भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
३३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सुनत पुकार पयादेहि धाये तजिकै गरुड़ सवारी ॥
द्रौपदि लाज उतारण कारण लाये सभा मँझारी ।
दीनानाथ लई सुधि वेगहि बाढो चीर अपारी ॥
जिन जिन शरण गही संकट में कहा पुरुप कहा नारी ।
चारो युग हरि करी सहाई रक्षक भये मुरारी ॥
गुरु शुकदेव बतायो तोंकों सन्तन कौ रखवारी ।
चरणदास थकि द्वारे तेरे गुण पौरुष दिये डारी ॥
राग धनाश्री ॥
अब तुम करो सहाय हमारी ।
मन के रोग होय गये दीरघ तन के बड़े विकारी ॥
तुम सो बैद और को दूसर जाहि दिखाउं नारी ।
सजीवनमूल अमर हो जासों सोहै दया तुम्हारी ॥
क्रिया कर्म की औषधि जेती रोग बढ़ावनहारी ।
दीजै चूर्ण ज्ञान भक्ति को मेटो सकल व्यथारी ॥
जन के काज पयादे धावत चरणकमल पर वारी ।
मैं भयो दास अधीन तुम्हारो मेरी करो सँभारी ॥
जो मोहिं कुटिल कुचील जानिकै मेरी सुरति विसारी ।
चरणदास शुकदेव तुम्हारो दुष्ट हँसेंगे भारी ॥
हरिजी संकट वेगि निवारो ।
जनकूं भीर परी है भारी चक्र सुदर्शन धारो ॥
कंसनिकंदन रावणगंजन हिरणाकुश गहि मारो ।
दुष्टदलन अरु भक्तउबारन जन प्रह्लाद उबारो ॥
पांचो पाण्डव राख लिये हैं कौरव दल संहारो ।
जिन जिन द्वेष कियो सन्तन सों सो सोई हनि डारो ॥
निरभय भक्ति करें जन तेरे ऐसो समय बिचारो ।
शब्दवर्णन ३३१
चरणदास के घट में बैरी तिनको क्यों न बिदारों ॥
राग बिभास ॥
राखो जी लाज गरीबनवाज ।
तुम बिन हमरे कौन सँवारे सबही बिगरैं काज ॥
भक्तबछल हरिनाम कहावो पतिउधारणहार ।
करो मनोरथ पूरण जन के शीतल दृष्टि निहार ॥
तुम जहाज मैं काग तिहारो तुम तजि अन्त न जाऊँ ।
जो तुम हरिजी मारि निकासो और ठौर नहिं पाऊं ॥
चरणदास प्रभु शरण तिहारी जानत सब संसार ।
मेरी हँसी सो हँसी तिहारी तुम्हूँ देखि बिचार ॥
राग बिलावल ॥
प्रभुजी शरण तिहारी मैं आयो ।
जो कोइ शरण तिहारी नाहीं भर्मि-भर्मि दुख पायो ॥
औरन के मन देवी देवा मेरे मन तुहि भायो ।
जबसों सुरति सँभारी जग में और न शीश नवायो ॥
नरपति¹ सुरपति² आश तिहारी यह सुनकरि मैं धायो ।
तीरथ बरत सकल फल त्यागे चरणकमल चितलायो ॥
नारदमुनि अरु शिव ब्रह्मादिक तेरोही ध्यान लगायो ।
आदि अनादि जुगादि तेरो यश वेद पुराणन गायो ॥
अब क्यों न बांह गहो हरि मेरी तुम काहे बिसरायो ।
चरणदास कहैं करता तूंहीं गुरु शुकदेव बतायो ॥
राग केदारा ॥
अबकी तारिहौ बलबीर ।
चूक मोसों परी भारी कुबुधि के संगसीर ॥
१ मनुष्य का राजा २ इन्द्र ॥
३३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भवसागर की धार तीक्ष्ण महागँधीलो नीर ।
