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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

३५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
कुल नाते परिवार सँभारे साधनकी नहिं टहल करे ॥
राजी माला तिलक सुधारि सवाँरे राखत छलवल मकर घने ।
अन्तर और निरन्तर औरै सिंह गऊमुखं रहत बने ॥
राजी ऐसी भक्ति मुक्ति नहिं पावै करम लगैं अरु नरक परे ।
यमके दण्ड दहन पावककी जनम मरण योनाहिं टरे ॥
राजी लक्षण प्रेम सहित जप कीजै भीतर बाहर उघरनचे ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं हरीरीझैं जब व्याधि दचे ॥
मालाफेरी कहाभयो
अन्तर के मनको नहिं फेरा पाप करत सब जन्मगयो ॥
पर निन्दा परनारि न भूलो खोटकपटकी ओरनयो ।
काम क्रोध मद लोभ न खोये है रह्यो मूरख मोहभयो ॥
दुनियां सांचसमझघर कीन्हो धन जोरनको परनलयो ।
दया धर्म दोउ मारग छोड़े मँगतन को नहिं दानदयो ॥
गुरुसों झूठ भगल साधन सों हरिको नाहिं नेहजयो ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं कैसे कहिये मुकतहयो ॥
राग हेली ॥
और उपासन कोय हेली टेक हमारे नामकी ।
आन शरण जाऊं नहींरीअरी हेली होनी होयसो होय ॥
योग यज्ञ तप नामहींरी अरी हेली नाम.नक्षत्र वार ।
सकल शिरोमणि नाम है तन मन डारूं वार ॥
अठ सठ तीरथ नामहींरी अरी हेली नाम हमारे नेम ।
नामहीं सूं राची रहूँ नाम हमारे प्रेम ॥
वरत हमारे नामहारी अरी हेली इष्ट हमारे नाम ।
अर्थ धर्म फल नाम हीं नाम मुक्ति को धाम ॥

·शब्दवर्णन । ३५५
पढ़न लिखन सब नामहैरी अरी हेली नाम ग्रह सब देव ।
जो कुछ है सो नामहीं नाम हमरो भेव ॥
राम नाम शुकदेव दियोरी अरीहेली सों राखो मनमाहिं ।
चरणदास के नामहीं इह सम तुल कछु नाहिं ॥
अथ सगुण उपासना अंग राग शब्दों के दोहा ॥
धन सतगुरु शुकदेवजी, मेरी करी सहाय ।
निज वृन्दावन धामको, लीला दई दिखाय ॥
अब कछु कौतुक रासको, वरणतहै चरणदास ।
लाल लाड़िली कृपा सों, पाव निज ब्रजवास ॥
राग रासविहागरा ॥
नृत्य करत छविसों बनवारी ।
टेरिलई सबही ब्रज वनिता मुरली मधुर बजाय विहारी ॥
सुनत श्रवण धुनिहोय प्रेमवशविकलभइँ सुन्दर सुकुमारी ।
गृहके काज लाज तजि पियकी उठि धाई तन सुरति बिसारी ॥
आयेगावन छहों रागमिलि पांच पांच इक इककी नारी ।
आठ आठ इक इकके बेटा मूरतवन्त स्वरूप महारी ॥
ताल वीण मुरचंग मँजीरा तनन तनन तँबुरा गति न्यारी ।
ताधीनाधीना ताधीना बजत पखावज घुंघुरू झनन झनन झन-
कारी ॥ इक इक गोपियनके संग इक इक सुन्दर भेष धरो
गिरधारी । ऐसोरच्यो रासको मण्डल मध्यराधिका कृष्ण
मुरारी ॥ गावत गीत बढ़ाय परस्पर मान करत पियसों पिय
प्यारी । लेत मनाय लाड़िलो प्यारो हँसि हँसि विहरत दै
दै तारी ॥ ततथेई ततथेई थेइ थेइ ततथेई उरप तुरप सांगीत
उचारी । नटवररूप करो मनमोहन शेषथको वरणत शोभारी ॥
भये चकित सुरमुनि ऋषि किन्नर बाढ़ी रैन शरद उजियारी ।

