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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 410

शब्दवर्णन । ३७१
काके मुख पर नूर है जब बाजै मारू तूरा ॥
कलँगी अरु गजगाह बनावै इसका परन दुहेला ।
सांवत भेष बनाय चलत है यह नहिं सहज सुहेला ॥
या बानेको नेम यही है पगधरि फिरि न उठावै ।
जो कछुहोय सो आगेहि आगे आगेहीं को धावै ॥
रणमें पैठि झड़ाझड़ खेलै सम्मुख शस्तर खावै ।
खेत न छोड़ै हाई जूझै तबहीं शोभा पावै ॥
गुरु शुकदेव दियोहै हेला ऐसा होय सो आवै ।
चरणदास बाना संतन का तौले शीश चढ़ावै ॥
साधौ टेक हमारी ऐसी ।
कोटि जतन करि छूटै नाहीं कोउ करौ अब कैसी ॥
यह पग धरो संभाल अचल हो बोल चुके सोइ बोली ।
गुरु मारगमें लेन न दीन्हो अब इत उत नहिं डोली ॥
जैसे शूर सती अरु दाता पकरी टेक न टारैं ।
तन करि धनकरि मुख नहिं मोड़ैं धर्मन अपनो हारैं ॥
पावक जारो जल में बोरो टूक टूक करि डारो ।
साध संगति हरि भगतिन छाँडूं जीवन प्राण हमारो ॥
पैज न हारूं दाग न लागे नेक न उतरै लाजा ।
चरणदास शुकदेव दयासूं सबविधि सुधरे काजा ॥
राग सारंग ॥
हमारे राम नामकी टेक टारी ना टरै ।
लाखकरो कोइ कोटि करोजी काहूतैं कुछ ना सरै ॥
ज्यों कामीकूं तिरिया प्यारी ज्यों लोभी को दाम ।
अलमदार कूं अमल पियारो ऐसे हमकूं राम ॥
दुष्ट छुटावै गहि गहिकै पकरों हारिलकी लकड़ी भई ।