काम क्रोध मदलोभ भँवर में चित न धरत तहां धीर ॥
मच्छ जहां बलवन्त पांचौ थाह गहर गँभीर ।
मोह पवन झकोर दारुण दूर पैलौतीर ॥
नाव तौ मँझधार भरमी हिये बाढ़ी पीर ।
चरणदास कहै कोई नाहिं संगी तुम बिना हरिहीर ॥
राग सोरठ ॥
अब जगफंद छुटावोजी हूँ तौ चरणकमल को चेरो ।
परो रहूं दरबार तिहारे संतन माहिं बसेरो ॥
बिना कामना करूं चाकरी आठौं पहरेनेरो ।
मनसब भक्ति क्रिपा करि दीजै मोहिं यही बहुतेरो ॥
खानेजाद कदीमी कहियो तुही आसरो मेरो ।
झिड़क बिड़ारौ तऊ न छांडौ सेवा सुमिरण तेरो ॥
काहू और आन देवन सों रहो नहीं उरझेरो ।
जैसे राखो त्योंही रहहूं कर लीजौ सुरझेरो ॥
तेरे घर बिन कहूं न मेरो ठौर ठिकानो डेरो ।
मोसे पतित दीन को हरिजी तुम्हीं करो निबेरो ॥
गुरु शुकदेव दयाकरि मोकूं ओर तिहारी फेरो ।
चरणदास को शरणै राखो यही इनाम घनेरो ॥
राग बिलावल ॥
तुम साहब करतार हो हम बन्दे तेरे ।
रोम रोम गुनहगार हैं बकसो हरि मेरे ॥
दशों दुवारे मैल है सब गन्दम गन्धा ।
उत्तम तेरो नाम है बिसरे सो अन्धा ॥
गुणतजिकै अवगुणकिये तुमसबपहिंचानौ ।
शब्दवर्णन ३३३
तुम सों कहा छिपाइये हरि घट घट की जानौ ॥
रहमकरो रहमान तू यह दास तिहारो ।
भक्तिपदारथ दीजिये आवागवन निवारो ॥
गुरुशुकदेव उबारलौ अब मेहर करीजै ।
चरणहिंदास गरीब को अपना करलीजै ॥
राग रामकली ॥
चारिबरण सों हरिजन ऊंचे ।
भये पवित्र हरि के सुमिरे तनके उज्ज्वल मनके सूचे ॥
जोन पतीजै साखि बताऊं शबरी के झूठे फल खाये ।
बहुत ऋषीश्वर ह्वांइरहते तिनके घर रघुपति नहिआये ॥
भीलनी पाँव दियो सरिता में शुद्धभयो जल सब कोई जाने ।
मन्दहतो सो निर्मल हूवो अभिमानी नरभये खिसाने ॥
ब्राह्मण क्षत्री भूपहुते बहु बाजो शङ्ख श्वपच जब आयो ।
बालमीकि यज्ञ पूरण कीन्हो जयजयकार भयो यश गायो ॥
जाति बरण कुल सोई नीकौ जाके होय भक्ति परकास ।
गुरु शुकदेव कहत हैं तोको हरिजन सेव चरणहीदास ॥
सब जातिनमें हरिजन प्यारे ।
रहनी तिनकी कोई न पावै तनसों जग में मनसों न्यारे ॥
साखि सुनौ अँबरीष भूप की दुर्बासा जहँ आयो ।
लगो शराप देन राजाको चक्रसुदर्शन जारन धायो ॥
प्रभुजी आये दुर्योधन के वह मनमें गरबायो ।
नाना बधिके ब्यंजन त्यागे साग बिदुर घर रुचिसों पायो ॥
सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग मान सन्त को राखो ।
भक्तों वश भगवान सदाहीं वेद, पुराणन में यों भाखो ॥
३३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र घर कहीं होय क्यों न बासा ।
धनिकुल वह शुकदेव बखाने यह तुम सुनौ चरणहीदासा ॥