⸱ ३५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव श्यामकी अद्भुत लीलापै बलिहारी ॥
रास राग भैरौं ॥
देख सखी रास रच्यो सांवरे बिहारी । ब्रह्मा शिव इन्द्र
शेष नारद से थकित भये ऐसो कवि कौन करै वरणन उप-
मारी ॥ सोहै सिर मुकुट और कुण्डल छवि तिलक भाल
किंकिण कटि पीताम्बर नूपुर झुनकारी । बहुत नारि सुघर
सखी राधाजू चन्द्रमुखी ललितादिक सह॑चरी श्रृङ्गार सों
सवाँरी ॥ कोऊ तँबूरा कोउ मुरचंग कोऊ बजावै गति मृदंग
कोऊ ताल देत कोऊ स्वर उठान भारी । बंसी में करत गान
बाँकीसी मधुरतान श्यामा जब करत मान श्यामलेँ मनारी ॥
कबहूं करजोर दोऊ नाचतहैं नवकिशोर कबहूँ हरि नृत्यकरत
कबहूं पियप्यारी । ता ता ता ता ता ता थेई थेई थेई द्वैरही बाढ़ी
निशि शरददेखि हरिकी नृतकारी ॥ गौवन तृण छाँड़ि दियो
बछरन पय नाहिं पियो मुरली धुनि सुनतमोहे मुनि जन व्रत
धारी शुकदेवजी गुरुकौं चरणदास बहु प्रनाम करै रास
को विलास दियो परगट दरशारी ॥
रास राग बिहागरा ॥
रास में निरत करत बनवारी ।
मुदित मनोहर रंग बढ़ावत सँग वृषभान दुलारी ॥
मोरमुकुट छवि शीश विराजत नाक बुलाक सुढारी ।
कर मुरली कटि काछनि काछे अलकैं घुंघुरवारी ॥
राधाजू के शीश चन्द्रिका नीलाम्बर जरतारी ।
गावैं सखी श्याम श्यामा सँग नखशिख रूप उजारी ॥
ताधिनां ताधिनां धीनां बजत पखावज ताल बीण गति न्यारी ।
१ सङ्गकी सहेली ॥

शब्दवर्णन । ३५७
ठनन ठनन ठन नूपुरकी धुनि झनन झनन झनकारी ॥
थेइ थेइ थेइ थेइ नचत दोऊ मिलि विहँसि विहँसि मुसकारी ।
चरणदास शुकदेव दयासू पायो दरश मुरारी ॥
रास रामकली वा भैरौं ॥
नृत्यत गोपाललाल तत्ततता थेई ।
नखशिख श्रृंगार कियें राधा गल बाँह दियें सखियनसंग
नाचत स्वर ताल तान देई ॥ तननन तंबूर गिड गिड धुध-
कधू मृदंग ताल झम झम झै झांझ बजतबीन बाँसुरी । झन-
नन झनकार होत पायल ठनकार राग गावत कल्याण और
नट धनासिरी ॥ कबहूँ लै कान्हरा अलाप कभू सोरठ को
परज अरु विहागरो केदारा आसावरी । कबहूं कै बिभास
मालसिरी ललित रामकली भरहूँ विलावल धुनि धुर्पद को
चावरी ॥ सुन्दर बहु भेष धरें रासको विलासकरें मुनिजन
मनहरें बढ़ो आनँद उं ह ठाहीं । अद्भुत छवि कहा कहूं किरपा
शुकदेव चहूं चरणदास होय रहूं चरणकमल माहीं ॥
रास राग पंचम ॥
सखी दोऊ रसिक प्रीतम पिय प्यारी ।
मिलि खेलत हैं रास छवि कहिन जाई ।
एककी एक सों सरस शोभा बनी निरख सब सुरमुनी रहे
लुभाई ॥ कोऊ कर बनिलै सुधरस्वर तालदै गावत संगीत
रीझत रिझाई । थुंकना थुंगना धुधक धूधूकृत बजत मिरदंग
गति अति सुहाई ॥ तार मुरुचंग स्वरसससों मुरलिका मधुर
धुनि चतुर शारंग बजाई । नचत दोउ भावसों अधिक बहुचाव
सों तत्तथेई थेई थेईलगाई ॥ कबहूं पियप्यारी जू मान करें
लालसों कबहूं भुजगहि पियाले मनाई । धरत सुन्दर डगन

३५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बजत नूपुर पगन हँसत दोउ लसत दिये गरेबाहीं ॥ बढ़ी
निशि शर्दकी कौन वर्णनकरै शेशहू सहसमुख रहे थकाई । कहै
चरणदास शुकदेव किरपा करी ध्यान के माहिं लीला दिखाई ॥
दो० बसरी बैरन बांसुरी, तूही ब्रजके माहिं।
लगीरहत पियमुख जुतू, पलछिन छांड़त नाहिं ॥
जब तू बाजत तानसूं, ए बंशी बड़भाग ।
कसक उठत जियरा जरै, तनमन लागत आग ॥
हमरो पिय तैं वशकियो, करत अधर रसपान ।
कहा टोना कियो जु तैं, बर पाये भगवान ॥
ब्रह्मा भूलो वेदधुनि, शंकर छोड़ो ध्यान ।
चरणदास कहैंसुनिबांसुरी, इन्द्र तज्यो अभिमान ॥
छैल छबीलो लाड़िलो, रंग रँगीलो लाल ।
चरणदास के मन बसो, बंशीधर गोपाल ॥
राग काफी ॥
मोहन प्यारे की बंशी बाजैरी ।
हमकूं जरावत विरह अग्निसों जब अधरनपै राजैरी ॥
लालन मुख लागीरहै निशिदिन नेकन नाहिं न लाजैरी ।
तनक बाँस की बनी बसुरिया गर्भभरी अति गाजैरी ॥
तैं वश कियो शुकदेव हमारो सुनत कलेजो दाझैरी ।
चरणदास कहैं अब कहा कीजै तुही भई सिरताजैरी ॥
बंशीवारे सों नेहरा कीन्होरी ।
काहूको कछु कहो न मानूं यह तनमन वहि दीन्होरी ॥
भर्मत भर्मत बहुतै हारी भटक भटक जग बीनोरी ।
आन देवसों काज न मेरो सांचो प्रीतम चीन्होरी ॥
शोभाको सागर गुणको आगर कुँवरकिशोर नवीनोरी ।

