भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बांके दीरघ ओर ललचौहैं । चितवत सखियन के मन मोहैं ॥
सुवक बुलाक नाक में सोहै । ध्यान करत मेरो मन मोहै ॥
बिजुरीसी मुसकानि पियाकी । मनखैंचनि अरुभाल हियाकी ॥
वदन श्यामघन कहाबखानूं । कोटि भानु छवि मुखपर वारूं ॥
दिव्य नीमा* अंग माहीं सोहै । सूरज कोटि कला छवि मोहै ॥
कंठी कंठ धुकधुकी झमकै । तामधिकौस्तुभमणिअतिदमकै ॥
मोतियन की माला वनमाला । हुलसैं देखि धाम की बाला ॥
दिव्य बद्वि†गलजंद जड़ाऊ । नौरतनन के बाजू बाजू ॥
पहुँची कड़ा कहा छवि गाऊं । सम तुल ताकी कहा वताऊं ॥
दिव्य जहांगीरी दोउ‡करमाहीं । ताकी सम कछु कलमें नाहीं ॥
रतन चौक में लाल विराजैं । शोभा गावत मो मन लाजैं ॥
रतन चौकहै पीठ हथेली । लगी जँजीर मुँदरियन भेली ॥
चौकी सुघर हिये पर राजै । कटिकिंकिणिघुँघुरूध्वनि वाजै ॥
जुगलचरण पैंजनि झनकारैं । दिव्य टोरे तिनमें ठनकारैं ॥
कोटि चन्द्र दश नखपर वारूं । तलुअन चिह्न इक्कीस निहारूं ॥
वायें अंग राधिका प्यारी । कोटि चंद्रछवि मुखपर वारी ॥
जुगल सखी लै चँवर दुरावैं । हिये हरषि महासुख पावैं ॥
खंभ खंभ ढिग सखी सहेली । चौदहखड़ीं ईश अलबेली ॥
औरसखी बहुतक बहिठाऊं । शोभा जिनकी कहत लजाऊं ॥
नित्य किशोरी गोरी सारी । पांच तत्त्व त्रैगुणैँ तें न्यारी ॥
दिव्य वस्त्र दिव्यभूषण जाना । अधिकरूप छवि वारह भाना ॥
कजियारी कच लटकैं बैनी । मुतियन मांग भरैं छवि पैनी ॥
चूड़ामणि गहनो अति नीको । शीशफूल अरु बेनो टीको ॥
१ जोकि समुद्रमथन में समुद्रसे निकसी थीं २ सत्, रज, तम ॥
प्रथमपाठ *दिव्यप्रभा अंग अंगन †वैंधी ‡कर ॥