोक के, सुखदायक सिरमौर ।
व्यापिरहै सब विश्व में, भीतर बाहर ठौर १७५
भक्तन के मन भावने, रसिकन के रिझवार ।
प्रेमिन के प्रभु प्राण प्रिय, चरणदास सरकार १७६
शिष्यन के संशय हरन, सेवक जन प्रतपाल ।
आश्रित जन रक्षा करन, श्री रणजीत दयाल १७७
प्रगट भये संसार में, दूर करन भुव भार ।
धर्म सनातन भागवत, चहूँ दिशिकरन प्रचार १७८
जिज्ञासू जन मुमुक्षु, चरण शरण लइ आय ।
चरणदास प्रभु कृपाकर, श्रीहरि दिये मिलाय १७६
सेवा में ठाड़ी सदा, अष्टसिद्धि नव निधि ।
चरणदास दाता बड़े, जग में भए प्रसिद्धि १८०
रंकन को राजा किये, दिये मुल्क अरु माल ।
चरणदास चरणन परे, सो सब हुवे निहाल १८१
भूत भविष्य वर्तमान के, त्रिकालज्ञ महाराज ।
चरणदास की दयासों, सुधरे सब के काज १८२
दै दै परचय विविधिविधि, कलिजिय किये सचेत ।
चरणदास विश्वास दे, प्रगटायो हरि हेत १८३
भगवत धर्म प्रचार हित, लियो अवनि अवतार ।
चरणदास तारण तरण, अधम उधारण हार १८४
चार धाम सातोंपुरी, तीरथ क्षेत्र सुठौर ।
चरणदास बहु रूपधर, रमें रसिक सिर मौर १८५
घर घर सेवा श्याम की, राग भोग रसखान ।
चरणदास की दया सो, भक्ति करी भगवान १८६
पुरुषोत्तम परमात्मा, अवतारी जगदीश ।

२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास दृढ़ उपासना, थापी बिश्वा बीश १८७
रसिक अनन्यन की रहनि, रस उपासना भाव ।
चरणदास सबही कहै, सुन उपजै चितचाव १८८
पापी अधम अनेक को, कियो जक्तसों पार ।
चरणदास सन्मुख हरी, पहुँचा ये कर प्यार १८६
बहु जीवनको वपु सहित, कृष्ण ले गये धाम ।
चरणदास की दया सों, मिलो महल बिश्राम १६०
बहुतन को संसार में, श्री हरि दिये मिलाय ।
चरणदास ने सबन की, बिगरी दई बनाय १६१
आचारज को रूप धर, जग में प्रगटे आय ।
चरणदास निज कृष्णहो, दरसन दिये कराय १६२
निर्धन जनको धन दियो, पुत्र हीन सन्तान ।
सबको मन वांछित कियो, चरणदास भगवान १६३
बंधन में जो जन परे, तिनको दिये छुड़ाय ।
मृतक जिवाये बहुत से, महिमा कही न जाय १६४
ज्ञान योग वैराग को, जग में कियो प्रचार ।
कीनो भगवत् धर्म को, चरणदास बिस्तार १६५
ग्रन्थ भक्तिसागर सरस, बानी पांच हजार ।
महाराज बरनन करी, प्रेम भक्ति भंडार- १६६
जोग ज्ञान वैराग को, वरनो विविधि प्रकार ।
अरु गायो निज धामको, अनुपम नित्य बिहार १६७
खंडन मंडन मतन को, कियो न श्री महाराज ।
गीता अरु भागवत मत, बिरचो धर्म जहाज १६८
जो बांचै नित नेमसों, बानी परम पुनीत ।
पावे परमानन्द सुख, धाम् जाय जग जीत १६६
सुन समझे दृढ़ उरधरे, करनी करे जु कोय ।