शब्दवर्णन । ३५६
नवल लाड़िलो मोहन सोहन सोई वर वरलीन्होरी ॥
प्रभुको छांड़ भजूं औरनको तौ कहियो बुधिहीनौरी ।
चरणदासको है सुखदायी श्यामसुंदर रँगभीनोरी ॥
वा मुरलियाने हेली मेरे प्राणहरे ।
जब वाजत पियके मुख लागी सुनि धुनि तनकी सुधि बिसरे ॥
ऐसो जप तप कहा कियो है मोहन सोहनलाल बरे ।
जाके रसबस भये श्यामजी ताबिन पलछिन कल न परे ॥
तीनलोक बिच धूम मचाई सुर मुनि ऋषि के ध्यानटरे ।
चरणदास शुकदेव दयासों मनवांछित सब काजसरे ॥
वा मुरलियाके बोल मेरे हिये कसकै ॥
बाजत मान गुमान गरवले करि राखो हरिकों बसकै ॥
बाँकी तान वान ज्यों लागत चुभत कलेजे में धसकै ।
नेक न होत पिया सों न्यारी अधरन के रसके चसकै ॥
कहाकरूं कुछ यतन न दीखै कोई उपाय न होयसकै ।
चरणदास शुकदेव पियारे कवहूँतो वोलेंगे हँसकै ॥
वंशीवारे तू साडी गली आ जावो ।
तैंडे कारण भई बावरी टुक मुख छवि दिखला जावो ॥
व्याकुल प्राण धरत नहिं धीरज तनकी तपत सिरा जावो ।
चरणदास तलफत दर्शन विन शुकदेव दुःख मिटा जावो ॥
राग परज ॥
तुम्हारे रूप लोभानी हो ।
जाति बरन कुल खोयके भइ प्रेम दिवानी हो ॥
खान पान सब सुधि गई और अकबक बानी हो ।
तुम्हरे चरण कमल मन मेरो रहो लिपटानी हो ॥
सुन्दर सूरति सोहनी मेरे नैन समानी हो ।
२५

३६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तुम बिन चैन नहीं दिन राती सुनि पिय जानी हो ॥
दरश दिखावो साँवरे जब हिये सिरानी हो ।
नातर वह गति है है हमरी मीन ज्यों पानी हो ॥
सुख देवो दुख सब हरो काहे बिसरानी हो ।
चरणदासि यह सखी तिहारी मिलजा छानी हो ॥
राग विहागरा ॥
सुधि बुधि सब गई खोयरी मैं इश्क दिवानी ।
तरफतहूँ दिन रैन सखीरी जैसे जल बिन मीननी ॥
बिन देखे मोहिं कल न परत है देखत आंख सिरानी ।
सुधि आये हिय में दव लागै नैनन वर्षत पानी ॥
जैसे चकोर रटत चन्दा को जैसे पपीहा स्वाती ।
ऐसे हम तरफत पिय दर्शन विरह व्यथा इहिभांती ॥
जबते मीत बिछोहा हूवा तबते कछु न सुहानी ।
अंग अंग अकुलात सखीरी रोम रोम मुरझानी ॥
बिन मनमोहन भवन अंधेरो भरि भरि आवै छाती ।
चरणदास शुकदेव मिलावो नैन भये मोहिं घाती ॥
भईहूं प्रेममें चूरहो मोहिं दरशन दीजै ।
हूं तो दासि तिहारी मोहन बेगि खबरिआ लीजै ॥
ज्ञान ध्यान और सुमिरन तेरो तो चरणन चित राखूं ।
तेरोहि नाम जपूं दिन राती तो बिन और न भाखूं ॥
तन व्याकुल जिय रूंधोहि आवत परी प्रीति गलफांसी ।
तुमतो निठुर कठोर महा पिय तुमको आवै हांसी ॥
विरह अग्नि नख शिख सूं लागी मन में कल्पना भारी ।
गिरोहि परत तन सँभरत नाहीं रहत भवन में डारी ॥
कै विष खाय तजों यह काया कै तुम्हरे सँग रहसूं ।

