भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३६७
कंचन खंभ जटित हीरनसों नग लागे तामाहिं ।
पटुली अधिक अनूपम सोहै डोरी सुरंग सुहाहिं ॥
चहूँओर बदरा घेरिआये उमड़ घुमड़ गहराहीं ।
गरजत मेघ पवन झकझोरत दामिनि दमक दुराहीं ॥
गावत गीत मलार सहेली मिल मिल दै दै तार ।
झोंटा देत विशाखा ललिता आनंद बढ़ो अपार ॥
बोलत मोर पपीहा कोयल दादुर हंस चकोर ।
हरी भूमि ऋतु भई सुहाई भौंर करत अतिशोर ॥
भीजत रंगरंगीले प्यारे शोभा कही न जाय ।
चरणदास शुकदेव श्यामकी दोउ कर लेत बलाय ॥
झूलत कोइ कोइ संत लगन हिंडोलने ।
पौन उमाह उछाह धरती शौच सावन मास ।
लाजके जहाँ उड़त बगले मोर हैं जगहास ॥
हरष शोक दोउ खंभ रोपे सुरत डोरी लाय ।
बिरह पटरी बैठि सजनी उमंग आवै जाय ॥
सकल विकल तहाँ देत झोंके विपति गावनहार ।
सखी बहुतक रंगराती रँगी पाँचौ नार ॥
नैन बादल उमगि बरसें - दामिनी दमकात ।
बुद्धिको ठहराव नाहीं नेह की नहि जात ॥
शुकदेव कहैं कोई बली झूलै शीश देत अकोर ।
चरणदासा भये बौरे जति वरण कुल छोर ॥
हेली ॥
मो बिरहिन की बात हेली बिरहिन होय सोइ जानिहै।
मैंन बिछोहा जानतीरी अरीहेली बिरहैं कीन्हो घात ॥
या तनकुं बिरहा लगोरी अरीहेली ज्यों घुनलागो काठ।