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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 407

३६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निशि दिन खाये जात है देखूं हरि की बाट ॥
हिरदे में पावक जलैरी अरीहेली ताप नैनाभये लाल ।
आंसू पर आंसू गिरैं यही हमारो हाल ॥
प्रियतमबिन कलनापरैरी अरीहेली कलकल सबअकुलाहिं ।
डिगीपरूं सत ना रहो कब पिय पकरैं बाहिं ॥
गुरु शुकदेव दया करैं री अरीहेली मोहिं मिलावैं लाल ।
चरणदास दुख सब भजैं सदारहूं पति नाल ॥
तरसैं मेरे नैन हेली राममिलन कब होयगो ।
पिय दर्शनबिन क्यों जिऊंरी अरीहेली कैसे पाऊं चैन॥
तीर्थ बर्त बहुतै कियेरी अरीहेली चितदै सुने पुरान ।
बाट . निहारतही रहूं छांड़ दई कुलकान ॥
लगी उमाहेही रहूँरी अरीहेली सुधि नहिं लीनी आय ।
यह योबन योंही चलो चालो जन्म सिराय ॥
बिरहादल साजेरहैरी अरीहेली छिन छिन में दुखदेह ।
मन लालन के वश परो भई भाखसी देह ॥
गुरु शुकदेव कृपा करोजी अरीहेली दीजै बिरहछुटाय ।
चरणदास पियसूं मिलैं शरण तुम्हारी धाय ॥
तिनकूं कछुन सोहाय हेली प्रीतिलगी घनश्यामसूूं ।
जो सुखहै संसारकेरी अरीहेली सो सब दिये बहाय ॥
भवनतजोअरुधनतजोरीअरीहेलीतजीकुलनकीरीत ।
मान बड़ाई सब तजी रहा एक हरि मीत ॥
भूखप्यासनिद्रातजीरीअरीहेलीतजिदियोवादविवाद ।
राग दोष दोऊ तजे तजो पाँच को स्वाद ॥
बहुत डरै सकुची रहैरी अरीहेली कहै न काहू बात ।
लगी रहै हरि ध्यान में ऐसे रैनि बिहात ॥