शब्दवर्णन । ३६१
चरणदास शुकदेव बिछोहा तेरी सूं नहिं सहसूं ॥
राग कान्हड़ा ॥
तुम बिन अति व्याकुल भइयाँ ।
मोहूंकों दर्श दिखावरे मोहन प्यारे ।
चितवन नैन हँसन दसनन की अटक रही हिय महयां ॥
वह लटकन मटकन चटकन पट मोरमुकुट की छविछइयां ।
अधर मधुर मुरली सुर गावत टेरि बुलावत गइयां ॥
हाहा खाऊं शीश नवाऊं और परूं तोरे पइयां ।
वारीहूं वारी मुख ऊपर दोउ कर लेहुँ बलइयां ॥
अब तौ धीर रहो नहिं रंचक हो शुकदेव गुसइयां ।
चरणदासी भइ प्रेम बावरी आनि गहो क्यों न बहियां ।
राग पर्ज ॥
तुम बिन कैसे जीऊं प्यारे नँदलाल ।
भूख प्यास कछु लागत नाहीं तन की सुधि न सँभाल ॥
कल न परत कल कल अकुलावौं छिन छिन छिन बेहाल ।
विरह व्यथा को रोग बढ़ो है पीर महा बिकराल ॥
कहा री करूं कित जाऊंरी सजनी को मेटै जंजाल ।
लटक चलन बाँकी चितवन की चुभत कलेजे भाल ॥
भइ ऐसे यह देह दूबरी सूझ परो नस जाल ।
तरफत हूं हिय में दव लागी नैना बरत मशाल ॥
चरणदासी यह सखी तिहारी हो शुकदेव दयाल ।
आय कृपा करि दर्शन दीजै कीजै वेगि निहाल ॥
राग बिलावल ॥
लागीरी मौहनसों डोरी ।
आनि कानि कुलकी तजि दीन्ही कोऊ कैसी बात कहोरी ॥

भक्ति-पदारथ, ब्रह्मज्ञान, अमरलोक एवं पञ्चोपनिषद् भाषा

३६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
श्याम सलोने के रँगराती मगन भई कोइ परी ठगोरी ।
निरखत छवि तनकी सुधि बिसरी प्रेम प्रीति रसमें भइ वौरी ॥
ऐसो रूप उजारो प्यारो शोभा वर्णत शेष थकोरी ।
तीनि लोक ब्रह्माण्ड सकल सब जाकी मायासों दरशोरी ॥
कान कुण्डल गलमाल बिराजै शीश मुकुट माथे तिलक फंबोरी ।
नखशिख भूषण कर लिये लकुटी कांधे सोहै पीत पिछोरी ॥
कल न परत निशि दिन बिन देखे रोम रोम मेरे वही रमोरी ।
कान्ह सुजान सदा सुखदायी चरणदास के हिये बसोरी ॥
राग झँझोटी ॥
आया मैंडा मोहन मदनगोपाल ।
मानौ रङ्क अष्टसिधि पाईं निरखत भई निहाल ॥
बलिबलि जांदियां अँगन समांदियां मोहिं दरश दियोलाल ।
कोटि भानु छवि मुखपर वारूं बदा सोहै भाल ॥
अद्भुत रूप अनूप सांवरो सुन्दर नैन विशाल ।
घूँघरवारी अलकैं झलकैं चिकने लंबे बाल ॥
चितवत तीषी भौंह मरोरत कर लिये वेणु रसाल ।
गावत तान आनि बांकी सों चलत अनोखी चाल ॥
श्रीशुकदेव दया के सागर नटनागर नँदलाल ।
चरणदास को किरपा करिकै रीझ दई उरमाल ॥
राग काफी ॥
लटकरी चालपै मैं वारी-वारी जांदियां ।
रैन दिना सानूं ध्यान 'तुसाडो मन वच के हूँदी बांदिया ॥
कुण्डल कान मुकुट शिर सोहै शोभा अधिक सुहाँदियां ।
अलबेली छवि बाँके नैना निरखत नैन लुभाँदियां ॥

जब बाजी प्यारे तेंडी बंशी खान पान बिसरा दियां ।
भूलगई घर काज साज सब लाज छोड़ उठआदियां ॥
चरणदासी हम भई तिहारी फूली अंगन समादियां ।
राखि शरण शुकदेव पियारे चरणकमल लिपटादियां ॥
कोई समझावोरी मोहनलालकूं ।
ग्वालबाल सबही सँग लेकर सूने घर धँसिआवै ।
याकी घाली मोरी आली माखन रहन न पावै ॥
लेकर मटुकी चटदे झटकै गटकै माखन सारो ।
चटपट चाटपोंछ धरि पटकै नट ज्यों सटकै प्यारो ॥
जबहीं जाँव गगरिया भरने ठाढ़ो रहै बिहारी ।
आगे आकर कांकर मारे भीजै मोरी सारी ॥
जो अपने घर बठिरहूं तो अँगना धूम मचावै ।
जो कवहूँकै सोऊं सजनी स्वप्ने में दर्श दिखावै ॥
मेरे पीछे लांगो आली जित जाऊं तित डोलै ।
कहाँ लगि कहूँ ढीठता वाकी बात अटपटी बोलै ॥
बांको छैल महाँलबेलो प्रकट्यो है ब्रज माहीं ।
चरणदास शुकदेव पियारो सदा रहौ या ठाहीं ॥
कोइ आनि मिलावोरी श्याम सुजान को ।
नन्ददुलारो मोहन सोहन अजब अनोखो छैला ।
मदनगुपाल मुकुन्द मुरारी मेरो जीवनप्रानरी ॥
नैनन नींद न आवै सजनी कल न परै दिन रैना ।
व्याकुल भई फिरतहूँ बौरी भूली खान अरु पानरी ॥
जोकोउ हित ह्वैहै मेरो आली लालनकी सुधिलावै ।
दर्श दिखाय हरै सब बांधा मोको दे जीदानरी ॥
छिन छिन छिन, गति और होत हैलगो बिरहको बानरी ।