श्रीमत्श्यामाचरणदासाचार्यमहिमा । २५
लहै पदारथ चार सो, श्री हरि वल्लभ होय २००
बानी रससानी सुनत, नास्तिकता होइ दूर ।
आस्तिकता उपजे अधिक, हरि गुन हिय भरपूर २०१
संप्रदाय शुकदेव मुनि, इष्ट राधिका श्याम ।
चरणदास वृन्दा विपिन, वरणन कीनो धाम २०२
नवनिकुंज ब्रजकी अमित, लीला के रस भेद ।
दिय जनाय निज जननको, कियो सकल भ्रम छेद २०३
दिव्य मानसी महल की, टहल करन की रीत ।
श्यामचरण के दास ने, प्रगट करी सह प्रीत २०४
अली मंजरी सहचरी, सखी सहेली भाव ।
ग्रन्थ भक्ति रस मंजरी, कहे तहां चितचाव २०५
दम्पति सेवा सुख मई, सब को दई बताय ।
श्यामचरण के दासहो, सहचरि पद लियो पाय २०६
रंगमहल युग टहल में, पहुँच लह्यो आनन्द ।
चरणदास चरणन परसि, पायो परमानन्द २०७
चरणदास के चरण की, लई शरण जिन आय ।
तिनको श्री प्रीतमप्रिया, लीने हैं अपनाय २०८
चरणदास के चरणको, जिनके लागो रंग ।
प्रेम पगे प्रीतम प्रिया, तजे न तिनको संग २०६
चरणदास के चरण में, जो दृढ़ लगे सनेह ।
रीझ तिन्हे राधे रसिक, महल खवासी देह २१०
चरणदास के चरण में, जो नवाय निज माथ ।
कुवँरि किशोरी राधिका, रीझ गहे तिहि हाथ २११
श्यामचरण के दास को, जपे प्रेमकर नाम ।
तिनको दम्पतिभुजन भर, हँसि भेटे सुख धाम २१२
चरणदास के ध्यान में, जो जनहो गलतान ।

२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
उज्वल नवल निकुंजरस, करे निरन्तर पान २१३
भजे भावकर जिन्होंने, श्याम चरण के दास ।
पहुँचे सोइ निकुंज में, जहाँ नित्य रस रास २१४
होत रहत जहां परस्पर, दम्पति विविध विलास ।
रहत निकटवर्ती तहां, श्याम चरण के दास २१५
गुस प्रगट लीला ललित, करत राधिका श्याम ।
चरणदास चरणन परसि, पाय तहां बिश्राम २१६
दृढ़ करगहे अनन्य व्रत, चरणदास प्रभु . इष्ट ।
सरसमाधुरी रस मिले, महा मधुर अति मिष्ट २१७
जो जन मन वच कर्मकर, भजे श्याम चरनदास ।
रिधिसिधि सम्पति प्राप्तहो, अशुभ अमंगल नास २१८
लोक और परलोक के, रक्षक श्री महाराज ।
सरस माधुरी शरण की, सबविधि उनको लाज २१६
स्वामी रामहि रूपजी, जोग जीतजी जान ।
दोउनने अनुपम कह्यो, जीवन चरित बखान २२०
तिन दोउनको सार यह, सूक्ष्म रचना कीन ।
पढ़ौ सुनौ सब प्रेमसों, साधू रसिक प्रवीन २२१
जैसे सुन्दर सुमन की, लई सुगन्धि निकार ।
सरस माधुरी ने रचो, यह चरितामृत सार २२२
चरितामृत का। प्रीतकर, पठन करे नित जोय ।
सुफल होहिं सब मनोरथ, गुरुभक्ति दृढ़ होय २२३
शुभ सम्बत उन्नीससौ, और तिहत्तर जान ।
चैत्र कृष्ण तिथि द्वादशी, भयो समाप्त सुखदान २२४
जयपुर शहर सुहावनो, जहां दरीबा पान ।
सरसमाधुरी ने कह्यो, चरितामृत रसखान २२५
इति ॥

श्रीमन्निकुंजविहारिणे नमः ॥
मङ्गलाचरणम् ॥
प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीकव्यासाम्बरीषशुक-
शौनकभीष्मकाद्याः । रुक्माङ्गदार्जुनवसिष्ठाविभी-
षणाद्या एतानहं परमभागवतान्नमामि ॥ १ ॥
( षोडशाक्षरमहामन्त्रः )
हरेराम हरेराम रामराम हरेहरे ।
हरेकृष्ण हरेकृष्ण कृष्णकृष्ण हरेहरे ॥
( अथ श्रीस्वामी चरणदास रचितग्रन्थ )
॰श्रीभक्तिसागर प्रारम्भ ॥
दो०-मथुरा मण्डल परमशुचि, वृन्दावन रसरास ।
रच्यो शुकमुनी शिष्यने, नाम श्यामचरनदास ॥

