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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 44

ब्रजचरित्रवर्णन । १३
दो०-लिखिपढ़ि समझि विचार करि, सदा करौ हरिध्यान ।
कृष्णभक्ति दृढ़ करि गहौ, मिटै सकल अज्ञान ॥
कविच साङ्गीत ॥
मुकुट जटित शिर अधिक विराजत गहे बँसुरिया अधर धरन् ।
शंख चक्र गदा पद्म विराजत कोटि मदन छवि चरणन् ॥
गिरिवर नखधारे असुरन मारे सन्तन के दुख हरनन् ।
जन चरणदास चरणनको चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
कुमकुम बिन्दी दीपित भालं उदधिजात की द्युति हरनं ।
मकराकृत कुण्डल अति राजत झुमक दामिनी छवि धरनं ॥
कटि किंकिणि पैंजनि पग बजत मुक्तमाल सुरसुर वरनं ।
जनचरणदास चरणनको चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
सुन्दर बाल लाल सँग लीन्हे रासकरत अति मनमगनं ।
घुमिरि घुमिरि झुकि झुकि कर निरतत खुटर खुटर नाटकवरनं ॥
मधुर मधुर ध्वनि बजत गजत घन झनक झनक झांझा झरनं ।
जनचरणदास चरणनको चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
रास रचावैं सब सचुपावैं सांवरे वदन छवि वर्णनं ।
धुक धुक धूधूकरि नृत्यत तकृत तकृत ताधिननननं ॥
झुनुक झुनुक नूपुर झनकारत झनक झनक झनझनझननं ।
जनचरणदास चरणन को चेरो सदा रहै गिरिधर शरनं ॥
क०-नन्दके कुमार हौं तो कहौं बार बार मोहिं लीजिये
उबारि ओट अपनी में कीजिये । काम अरु क्रोध को काटो
जम बेड़ा प्रभु मांगौं एकनाम मोहिं भक्तिदान दीजिये ॥ और
की छुटायो आश सन्तनको दीज साथ वृन्दावन निवास*
मोहिं फेरिहू पतीजिये । कहै चरणदास मेरि होय नाहि हास
प्रथमपाठ '* बास ॥'