३६४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।

चरणदास की पीर मिटावैं सुन्दर सुखके निधानरी ॥
राग सोरठ ॥
हमारे घर आयेहो सुन्दर श्याम ।
तनकी तपन मिटी देखतही नैनन भयो अराम ॥
अँगन लिपाऊं चौक पुराऊं फूल बिछाऊं धाम ।
आनँद मंगलचार गवाऊं ⌞ हूये पूरणकाम ॥
अब जागे सखि भाग हमारे मन पायी विश्राम ।
चरणदास शुकदेव पियाकुं हितसों करूं प्रणाम ॥
सो अब घर पाया हो मोहनप्यारा ।
लखो अचानक अज अविनाशी उघरि गये दृगतारा ।
झूमरहो मेरे आंगन में टरत नहीं कहुं टारा ॥
रोम रोम हिय माहीं देखो होत नहीं छिन न्यारा ।
भयो अचरज चरणदास न पहुंये खोज कियो बहुबारा ॥
वह घरी कौनसी लागे मोरे नैना ।
छोटी उमर भोलापन भारी जानूं एक न बैना ॥
जब लागे तब कछून जानी अबलागे दुख दैना ॥
चरणदास शुकदेवकुँ देखै तब पावै सुख चैना ॥
राग मलार ॥
सो बिथा मोरी जानत होअ कि नाहीं ।
नखशिख पावक विरह लगाई बिछुरन दुख मनमाहीं ॥
दिननहिं चैन नींद नहिं निशिकूं निश्चल बुधि नहिंमेरी ।
कासूं कहूं कोउ हितु न हमारो लग्न लहरि हरि तेरी ॥
तन भयो क्षीन दीन भये नैना अजहूं सुधि नहिं पाई ।
छतियां धरकत कर्क हिये में प्रीति महा दुखदाई ॥
जल बिनमीन पियाबिन बिरहिनि इन धीरज कहुकैसी ।

शब्दवर्णन ३६५

पक्षी जरै दवलगी वन में मेरी गति भई ऐसी ॥
तरफतहूँ जिय निकसत नाहीं तनमेंअतिअकुलाई ।
चरणदास शुकदेव बिनायों दर्शन द्यौ सुखदाई ॥
राग सोरठ ॥
हमारे नैना दर्श पियासाहो ।
तनगयो सूखि हाय हियबाढ़ी जीवतहूँ वहिआसाहो ॥
बिछुरन थारो मरण हमारो मुखमें चलै न गासा हो।
नींद न आवै रैनि बिहावै तारे गिनत अकासाहो ॥
भये कठोर दर्श नहिं जानो तुमकूं नेकन सांसाहो ।
हमरीगति दिनदिन औरेहीविरह बियोग उदासाहो ॥
शुकदेव पियारे मत रहु न्यारे आनि करो उर बासाहो ।
रणजीता अपनोकरिजानो निजकरि चरणनदासाहो ॥
ऊधोजी कहां रहे भगवान ।
हम जानी काहूने मोहे मोहन चतुर सुजान ॥
तबसूं नैनन नींद न आवै धीरज धरत न प्रान ।
उमगि उमगि हियरो हुलसत है वह सुन्दर मुसकान॥
योग कथा तुम काहि सुनावां हमकूं नाहीं ज्ञान ।
प्रेम प्रीति की रीति अनोखी कापै होत बखान ॥
ऐसो हितू न कोऊ देखो जाय सुनावै कान ।
बाढ़ी व्यथा बिरहकी तन में सुधिलो कृपानिधान ॥
आवो दर्श दिखावो प्यारे देहु हमें जी दान ।
चरणदास शुकदेव श्याम बिन तज्योंखान अरु पान ॥
राग सारंग ॥
ऊधो क्या जानै हमरे जीवकी ।
चातक बूंद चकोर चन्दकूं ऐसे हमकूं पीवकी ॥