२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ ब्रजचरित्रवर्णन ॥
दो०-दीनानाथ अनाथ का, विनती यह सुनिलेहु ।
मम हिरदय में आयकर, ब्रज कथा१ कहदेहु ॥
चारिवेद२ तुमकूं रटैं, शिव शारदा गणेश ।
और न शीश निवायहूं, श्रीकृष्ण करो उपदेश ॥
कै गुरु कै गोविन्द कूं, भक्ता कै हरिदास ।
सबहुँनको एकै गिनौ, जैसे पुहुप३ और बास४ ॥
नारदमुनि अरु व्यासजू, कृपा करहु दयाल ।
अक्षर भूलौं जो कहीं, कहौ मोहिं ततकाल ॥
श्रीशुकदेव दयाल गुरु, मम मस्तक पर ईश ।
ब्रजचरित्र कहत हौं, तुमहिं नवाऊँ शीश ॥
सबसाधुन प्रणाम करि, कर जोरूं शिरनाय ।
चरणदास बिनती करै, वाणी द्योह बनाय ॥
सदा शिव ब्रज में रहैं, करि गोपी को रूप ।
मूरति तौ परगट भई, आप रहत हैं गूप ॥
वंशीवट ढिग रहत हैं, करत रहत हैं ध्यान ।
वक्ता५ वेद पुराण के, परम उत्तम ज्ञान ॥
ब्रह्मादिक कलपत रहें, वृन्दाबन के हेत ।
सुधि आये ब्रजभूमिकी, बिसरिजाय सब वेद ॥
अब ब्रजकी गति गाय सुनाऊं । बुद्धि शुद्धि हरि भक्ति जु पाऊं ॥
चिन्ता मेटन भूमि बखानी । रण जीतमीत जहँदुर्म विनानी॥
कमलापति को चक्र सुदर्शन । चरणदास ताकोकरै वन्दन ॥
मथुरामण्डल तापर रहै । व्यासदेव मुनि ऐसे कहै ॥
१ सम्पूर्णहाल २ सामवेद ऋग्वेद यजुर्वेद अथर्वण ३ फूल ४ सुगन्ध ५ कहने
वाला ॥

[Header] ब्रजचरित्रवर्णन ३

वाराहसंहिता में जो गायो । सो मैं भाषा बीच बनायो ॥
गोवर्धन महिमा अति भारी । चरणदास ताके बलिहारी ॥
जाकी महिमा सबनैं गाई । जहां कृष्ण नित गऊचराई ॥
खरिकै बनाय धेनु जहाँ राखी । अजहूं चिह्न देत हैं साखी ॥
दो०—गोवर्धन बिनती करूं, मो बिनती सुनिलेहु ।
जगतफांस सों काढ़िकरि, भक्तिदान मोहिं देहु ॥
हाटकरूप अडोल खरारी । जाकी शरण रही ब्रज सारी ॥
तादिन इन्द्र कोप पठायो । सकल मेघ झुकि ब्रजपर आयो ॥
करपल्लवैं पर गिरि हरि धारो । तबहीं शरण रहो ब्रज सारो ॥
दिव्यदृष्टि बिन दृष्टि न आवै । कञ्चनरूप पुराण बतावै ॥
मथुरामण्डल में गिरि सोई । मथुरामण्डल अब सुनिलोई ॥
चौरासी कोशी परमाना । मथुरामण्डल ब्यास बखाना ॥
हरिके चरण सदा जो परसै । कृष्णरूप में निशि दिन सरसै ॥
सखासंग लीये हरि डोलैं । सखियन के सँग करत कलोलैं ॥
दो०—सदा कृष्ण ब्रजमें रहें, मोहिं मिलत हैं नाहिं ।
लहर महर कबहूं करें, आनि गहैं मोरी बाहिं ॥
जामें बारह वन बड़भागी । बारह उपवन हैं अनुरागी ॥
जिनमाहीं हरि वेणु बजावैं । मधुर मधुर बाँके सुरगावैं ॥
चौथै पदको है वह स्वामी । सब जीवन को अन्तरयामी ॥
भक्तन हेतु रहें ब्रजमाहीं । गुप्त रहें वृन्दावन ठाहीं ॥
फिरत रहें सबही वन सुन्दर । अन्तर बन्यो रास को मन्दर ॥
जगत दृष्टि सों रहें अलोपा । मिलिहैं ताहि ध्यान जिनरोपा ॥
मथुरामण्डल परगट नाहीं । परगट है सो मथुरा नाहीं ॥
मथुरामण्डल यही कहावै । दिव्य दृष्टि बिन दृष्टि न आवै ॥

