भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 412, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३७३
ज्यों सतवंती लियो सिंधौरा तार गह्यो ज्यों मकरी ॥
ज्यों कामी कूं तिरिया प्यारी ज्यों किरपिणकूं दमरी ।
ऐसे हमकूं राम पियारे ज्यों बालककूं ममरी ॥
ज्यों दीपककूं तेल पियारो ज्यों पावककूं समरी ।
ज्यों मछलीकूं नीर पियारो बिछुरे देखै यमरी ॥
साधौ के संग हरिगुण गाऊं ताते जीवन हमरी ।
चरणदास शुकदेव दृढ़ायो और छुटी सब गमरी ॥
अरे ले गुरुके बचन चितधररे ।
छिन छिन तेरी आय घटत है बेगि सँभारो घररे ॥
शील क्षमायत दृढ़करि राखो गरब गुमान निवारो ।
पांचौइन्द्री वशकरि अपने मन गनीम को मारो ॥
काया कोटि बुहारि युक्तिसूं सतसिंहासन धरिये ।
तापर बैठि अमर पदवी लै राज अभैपुर करिये ॥
सबपर अमल चलै जब तेरो तो सम और न कोई ।
सेवक साहिब लोहा कञ्चन बूंद समुन्दर होई ॥
विघ्न कलेश आपदा नाशै निर्मल आनंद पावै ।
चरणदास शुकदेव दयासूं रहनि गहनि समुझावै ॥
जब गुरुशब्द नगारे बाजैं ।
पांच पचीसों बड़े मवासी सुनिकै डंका भाजैं ॥
दृढ़ दस्तकले ज्ञान सजावल जाय नगर के माहीं ।
हरि के धाम भजन करि मांगै चित्त चौधरी पाहीं ॥
कानोगोय लोभ के खोटे छलबल पाहीं झूठे ।
काम किसानरु मोह मुकद्दम सबै बांधिकरि लूटे ॥
तृष्णा आमिल मदको मातो पकरि गांवसूं काढै ।
मन राजाको निश्चल झण्डा प्रेमप्रीतिहित गाड़ै ॥