भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 403, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३६४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
चरणदास की पीर मिटावैं सुन्दर सुखके निधानरी ॥
राग सोरठ ॥
हमारे घर आयेहो सुन्दर श्याम ।
तनकी तपन मिटी देखतही नैनन भयो अराम ॥
अँगन लिपाऊं चौक पुराऊं फूल बिछाऊं धाम ।
आनँद मंगलचार गवाऊं ⌞ हूये पूरणकाम ॥
अब जागे सखि भाग हमारे मन पायी विश्राम ।
चरणदास शुकदेव पियाकुं हितसों करूं प्रणाम ॥
सो अब घर पाया हो मोहनप्यारा ।
लखो अचानक अज अविनाशी उघरि गये दृगतारा ।
झूमरहो मेरे आंगन में टरत नहीं कहुं टारा ॥
रोम रोम हिय माहीं देखो होत नहीं छिन न्यारा ।
भयो अचरज चरणदास न पहुंये खोज कियो बहुबारा ॥
वह घरी कौनसी लागे मोरे नैना ।
छोटी उमर भोलापन भारी जानूं एक न बैना ॥
जब लागे तब कछून जानी अबलागे दुख दैना ॥
चरणदास शुकदेवकुँ देखै तब पावै सुख चैना ॥
राग मलार ॥
सो बिथा मोरी जानत होअ कि नाहीं ।
नखशिख पावक विरह लगाई बिछुरन दुख मनमाहीं ॥
दिननहिं चैन नींद नहिं निशिकूं निश्चल बुधि नहिंमेरी ।
कासूं कहूं कोउ हितु न हमारो लग्न लहरि हरि तेरी ॥
तन भयो क्षीन दीन भये नैना अजहूं सुधि नहिं पाई ।
छतियां धरकत कर्क हिये में प्रीति महा दुखदाई ॥
जल बिनमीन पियाबिन बिरहिनि इन धीरज कहुकैसी ।