१ गौओंके रहनेका स्थान २ अंगुली ॥

४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो०-वन उपवन अब कहतहौं, मथुरामण्डल माहिं ।
बिना भक्ति ब्रजनाथकी, क्योंहूं दीखत नाहिं ॥
उपवन कदम मंडतंवन दूजा । नंदीसुर नंदवन सूजा ॥
मंगल आनँद वन वहि गायो । जहां महर जा गांव बसायो ॥
संकेत वन सो सब जग जानै । बरसाने सब को पहिंचानै ॥
भोजन थाली वही कहायो । जहाँ बैठि भात हरि खायो ॥
सुगन्ध वन अब सो कहावै । अखण्ड वन पुस्तक दरशावै ॥
खेलन द्रुम वन खेलत रहें । मोहन वन केती वन कहैं ॥
दधि ग्राम वन वही कहायो । लूटि लूटि जहाँ दधि खायो ॥
वत्सहरनवन वही कहायो । ब्रह्मा माया देखि भुलायो ॥
दो०-ग्वाल बाल ब्रह्मा हरे, राखे कहूं दुराय ।
जानि बूझि टारो दियो । लीन्हें और बनाय ॥
जब ब्रह्मा समझो करिज्ञाना । कर्ता कृष्ण सत्य करिजाना ॥
फिरि चेतन है शीश नवायो । आदिपुरुष पुरुषोत्तम पायो ॥
द्वादश उपवन गाय सुनाये । मथुरा मण्डल मध्य बताये ॥
द्वादश वनकी गति सुनि लीजै । जिनमाहीं हरिध्यान करीजै ॥
भद्र वन अति महा सुहायो । श्रीवन लालन के मन भायो ॥
भांडीर वनकी महिमा गाऊं । भिन्न भिन्न कहितोहि समझाऊं ॥
लोहवन महिमा कहियत भारी । महावन सुन्दरता अति धारी ॥
तालर वन वहि दृष्टि निहारो । दानव धेनुक जहँ हरि मारो ॥
दो०-दानौ धेनुक महाबली, भाव भक्ति हरि हेत ।
मुक्तिकाज सेवन कियो, तालरवन को खेत ॥
खदिरवन जानत सब कोई । फूल माल जहँ लालन पोई ॥
बहुलावन घन दुरमन छायो । कुमुदवन तो सो कहिसमुझायो ॥
१ प्रथमपाठ।

ब्रजचरित्रवर्णन । ५
कामावन लालन सुखदाई । मधवन लालन भूमि सुहाई ॥
वृन्दावन की शोभा भारी । रास रच्यो जहाँ श्रीवनवारी ॥
वन उपवन शोभा गति ईशा । शिव ब्रह्मादिक नायो शीशा ।
इन्द्र वरुण - कुबेर विनानी*। इनहूँ गति मति ब्रजकी जानी ॥
बल रावण जहाँ सेवा लाई । ऊंची नवनिधि उनहूँ पाई ॥
सप्तऋषिनं मिलि सेवन कीन्हो । ऊंचो आसन ध्रुवको दीन्हो ॥
दो० बहुतक सुर नर तरिगये, तपकरि ब्रजके बीच ।
जाति पांतिको को गिनै, ऊंचा नीचा नीच ॥
वृन्दांवन सबसों बड़ो, जैसे दूधमें घीव ।
सब धर्मन हरिभक्ति ज्यों, जैसे पिण्डं में जीव ॥
सब तीरथ जगमें बड़े, जिनहूँ में हैं ईश ।
उन तीरथ फलकामना, इहि सेवन जगदीश ॥
बीस कोस के फेर में, वृन्दावन कूं जान ।
कुंजगली अति सोहनी, द्रुमंवेली पहिंचान ॥
कंचनकी जहाँ भूमि है, धरे सतोगुण भेष ।
चरणदास बलिबलि गयो, दिव्यदृष्टि करि देख ॥
फूल जु फूले ऋतु विना, नाना छवि बहुरंग ।
अलि मलकतगुञ्जत फिरें, भँवरी सुतलै संग ॥
ऋतुवसन्त जहँ नितरहत, विहरत नन्दकिशोर
कुहुँकत कोयल मगन होय, बोलत दादुर मोर ॥
तिहिमधि वृन्दावन महा, निज वृन्दावन जान ।
तिरकोणी वर्णन कियो, जोजेंन है प्रमान ॥
१ नारद, वशिष्ठ, भृगु, अंगिरा, कश्यप, विश्वामित्र, पुलस्त्य २ देह ३ लता
४ अमर ५ चारि कोसका नाम ॥
प्रथमपाठ ❀ इन्द्र कुबेर आदि विज्ञानी ॥