राग कान्हरा ॥
धनि वे नर हरिदास कहाये ।
रामभक्ति दृढ़हीकरि पकरी आन धर्म सबही बिसराये ॥
आठपहर गलतान भजन में प्रेममगन हिय में हुलसाये ।
आप तरै तारै औरनको बहुतक पापी पार लगाये ॥
प्रभु दर्शन बिन और न आशा धर्म्मकाम अरु मोक्ष न चाहै ।
आठो सिद्धि फिरें सँग लागी नेक न देखें नैन उठाये ॥
तिनको ऋषिमुनि जापकरत हैं हरिजन हरिदोउ सँगहीगाये ।
ऊंची पदवी इन्द्रहुते देवन देखि अधिक ललचाये ॥
कहैं शुकदेव चरणहीदासा धनि माता ऐसे जन जाये ।
जीवत शोभाजग में पाई तन छूटे हरि माहिं समाये ॥
राग सोरठा ॥
मोको कछु न चहिये राम ।
तुम बिन सबही फीके लागैं नाना सुख धन धाम
आठ सिद्धि नौनिद्धि आपनी और जननको दीजै ।
मैं तौ चेरो जन्म जन्मको निजकरि अपनो कीजै ॥
स्वर्ग फलनकी मोह न आशा ना वैकुंठ न मोक्षहि चाहूँ ।
चरणकमल के राखौ पासा
यहउरमाहिंउमाहूँभक्तिनछांडौंमुक्तिन मांगौंसुनुशुकदेवमुरारी
चरणदास की यही टेक है तजौं न गैल तुम्हारी ॥
राग भैरव ॥
वह पुरुषोत्तम मेरा यार । नेह लगा टूटै नहिं तार ॥
तीरथ जाऊं न बर्त्त करूं । चरणकमल को ध्यान धरूं ॥
शब्दवर्णन । ३३५
प्राण पियारे मेरेहि पासा । बन बन माहिं न फिरूं उदासा ॥
पढूं न गीता वेद पुरान । एकहि सुमिरौं श्रीभगवान ॥
औरनको नहिं नाऊं शीश । हरिही हरि हैं बिस्वेबीश ॥
काहूकी नहिं राखूं आस । तृष्णा काटि दही है फाँस ॥
उद्यम करूं न राखूं दाम । सहजहि ह्वै रहै पूरणकाम ॥
सिद्धि मुक्तिफल चाहौं नाहिं । नितहि रहूँ हरि संतन माहिं ॥
गुरु शुकदेव यही मोहिं दीन । चरणदास आनँद लवलीन ॥
यों कहैं हरिजी दयानिधान । सन्त हमारे जीवनप्रान ॥
सन्त चलैं जहाँ सँगही जावँ । सन्त दियो सो भोजन खावँ ॥
सन्त सुलावैं जितरहूँ सोय । सन्त बिना मेरे और न कोय ॥
सन्त हमारे माई बाप । सन्तहि को मनराखूं जाप ॥
सन्तको ध्यान धरौं दिनरैन । सन्त बिना मोहिं परै न चैन ॥
सन्त हमारी देही जान । सन्तहिं की राखूं पहिंचान ॥
सन्तकी सकल बलइया लेवँ । सन्त कूं अपनो सर्वस देवँ ॥
संतहिहेत धरूं अवतार । रक्षाकारण करूं न बार ॥
[
३३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परमेश्वर मिलनेकी लहरैं इक आवै इक जावै ।
कहैं शुकदेव चरणहीं दासा हरिहू कंठ लगावै ॥
राग विलावल ॥
हमारे चरणकमल को ध्यान ।
मूरख जगत भर्मता डोले चाहत जल अस्नान ॥
सब तीरथ वाही सों प्रकटे गंगा आदिक जान ।
जिन सेवन सब पातक नाश नितहोवै कल्यान ॥
साकत गिरही बानेधारी हैं सब ही अज्ञान ।
हरिसो हीरा छांड़िदियो है पूजे कांच पखान ॥
हरि चरण की महिमा जानैं हैं वे सन्त सुजान ।
