भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रंग रंग के वृक्ष बखाने । सो पुरुषोत्तम के मनमाने ॥
वनके माहिं बहुत जहाँ क्यारी । पुहुप रंग छवि न्यारी न्यारी ॥
कई भांति को बास तरंगा । मगनरूप बोलत सुरभंगा ॥
वनबिच श्वेतरूप छविनाना । गोल चौतरो रूपनिधाना ॥
इकरस चेतन परम सढोला । कोटि भानु छवि अमरअडोला ॥
जहाँ परिकर्मा सखी सहेली । बारह भानु रूप अलबेली ॥
दिव्य दमक जहाँ हीरा लागे । सात रंगके झिलमिल ताके ॥
ऊदा लाल श्वेत अरु पीरा । हरित श्याम लहरी अतिधीरा ॥
तापर चौसठ खम्भा दमकै । मानों कोटि भानु छाव झमकैं ॥
खम्भन लगे लाल ओर मुक्ता । पन्ना लगे बेलि की जुगता ॥
मूंगा लाल फिरोजा भारी । ध्यान धरो ताको नर नारी ॥
ये सब लगे बखानों ऐमे । जैसी जुगत लगे हैं जैसे ॥
जड़ लालनको विद्रुम डारी । पन्ना पात वृक्ष गतिधारी ॥
चुन्नी पँचरँग फूल सुहाये । फल मुक्ताहल झुकत झुकाये ॥
और बनी बहु चित्तरकारी । बेलि बड़ बूटा अधिकारी ॥
हीरा मोती चेतन होई । जानै साधू बिरला कोई ॥
दो०-ताकी छवि अति ललित है, शोभा सरस सुजान ।
लगो चंदोवा दिव्य अति, चेतन करो बखान ॥
लगे चंदोवा झालरि मोती । मानौ उडुगणै झिलमिलज्योती ॥
झालर बनी चंदोवा केरी । दिव्य दृष्टि करि साधुन हेरी ॥
तापर रंगमहल की शोभा । चेतन आनँद सुखकी गोभा ॥
स्थिर इकरस भीत सुढारी । बने झरोखा अद्भुत बारी ॥
अजब कँगूरा सुबक सुढारे । चौंसठ कलश लगै अतिप्यारे ॥
१ आदित्य, दिवाकर, भास्कर, प्रभाकर, सहंसांशु, त्रैलोक्यलोचन,
हरिदश्व, विभावसु, दिनकर, द्वादशात्मक, त्रिमूर्ति, सूर्य. २ नक्षत्र ॥