.३६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नेह कमान बिलुरकै खैंची मारि गये हरि तीरकी ।
भाल वियोग हिये बिच खटकै सुधिन लई या पीर की ॥
चरणदाससखिनिशिदिनतलफैंज्यों मछली बिन नीरकी।
कहैं कुछ और करें कुछ औरे आखिर जात अहीर की ॥
रेखता ॥
फ़रज़न्द नन्दजी का दिल बीच भावदाँ ।
बरपायँ खूब नूपुर सुन्दर सुहावदाँ ॥
वह सांवला सलोना महबूब यार मन ।
आहिस्ता लटक चाल मटक मेरे आँवर्दों ॥
टीका संदलका खैंचिकै माथे पै अदासों ।
बरसर बिराजै अफ़सरे हीरे जरावदाँ ॥
कुण्डल झलकते हैं दर हर दो गोश में ।
आवाज़ बांसुरीकी शीरीं बजावदाँ ॥
नीमा ज़री का गलमें कटि काछनी बनी ।
पीले दुपट्टे वाला बीड़े चबावदाँ ॥
करता है नृत्य नादर घुँघुरू कि झनकसों

शब्दवर्णन । ३६७
कंचन खंभ जटित हीरनसों नग लागे तामाहिं ।
पटुली अधिक अनूपम सोहै डोरी सुरंग सुहाहिं ॥
चहूँओर बदरा घेरिआये उमड़ घुमड़ गहराहीं ।
गरजत मेघ पवन झकझोरत दामिनि दमक दुराहीं ॥
गावत गीत मलार सहेली मिल मिल दै दै तार ।
झोंटा देत विशाखा ललिता आनंद बढ़ो अपार ॥
बोलत मोर पपीहा कोयल दादुर हंस चकोर ।
हरी भूमि ऋतु भई सुहाई भौंर करत अतिशोर ॥
भीजत रंगरंगीले प्यारे शोभा कही न जाय ।
चरणदास शुकदेव श्यामकी दोउ कर लेत बलाय ॥
झूलत कोइ कोइ संत लगन हिंडोलने ।
पौन उमाह उछाह धरती शौच सावन मास ।
लाजके जहाँ उड़त बगले मोर हैं जगहास ॥
हरष शोक दोउ खंभ रोपे सुरत डोरी लाय ।
बिरह पटरी बैठि सजनी उमंग आवै जाय ॥
सकल विकल तहाँ देत झोंके विपति गावनहार ।
सखी बहुतक रंगराती रँगी पाँचौ नार ॥
नैन बादल उमगि बरसें - दामिनी दमकात ।
बुद्धिको ठहराव नाहीं नेह की नहि जात ॥
शुकदेव कहैं कोई बली झूलै शीश देत अकोर ।
चरणदासा भये बौरे जति वरण कुल छोर ॥
हेली ॥
मो बिरहिन की बात हेली बिरहिन होय सोइ जानिहै।
मैंन बिछोहा जानतीरी अरीहेली बिरहैं कीन्हो घात ॥
या तनकुं बिरहा लगोरी अरीहेली ज्यों घुनलागो काठ।

३६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निशि दिन खाये जात है देखूं हरि की बाट ॥
हिरदे में पावक जलैरी अरीहेली ताप नैनाभये लाल ।
आंसू पर आंसू गिरैं यही हमारो हाल ॥
प्रियतमबिन कलनापरैरी अरीहेली कलकल सबअकुलाहिं ।
डिगीपरूं सत ना रहो कब पिय पकरैं बाहिं ॥
गुरु शुकदेव दया करैं री अरीहेली मोहिं मिलावैं लाल ।
चरणदास दुख सब भजैं सदारहूं पति नाल ॥
तरसैं मेरे नैन हेली राममिलन कब होयगो ।
पिय दर्शनबिन क्यों जिऊंरी अरीहेली कैसे पाऊं चैन॥
तीर्थ बर्त बहुतै कियेरी अरीहेली चितदै सुने पुरान ।
बाट . निहारतही रहूं छांड़ दई कुलकान ॥
लगी उमाहेही रहूँरी अरीहेली सुधि नहिं लीनी आय ।
यह योबन योंही चलो चालो जन्म सिराय ॥
बिरहादल साजेरहैरी अरीहेली छिन छिन में दुखदेह ।
मन लालन के वश परो भई भाखसी देह ॥
गुरु शुकदेव कृपा करोजी अरीहेली दीजै बिरहछुटाय ।
चरणदास पियसूं मिलैं शरण तुम्हारी धाय ॥
तिनकूं कछुन सोहाय हेली प्रीतिलगी घनश्यामसूूं ।
जो सुखहै संसारकेरी अरीहेली सो सब दिये बहाय ॥
भवनतजोअरुधनतजोरीअरीहेलीतजीकुलनकीरीत ।
मान बड़ाई सब तजी रहा एक हरि मीत ॥
भूखप्यासनिद्रातजीरीअरीहेलीतजिदियोवादविवाद ।
राग दोष दोऊ तजे तजो पाँच को स्वाद ॥
बहुत डरै सकुची रहैरी अरीहेली कहै न काहू बात ।
लगी रहै हरि ध्यान में ऐसे रैनि बिहात ॥