भौंदू नर मायाके चेरे इनको कहा पहिंचान ॥
चरणदास शुकदेव गुरूने दीन्हों अंजन ज्ञान ।
साँचो प्रीतम सूझ परो है बिसरिगयो सब आन ॥
राग नट व विलावल सारंग ॥
हमारे रामभक्ति धनभारी ।
राज न डांडै चोर न चोरै लूटि सकै नहिं धारी ॥
प्रभु पैसे अरु रामरुपइये मुहर मुहब्बत हरिकी ।
हीराज्ञान युक्तके मोती कहा कमी हां ज़रकी ॥
सोना शील भँडार भरे हैं रूपा रूप अपारा ।
ऐसी दौलत सतगुरु दीन्हीं जाका सकल पसारा ॥
बाँटों बहुत घटै नहिं कबहूं दिन दिन ज्यौढ़ी ज्यौढ़ी ।
चोखा माल द्रव्य अति नीका बट्टा लगै न कौड़ी ॥
साह गुरू शुकदेव विराजैं चरणदास बन जोटा ।
मिलि मिलि रंक भूप हो बैठै कबहूँ न आवै टोटा ॥
शब्दवर्णन । ३३७
राग नट वा बिलावल ॥
जो नर हरि धनसों चितलावै ।
जैसे तैसे टोटा नाहीं लाभ सवायापावै ॥
मन करि कोठी नाव खजानो भक्तिदुकानलगावै ।
पूरा सतगुरु सांझी करिकै संगति वणिज चलावै ॥
हुंडी ध्यान सुरतिलै पहुंचै प्रेम नगरके माहीं ।
सीधा साहूकारा सांचा हेर फेर कछु नाहीं ॥
जित सौदागर सबही सुखिया गुरुशुकदेव बसाये ।
चरणहिंदास बिलमि रहे हाई जूनी पन्थ न आये ॥
राग देवगन्धार ॥
मनुवाँ राम के व्यौपारी ।
अबकै खेप भक्तिकी लादी वणिज कियो तैं भारी ॥
पांचौ चोर सदा मग रोकत इनसों कर छुटकारी ।
सतगुरु नायक के सँग मिलि चल लूट सकै नहिं धारी ॥
दो ठग मारग माहिं मिलेंगे एक कनक इक नारी ।
सावधानहो पेच न खइयो रहियो आप सँभारा ॥
हरिके नगर में जा पहुंचौगे पैहौ लाभ अपारी ।
चरणदास तोको समझावै रामन वारंवारी ॥
राग सोरठ ॥
हरि पावनकी गति न्यारी है ।
कष्ट तपस्या पढ़न लिखन सूं ढूंढत मूढ़ अनारी है ॥
अड़सठ तीरथ भरमत डोलैं देहगई सब हारी है ।
निरजल बर्त्तकिये बहुभाँती आश फलन की धारी है ॥
तप करने को बन जा बैठे कीन्ही त्वचा उघारी है ।
पौन अहारी तनहूंगारौ दर्शौ नाहिं मुरारी है ॥
८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
विद्या पढ़ि पढ़ि पण्डित हो वह अर्थ करै बहु भारी है।
अभिमानी है जन्म गँवायो भयो न प्रेम खिलारी है ॥
सांचिभक्ति बिन हरि नहिं रीझै बहुत गये शिरमारी है।
चरणदास शुकदेव श्याम पर तनमनसूं बलिहारी ॥
सुनु रामभक्ति गति न्यारी है ।
योग यज्ञ संयम अरु पूजा प्रेम सबनपर भारी है ॥
जाति वरण पर जो हरि जाते तौ गणिका क्यों तारी है।
शबरी सरस करी सुरमुनिते हीन कुचील जो नारी है॥
दुश्शासन पति खोवन लागो सबही ओर निहारी है।
होय निराश कृष्ण कहूँ टेरी बाढ़ो चीर अपारी है ॥
टेढ़ी लौंडी कंसराजाकी दीन्हों रूप करारी है।
एकसूँ एक अधिक ब्रजनारी कुबजा कीन्ही प्यारी है॥
