भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
॰कँगनी अरु पहिरे जहँगीरी। रतनन चौक आरसी धीरी॥
छाप छला अरु पहिरे गूंठी। नुहसत पहिरे अजब अनूठी॥
पांवनमें पग वेवर बाजैं। नखशिखलों आभूषण साजैं॥
झुनुक झुनुक नाचै अरु गावैं। ठुमुक ठुमुक निरतैं अरु धावैं॥
कबहूं थइथइ थइथइ करें। कबहुँ कर ऊपर कर धरैं॥
कबहूं घिनन घिनन अँग मोरैं। भाव बताय तान बहु तोरैं॥
कबहूं कर उठाय गति चालैं। साँग उपांग¹ बतावत हालैं॥
हो अनुराग राग बहु गावैं। घुँघुरूकीगतिअधिक बजावैं॥
कोइ नाचै कोई गावै। कोइमृदंग कोइ ताल बजावै॥
बैन सरू काहू कर राजै। कोउ तँबूरा नारी साजै॥
उपँग लिये कर कोउ सहेली। अमृत कुण्डली² कोउअलबेली॥
कोइ बीन कोइ लिये मुहचङ्गा। मगनरूप सबही निज सङ्गा॥
दो० कहा बुद्धि कहा कहसकूं, रासकेलि को साज।
बाजे हैं बहुभांति के, वर्णत आवै लाज॥
कबहूं करसों कर मिला, नृत्यत श्रीगोपाल॥
कबहुं बैठे सांवरो, नृत्यत सुन्दरबाल॥
कबहूं हँसिकरि निकट बुलावैं। कबहूं फूलमाल पहिरावैं॥
कबहूं मन्द मन्द मुसकावैं। बैन सैन दै नृत्य बतावैं॥
वृन्दावन में ऐसी लीला। चरणदासको जहां वसीला॥
जो कोइ इनको ध्यान लगावै। अमर लोक निहचै करिपावै॥
सिमिटो मन कबहूं नहिं फूटै। सोवत जागत ध्यान न छूटै॥
जो कोइ इनको ध्यान न करिहै। भरमि भरमि चौरासी परिहै॥
सुरनर मुनिसबही मिलि ध्यावैं। शिव ब्रह्मादिक अन्त न पावैं॥
वेद विना यह भेद न पावै। आप भरमि अरु जग भरमावै॥
१ सब विधियों सहित २ द्वारा॥