शब्दवर्णन । ३६६
श्रीशुकदेव भले कहीरी अरीहेली बारम्बार सँभार ।
चरणदासहो श्याम की वही निबाहनहार ॥
मोमन कछु न सुहाय हेली प्रीतिलगी प्यारेलाल सूं ।
हँसिहँसिकै टोना कियोरी अरीहेली दैगयो मुरली गहाय ॥
जबहीं सूं चेटक लगोरी अरीहेली ढूंढूं कुंजनमाहिं ।
बौरीहो दौरौ फिरूं वह छवि दीखै नाहिं ॥
मोहिं मिलावै सांवरोरी अरीहेली ताके बलि बलि जावैँ ।
जन्म जन्म दासी रहूं कबहुं न छोड़ों पावैँ ॥
है कोइ पूरी रामकीरी अरीहेली मोहिं बतावै ठौर ।
जहाँ बिराजै श्यामजी वह बड़भागी पौर ॥
चरणदास घायल भईरी अरीहेली मोहन मारो बान ।
श्रीशुकदेव दिखाइये मेरो जीवन प्रान ॥
वह छवि करूं बखान हेली जा छावसौं नैनालगे ।
हितू देखि तोसूं कहूँरी अरीहेली और न पावैं जान ॥
मोर मुकुट माथे दियेरी अरीहेली कुण्डल सरवन माहिं ।
अलकें बल खाई रहें योगी देखि लुभाहिं ॥
भौंहन मधि बेंदा दिपेरी अरीहेली सुन्दर नैन विशाल ।
मोतीनासा सोहनो अरु बैजन्ती माल ॥
नीमोअङ्ग पीरो खुभोरी अरीहेली घूम घुमारो फेर ।
लाल खराऊं पावँ में मोमन राखत घेर ॥
पहुंचन में पहुंची कड़ेरी अरीहेली अँगुरिन मुँदरीछाप ।
अधरनपै मुरली धरे गावत रीझत आप ॥
चरणदास तिनकी भईरी अरीहेली तनमन डारोवार ।
गुरु शुकदेव सराहिया बुरो कहै परिवार ॥
बंशीबट की छांहिं हेली लाल लाड़िली मैं लखे ।

३७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोउ खड़े गावैं हँसैं री अरीहेली अरु डारे गलवाहिं ॥
मोर मुकुट माथे दिपेरी अरी हेली सुन्दर नैन विशाल ।
पीताम्बर पट सोहनो कर मुरली उरमाल ॥
वाके विराजैं चन्द्रिकारीअरीहेली लीलवसन जरतार ।
नखशिख भूषण सोहने अरु फूलनके हार ॥
गुरु शुकदेव बताइयारी अरीहेलीजवहमलिये पिछान ।
चरणदासी तिनकी भई लगोरहै वहि ध्यान ॥
अथ सन्त शूरका अंग ॥
दो० सन्त समान न शूरिमा, कहैं रणजीत विचार ।
टेक गहैं सम्मुख चलैं, बांधि प्रेम हथियार ॥
राग सोरठ ॥
सन्त समान नहीं कोई शूरा ।
मोह सहित सब सेना मारी ऐसो साँवत पूरा ॥
क्षमा कि ढाल गही कर अपने बांधे सत तरवारा ।
कर्म भर्म के दलको पेलै पल पल वारंवारा ॥
सुरत को तीर हृदय को तरकस ध्यान कमान बनावै ।
प्रेमहाथ सूं खैंचनलागे चोट निशाने लावै ॥
बुद्धि विवेक कटारी बांधै वचन विलास की बरछी ॥
सतपुरुषों के हियरे बेधै कहिकहि बतियां तिरछी ॥
चितमें चाव चौगुनो उनके सुन सुन अनहद तूरा ।
अगम पंथसों पग न डिगावै होयजाय चकचूरा ॥
मन हुलास आसधर पीकी सुन्न खेत में धावै ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं अमर लोक पद पावैं ॥
राग सोरठ वा आसावरी ॥
साधू- पैज गहै सोइ शूरा ।

शब्दवर्णन । ३७१
काके मुख पर नूर है जब बाजै मारू तूरा ॥
कलँगी अरु गजगाह बनावै इसका परन दुहेला ।
सांवत भेष बनाय चलत है यह नहिं सहज सुहेला ॥
या बानेको नेम यही है पगधरि फिरि न उठावै ।
जो कछुहोय सो आगेहि आगे आगेहीं को धावै ॥
रणमें पैठि झड़ाझड़ खेलै सम्मुख शस्तर खावै ।
खेत न छोड़ै हाई जूझै तबहीं शोभा पावै ॥
गुरु शुकदेव दियोहै हेला ऐसा होय सो आवै ।
चरणदास बाना संतन का तौले शीश चढ़ावै ॥
साधौ टेक हमारी ऐसी ।
कोटि जतन करि छूटै नाहीं कोउ करौ अब कैसी ॥
यह पग धरो संभाल अचल हो बोल चुके सोइ बोली ।
गुरु मारगमें लेन न दीन्हो अब इत उत नहिं डोली ॥
जैसे शूर सती अरु दाता पकरी टेक न टारैं ।
तन करि धनकरि मुख नहिं मोड़ैं धर्मन अपनो हारैं ॥
पावक जारो जल में बोरो टूक टूक करि डारो ।
साध संगति हरि भगतिन छाँडूं जीवन प्राण हमारो ॥
पैज न हारूं दाग न लागे नेक न उतरै लाजा ।
चरणदास शुकदेव दयासूं सबविधि सुधरे काजा ॥
राग सारंग ॥
हमारे राम नामकी टेक टारी ना टरै ।
लाखकरो कोइ कोटि करोजी काहूतैं कुछ ना सरै ॥
ज्यों कामीकूं तिरिया प्यारी ज्यों लोभी को दाम ।
अलमदार कूं अमल पियारो ऐसे हमकूं राम ॥
दुष्ट छुटावै गहि गहिकै पकरों हारिलकी लकड़ी भई ।