पांचौ पाण्डवन यज्ञ सजो है सगरी सोंज सँवारी है।
बालमीकि बिन काज न होतो वाजो शंख सुशारी है ॥
साधौं की सेवा में राचो भूपकि सुरति बिसारी है।
सन भक्तके कारण हरिजी वाकी सूरति धारो है ॥
दासकबीरा जाति जोलाहा ब्राह्मण मिल कि ख्वारी है।
बनिजारा हो बालिदधरिलाये ताकी करी सँभारी है॥
साखि सुनौ रैदास चमार सो जग में उजियारी है।
कनक जनेऊ काढ़िदिखायो विप्रगये सब हारी है ॥
अजामील सदना तिरलोचन नामानाम अधारी है।
धन्नाजाट कालु अरु कूबा बहुतकिये भवपारी है॥
प्रीतिबराबर और न दीखै वेदपुराण विचारी है।
चरणदास शुकदेव कहत हैं तावश आप मुरारी है ॥
शब्दवर्णन । ३३६
राग गौरी ॥
आवो साधौ हिलमिल हरियशगावैं ।
प्रेमभक्तिकी रीतिसमझकरि हितसों रामरिझावैं ॥
गोविंदके कौतुक लीला गुण ताको ध्यानलगावैं ।
सेवा सुमिरण वंदन अर्चन नौधासों चितलावैं ॥
अबकी औसर भलो बनो है बहुरि दाँव कबपावैं ।
भजन प्रताप तरेभवसागर उरआनन्द बढ़ावैं ॥
सतसंगति को साबुन लेकर मलता मैल बहावैं ।
मनको धो निरमलकरि उज्ज्वल मगनरूप है जावैं ॥
ताल पखावज झांझ मँजीरा मुरली शङ्ख बजावैं ।
चरणदास शुकदेव दयासूं आवागमन मिटावैं ॥
राग बिलावल ॥
करिले प्रभुसों नेहरा मन मालीयार ।
कहा गर्व जियमें धरै जीवन दिनचार ॥
ज्ञानवेलि गहु टेककी दया क्यारी सवाँर ।
यत सत दृढ़को बीजहिबोवो तासु मँझार ॥
शील क्षमा के कूपको जल प्रेम अपार ।
नेम डोलभरि खैंचिकै सींचो बाग विचार ॥
छलकीकरकूं काटकै बाँधो धीरज बार ।
सुमति सुबुद्धि किसानको राखो रखवार ॥
धर्म्म गुलेल जु प्रीतिकी हित धनुष सुधार ।
झूंठ कपट पक्षीनकूं तासों मार ब्रिड़ार ॥
भक्तिभाव पौधालगै फूलै रङ्ग फुलवार ।
हरिरसमाता होयकै देखै लालबहार ॥
३४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सतसंगति फलपाइये मिटै कुबुद्धि विकार ।
जब सतगुरु पूरा मिलै चाखै अमृतसार ॥
समझावै शुकदेवजी चरणदास सँभार ।
तेरी काया में खिलै साँचो गुलजार ॥
राग मंगल
सोई सुहागिनि नारि पिया मनभावई ।
अपने घर को छोड़ि न परघर जावई ॥
अपने पियको भेद न काहू दीजिये ।
तन मन सुरति लगाय कि सेवा कीजिये ॥
पतिकी आज्ञा चाल पाल पियको कहो ।
लाज लिये कुलवंत यतनहींसूं रहो ॥
धनि धनि द्वै जगमाहिं पुरुष बहु हितधरै ।
सब सेनायक होय जो सर्वरकों करै ॥
पियको चाहो रूप सिंगार बनाइये ।
पतिव्रता कुल दोय में शोभा पाइये ॥
नौधा बस्तर पहिरि दया रँगलाल है ।
भूषण लक्षणधार बिचित्तर बाल है ॥
रङ्गमहल निर्दोष ह्वाँ झिलमिल नूर है ।
निर्गुण सेज बिछाय सभी करि दूर भै ॥
मन्दिर दीपक बाल बिना बाती घीव की ।
