भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 408, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३६६
श्रीशुकदेव भले कहीरी अरीहेली बारम्बार सँभार ।
चरणदासहो श्याम की वही निबाहनहार ॥
मोमन कछु न सुहाय हेली प्रीतिलगी प्यारेलाल सूं ।
हँसिहँसिकै टोना कियोरी अरीहेली दैगयो मुरली गहाय ॥
जबहीं सूं चेटक लगोरी अरीहेली ढूंढूं कुंजनमाहिं ।
बौरीहो दौरौ फिरूं वह छवि दीखै नाहिं ॥
मोहिं मिलावै सांवरोरी अरीहेली ताके बलि बलि जावैँ ।
जन्म जन्म दासी रहूं कबहुं न छोड़ों पावैँ ॥
है कोइ पूरी रामकीरी अरीहेली मोहिं बतावै ठौर ।
जहाँ बिराजै श्यामजी वह बड़भागी पौर ॥
चरणदास घायल भईरी अरीहेली मोहन मारो बान ।
श्रीशुकदेव दिखाइये मेरो जीवन प्रान ॥
वह छवि करूं बखान हेली जा छावसौं नैनालगे ।
हितू देखि तोसूं कहूँरी अरीहेली और न पावैं जान ॥
मोर मुकुट माथे दियेरी अरीहेली कुण्डल सरवन माहिं ।
अलकें बल खाई रहें योगी देखि लुभाहिं ॥
भौंहन मधि बेंदा दिपेरी अरीहेली सुन्दर नैन विशाल ।
मोतीनासा सोहनो अरु बैजन्ती माल ॥
नीमोअङ्ग पीरो खुभोरी अरीहेली घूम घुमारो फेर ।
लाल खराऊं पावँ में मोमन राखत घेर ॥
पहुंचन में पहुंची कड़ेरी अरीहेली अँगुरिन मुँदरीछाप ।
अधरनपै मुरली धरे गावत रीझत आप ॥
चरणदास तिनकी भईरी अरीहेली तनमन डारोवार ।
गुरु शुकदेव सराहिया बुरो कहै परिवार ॥
बंशीबट की छांहिं हेली लाल लाड़िली मैं लखे ।