३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अब कैसे करि छूटै मोसों रोम रोम तन मन मई ॥
ज्यों प्रहलाद पैज दृढ़ कीन्ही हरणाकुश से बहुअरे ।
उबरोसंत असुर गहिमारो परगटहो हरि आखरे ॥
गुरु शुकदेव सहाय करि है अब पग पाछे क्यों परै ।
चरणहिदास वचन नहिं मोड़ै सूरसती मूये टरै ॥
साधौ टेकगई जाको सबगयो ।
लाजगई अरु काजगये सब वचन धर्म कछु ना रह्यो ॥
जगमें हांस फांस हियमाहीं कायरपन यों दहिगयो ।
अब पछिताये होत कहा है वह पानपतेरो बहिगयो ॥
पैज तजी मुखकारो हूवो धिक धिक जीवन तासको ।
बोझगयो ओछेकी संगति यह प्रताप कुबासको ॥
चरणदास शुकदेव कहै यों टेक न देवो शिर देवो ।
बार बार नर देहन पइये अपयश जगमें क्यों लेवो ॥
राग सोरठ ॥
साधौ भेष वही जामें टेक है ।
टेक नहीं तौ कहा भरोसो टेक विना नरतेकहै ॥
टेक विना कैसी सतवंती टेक विना नहिं सूरमां ।
टेक विना दाता भी नाहीं टेक विना योगी बूबना ॥
टेक विना नहिं भक्ता हरिको टेक विना नहिं सिद्धिहै ।
टेक विना सब भ्रर्मत डोलैं टेक विना नहिं ऋद्धिहै ॥
साधु संत अरु वेद कहत हैं टेक पकरि चढ़ु धाम कूं ।
चरणदास शुकदेव बतावैं टेक मिलावै राम कूं ॥
साधौ जो पकरी सो पकरी ।
अब तौ टेक गही सुमिरण की ज्यों हारिल की लकरी ॥
ज्यों शूरा ने शस्तर लीन्हो ज्यों बनिये ने तखरी ।

शब्दवर्णन । ३७३
ज्यों सतवंती लियो सिंधौरा तार गह्यो ज्यों मकरी ॥
ज्यों कामी कूं तिरिया प्यारी ज्यों किरपिणकूं दमरी ।
ऐसे हमकूं राम पियारे ज्यों बालककूं ममरी ॥
ज्यों दीपककूं तेल पियारो ज्यों पावककूं समरी ।
ज्यों मछलीकूं नीर पियारो बिछुरे देखै यमरी ॥
साधौ के संग हरिगुण गाऊं ताते जीवन हमरी ।
चरणदास शुकदेव दृढ़ायो और छुटी सब गमरी ॥
अरे ले गुरुके बचन चितधररे ।
छिन छिन तेरी आय घटत है बेगि सँभारो घररे ॥
शील क्षमायत दृढ़करि राखो गरब गुमान निवारो ।
पांचौइन्द्री वशकरि अपने मन गनीम को मारो ॥
काया कोटि बुहारि युक्तिसूं सतसिंहासन धरिये ।
तापर बैठि अमर पदवी लै राज अभैपुर करिये ॥
सबपर अमल चलै जब तेरो तो सम और न कोई ।
सेवक साहिब लोहा कञ्चन बूंद समुन्दर होई ॥
विघ्न कलेश आपदा नाशै निर्मल आनंद पावै ।
चरणदास शुकदेव दयासूं रहनि गहनि समुझावै ॥
जब गुरुशब्द नगारे बाजैं ।
पांच पचीसों बड़े मवासी सुनिकै डंका भाजैं ॥
दृढ़ दस्तकले ज्ञान सजावल जाय नगर के माहीं ।
हरि के धाम भजन करि मांगै चित्त चौधरी पाहीं ॥
कानोगोय लोभ के खोटे छलबल पाहीं झूठे ।
काम किसानरु मोह मुकद्दम सबै बांधिकरि लूटे ॥
तृष्णा आमिल मदको मातो पकरि गांवसूं काढै ।
मन राजाको निश्चल झण्डा प्रेमप्रीतिहित गाड़ै ॥