६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाकी महिमा सबहुन गाई । रास करें जहाँ कुँवर कन्हाई ॥
जमुना जहाँ परिक्रमा दीन्ही । गुप्तपिया की लीला चीन्ही ॥
गोपसुता जहाँ नित उठि न्हाई । वर पूरण पायो कुँवर कन्हाई ॥
श्यामरङ्ग निर्मल जल गहरी । वृन्दावनके ढिगढिग लहरी ॥
आसा मनसाकरि कोइ न्हावै । सहस सुरसुरी को फल पावै ॥
दिव्य वृन्दावन दिव्य कलिन्द्री । देखे सो जीतै मन इन्द्री ॥
किनार निकट वृक्षनकी छाहीं । आयपरी जमुनाजल माहीं ॥
दो० भक्ति बिना पावै नहीं, वृन्दावन की संध ।
बिन पाये निन्दा करै, भोंदू मूरुख अंध ॥
मिलमिल शुभकी उठत तरंगा । बोलत दादुर अरु सुरभंगा ॥
कालीदह महिमा सुनु भ्राता । सहस गंगके फलकी दाता ॥
विहार* घाट बसि भजन करीजै । जेहिसेवन जमजवाब न दीजै ॥
वंशीवट बसि हठ इमि कीजै । तजै देह जब दर्शन लीजै ॥
अब सुनु वृन्दावन की बतियां । शीतल करी हमारी छतियां ॥
वनघन कुञ्जलता छबिछाई । झुक टहनी धरणी पर आई ॥
करत मंद समीर पयाना । बसत सुगन्ध सबै अरघाना ॥
बरसत अमृत फूही सुहाई । निकसत कोमल गोभगुहाई ॥
दो० वृन्दावन में रहत हैं, ज्ञानी गुणी अतीत ।
वृन्दावन को ना मिलें, कोऊ लहत जगजीत ॥
नित बसन्त जहँ सुगन्ध सुरारी । चलतमन्द जहाँ पवनसुखारी ॥
पुहुप विकसि रहे रङ्ग बिरङ्गा । लेत वास गुंजत सुरभृङ्गा ॥
बोलत भँवर महाध्वनि गाजें । मानो अनहदकी गति साजें ॥
जुगुनू दमकि चमकि चक्रावैं । समय जानिकर हर्ष बढ़ावैं ॥
प्रथमपाठ * विहर ।

ब्रजचरित्रवर्णन । ७
नाचत मोर करत चतुराई । पंख पसारि मुदित मगनाई ॥
कैइक' उचक वोल निज बोलैं । कैइक कुञ्जन ऊपर डोलैं ॥
जुगल नामलैं कीर पुकारैं । बार बार वनओर निहारैं ॥
वृन्दावन चारौ जुग¹ माहीं । गोपरहैं शुकदेव बताहीं ॥
दो० वृन्दावनकी साधुगति, कापै वरणी जाय ।
जैसी जाकूं दृष्टि है, जैसोही दरशाय ॥
जैसे हरि मथुरा गये, सबन विलोको आय ।
काल कंसकी दृष्टि में, साधुन प्रभू लखाय ॥
मथुरा में जोधा बड़े, जिन्हें मल्ल दरशाय ।
नारिन दरशै कामसम, प्रीतिरीति अधिकाय ॥
वृन्दावन सोइ देखिहै, जिन देख्यो हरि रूप ।
दुर्लभ देवन कूं भयो, महागूप' ² सों गूप ॥
वृन्दावन सेवन करै, अमरलोक कूं जाय ।
इन्द्रीजीते हरि भजैं, प्रेम प्रीति के भाय ॥
रसिककेलि वृन्दावन माहीं । अमरलोक की भांति कराहीं ॥
अमरलोक तिहुँलोकसों न्यारो । मथुरामण्डल अंश विचारो ॥
अमरलोक विचहै निजधामा । जाको अंश वृन्दावन नामा ॥
पुरुषोत्तम निज धामा माहीं । कारण प्रेमरहै ब्रज आई ॥
पुरुषोत्तम प्रभु लीला धारी । वृन्दावन में सदा विहारी ॥
निजधामा की कहियत शोभा । वृन्दावन में रहें अलोपा ॥
दिव्य दृष्टि बिन दृष्टि न आवै । सकल पुराण वेद यों गावै ॥
गोल चौतरो निज वृन्दावन । तापरवारौं अपनो तनमन ॥
रहो चौतरो छिपि वहिठाहीं । जैसे अग्नि काष्ठके माहीं ॥
१ सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग २ छिपाहुआ
३

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गले धुकधुकी सुन्दर झमकै । तामधिकौस्तुभमणिअतिदमकै ॥ - yes, the headline is completely unbroken!

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    अधिक सुघर पहिरे हिमचौकी । वनमाला कहियत नौनिधिकी ॥

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    गोल भुजनपर बाजू सोहैं । पहुँची कड़ा कनक करिदोहैं ॥
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    पहुंचीढिग पहिरे जहाँगीरी । रतन चौक छविलगीजँजीरी ॥
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    And it's joined: पहुंचीढिग.
    Then पहिरे जहाँगीरी ।
    Then `रतन चौक छविलगीजँजी