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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 690 में से

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पृष्ठ 402

जब बाजी प्यारे तेंडी बंशी खान पान बिसरा दियां ।
भूलगई घर काज साज सब लाज छोड़ उठआदियां ॥
चरणदासी हम भई तिहारी फूली अंगन समादियां ।
राखि शरण शुकदेव पियारे चरणकमल लिपटादियां ॥
कोई समझावोरी मोहनलालकूं ।
ग्वालबाल सबही सँग लेकर सूने घर धँसिआवै ।
याकी घाली मोरी आली माखन रहन न पावै ॥
लेकर मटुकी चटदे झटकै गटकै माखन सारो ।
चटपट चाटपोंछ धरि पटकै नट ज्यों सटकै प्यारो ॥
जबहीं जाँव गगरिया भरने ठाढ़ो रहै बिहारी ।
आगे आकर कांकर मारे भीजै मोरी सारी ॥
जो अपने घर बठिरहूं तो अँगना धूम मचावै ।
जो कवहूँकै सोऊं सजनी स्वप्ने में दर्श दिखावै ॥
मेरे पीछे लांगो आली जित जाऊं तित डोलै ।
कहाँ लगि कहूँ ढीठता वाकी बात अटपटी बोलै ॥
बांको छैल महाँलबेलो प्रकट्यो है ब्रज माहीं ।
चरणदास शुकदेव पियारो सदा रहौ या ठाहीं ॥
कोइ आनि मिलावोरी श्याम सुजान को ।
नन्ददुलारो मोहन सोहन अजब अनोखो छैला ।
मदनगुपाल मुकुन्द मुरारी मेरो जीवनप्रानरी ॥
नैनन नींद न आवै सजनी कल न परै दिन रैना ।
व्याकुल भई फिरतहूँ बौरी भूली खान अरु पानरी ॥
जोकोउ हित ह्वैहै मेरो आली लालनकी सुधिलावै ।
दर्श दिखाय हरै सब बांधा मोको दे जीदानरी ॥
छिन छिन छिन, गति और होत हैलगो बिरहको बानरी ।