भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन ३६५
पक्षी जरै दवलगी वन में मेरी गति भई ऐसी ॥
तरफतहूँ जिय निकसत नाहीं तनमेंअतिअकुलाई ।
चरणदास शुकदेव बिनायों दर्शन द्यौ सुखदाई ॥
राग सोरठ ॥
हमारे नैना दर्श पियासाहो ।
तनगयो सूखि हाय हियबाढ़ी जीवतहूँ वहिआसाहो ॥
बिछुरन थारो मरण हमारो मुखमें चलै न गासा हो।
नींद न आवै रैनि बिहावै तारे गिनत अकासाहो ॥
भये कठोर दर्श नहिं जानो तुमकूं नेकन सांसाहो ।
हमरीगति दिनदिन औरेहीविरह बियोग उदासाहो ॥
शुकदेव पियारे मत रहु न्यारे आनि करो उर बासाहो ।
रणजीता अपनोकरिजानो निजकरि चरणनदासाहो ॥
ऊधोजी कहां रहे भगवान ।
हम जानी काहूने मोहे मोहन चतुर सुजान ॥
तबसूं नैनन नींद न आवै धीरज धरत न प्रान ।
उमगि उमगि हियरो हुलसत है वह सुन्दर मुसकान॥
योग कथा तुम काहि सुनावां हमकूं नाहीं ज्ञान ।
प्रेम प्रीति की रीति अनोखी कापै होत बखान ॥
ऐसो हितू न कोऊ देखो जाय सुनावै कान ।
बाढ़ी व्यथा बिरहकी तन में सुधिलो कृपानिधान ॥
आवो दर्श दिखावो प्यारे देहु हमें जी दान ।
चरणदास शुकदेव श्याम बिन तज्योंखान अरु पान ॥
राग सारंग ॥
ऊधो क्या जानै हमरे जीवकी ।
चातक बूंद चकोर चन्दकूं ऐसे हमकूं पीवकी ॥