सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 409

३७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोउ खड़े गावैं हँसैं री अरीहेली अरु डारे गलवाहिं ॥
मोर मुकुट माथे दिपेरी अरी हेली सुन्दर नैन विशाल ।
पीताम्बर पट सोहनो कर मुरली उरमाल ॥
वाके विराजैं चन्द्रिकारीअरीहेली लीलवसन जरतार ।
नखशिख भूषण सोहने अरु फूलनके हार ॥
गुरु शुकदेव बताइयारी अरीहेलीजवहमलिये पिछान ।
चरणदासी तिनकी भई लगोरहै वहि ध्यान ॥
अथ सन्त शूरका अंग ॥
दो० सन्त समान न शूरिमा, कहैं रणजीत विचार ।
टेक गहैं सम्मुख चलैं, बांधि प्रेम हथियार ॥
राग सोरठ ॥
सन्त समान नहीं कोई शूरा ।
मोह सहित सब सेना मारी ऐसो साँवत पूरा ॥
क्षमा कि ढाल गही कर अपने बांधे सत तरवारा ।
कर्म भर्म के दलको पेलै पल पल वारंवारा ॥
सुरत को तीर हृदय को तरकस ध्यान कमान बनावै ।
प्रेमहाथ सूं खैंचनलागे चोट निशाने लावै ॥
बुद्धि विवेक कटारी बांधै वचन विलास की बरछी ॥
सतपुरुषों के हियरे बेधै कहिकहि बतियां तिरछी ॥
चितमें चाव चौगुनो उनके सुन सुन अनहद तूरा ।
अगम पंथसों पग न डिगावै होयजाय चकचूरा ॥
मन हुलास आसधर पीकी सुन्न खेत में धावै ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं अमर लोक पद पावैं ॥
राग सोरठ वा आसावरी ॥
साधू- पैज गहै सोइ शूरा ।