भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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२४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ
दो० कहा बुद्धि कहा कहिसकूं, रासकेलि को साज ।
अद्भुत लीला होय रही, वर्णत आवै लाज ॥
अखण्ड धाम लीला अमर, नित वृन्दावन रास ।
नित विहार जहाँ होत है, चरणदास को वास ॥
गौरीसुत नहिंगा सकैं, नहीं शारदा वाम२ ।
चरणदास कहा बुद्धि है, बरणि सकै निज धाम ॥
बड़ी दया मोपै करी, कृष्ण कुँवर सुन लाल ।
वाणी आप बनायकै, कीन्हो मोहिं निहाल ॥
मम हिरदय में आयकै, तुमही कियो प्रकास ।
जी कछु कहौ सो तुम कहौ, मेरे मुखसों भास ॥
आदि पुरुष परमातमा, तुमहिं निवाऊं माथ ।
चरणन पास निवास दै, कीजै मोहिं सनाथ ॥
तुम्हरी भक्ति न छांड़िहूँ, तनमनशिरक्यों न जाव ।
तुम साहिब मैं दासहूँ, भलो बनो है दाव ॥
शुकदेव गुरु कृपा करी, मूरुख भये प्रवीन ।
मम मस्तकपर कर