भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 411, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अब कैसे करि छूटै मोसों रोम रोम तन मन मई ॥
ज्यों प्रहलाद पैज दृढ़ कीन्ही हरणाकुश से बहुअरे ।
उबरोसंत असुर गहिमारो परगटहो हरि आखरे ॥
गुरु शुकदेव सहाय करि है अब पग पाछे क्यों परै ।
चरणहिदास वचन नहिं मोड़ै सूरसती मूये टरै ॥
साधौ टेकगई जाको सबगयो ।
लाजगई अरु काजगये सब वचन धर्म कछु ना रह्यो ॥
जगमें हांस फांस हियमाहीं कायरपन यों दहिगयो ।
अब पछिताये होत कहा है वह पानपतेरो बहिगयो ॥
पैज तजी मुखकारो हूवो धिक धिक जीवन तासको ।
बोझगयो ओछेकी संगति यह प्रताप कुबासको ॥
चरणदास शुकदेव कहै यों टेक न देवो शिर देवो ।
बार बार नर देहन पइये अपयश जगमें क्यों लेवो ॥
राग सोरठ ॥
साधौ भेष वही जामें टेक है ।
टेक नहीं तौ कहा भरोसो टेक विना नरतेकहै ॥
टेक विना कैसी सतवंती टेक विना नहिं सूरमां ।
टेक विना दाता भी नाहीं टेक विना योगी बूबना ॥
टेक विना नहिं भक्ता हरिको टेक विना नहिं सिद्धिहै ।
टेक विना सब भ्रर्मत डोलैं टेक विना नहिं ऋद्धिहै ॥
साधु संत अरु वेद कहत हैं टेक पकरि चढ़ु धाम कूं ।
चरणदास शुकदेव बतावैं टेक मिलावै राम कूं ॥
साधौ जो पकरी सो पकरी ।
अब तौ टेक गही सुमिरण की ज्यों हारिल की लकरी ॥
ज्यों शूरा ने शस्तर लीन्हो ज्यों बनिये ने तखरी ।