सुघर चतुर गुणराशि लाड़िली पीवकी ॥
कहैं गुरू शुकदेव यौं बालम मोहिये ।
चरणदास ले सीख जो प्रेम समोइये ॥
शब्दवर्णन । ३४१
राग मंगल
परमसुखी सोइ साधु जो आपा ना थपै ।
मन के रोग मिटाय नाम निर्गुण जपै ॥
परनिन्दा परनारि द्रव्य नाहीं हरै ।
जिन चालन हरि दूरि बीच अन्तर परै ॥
क्षण नहिं बिसरै राम ताहि निकटै तकै ।
हरिचर्चा बिन और वाद नाहीं बकै ॥
झूठ कपट छल भगल ये सकल निवारिये ।
यत सत शील सँतोष क्षमा हियधारिये ॥
काम क्रोध मद लोभ बिड़ारन कीजिये ।
मोह ममता अभिमान अकस तजदीजिये ॥
सब जीवन निर्वैर त्यागि बैरागले ।
तब निरभै ह्वै सन्त भांति काहू न भै ॥
काग करम सब छोड़ि होय हंसागती ।
तृष्णा आश जलाय सोई साधू मती ॥
जगसूं रहै उदास भोग चित ना धरै ।
जब रीझैं करतार दास अपनो करै ॥
कहै गुरू शुकदेव जो ऐसा हूजिये ।
चरणहिंदास विचार प्रेममें भीजिये ॥
राग बिलावल ॥
राधेकृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण गावरै ।
या देही को कहा भरोसो पल पल छिन छिन छीजत आवरै ॥
कहा अभिमान करै मायाको यह धोखासा जान बावरै ।
मानुषजन्म भागि सों पायो बहुरि न ऐसो कबहूँ दावरै ॥
भवसागर जो उतरो चाहै सतसंगति की चढ़ले नावरै ।
ज्ञानबली गहिपार मुक्ति हों निश्चय तत्त्व पदारथ पावरै ॥
३४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सतयुग में सतही सत कहते त्रेता तप करते तनतावरै ।
द्वापर पूजा राजमानसी कलियुगकीर्त्तन हरिहि रिझावरै ॥
तातेसब तजिहरिही हरिभजिनिशिदिन चरणकमल चितलावरै ।
चरणदास शुकदेव चितावें श्याम मिलनको यही उपावरै ॥
जगमें दो तारणको नीका ।
एक तौ ध्यान गुरूका कीजै दूजे नाम धनीका ॥
कोटि भांतिकरि निश्चय कीयो संशयरहा न कोई ।
शास्त्र वेद पुराण टटोले जिनमें निकसा सोई ॥
इनहीं के पीछे सब जानौ योग यज्ञ तप दाना ।
नौविधि नौधा नेम प्रेम सब भक्ति भाव अरु ज्ञाना ॥
और सबै मत ऐसे मानो अन्न बिना भुस जैसे ।
कूटत कूटत बहुतै कटा भूखगई नहिं तैसे ॥
थोथा धर्म वही पहिंचोनौ जामें ये दो नाहीं ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं समुझि देखि मनमाहीं ॥
राग आसावरी ॥
साधौ भक्ति नफा करिलीजै । दिन दिन काया छीजै ॥
मकरतजै तो मथुरा मनमें कपट तजै तो कासी ।
और तीर्थ सबही जगन्हाया नाहिं छुटी यम फांसी ॥
भाल तले तिरवेणी राजैं बिरलो जन कोइ न्हावै ।
सुगुरा होयसो नित उठि परशै निगुरा जान न पावै ॥
काया मन्दिर में हरि कहिये वेद पुराण बतावैं ।
इत उत भूले लोग फिरत हैं धोखेको शिरनावैं ॥
यंतरटोना मूड़ हलावन ताकूं सांच न मानौ ।
तजिकै सार असार गह्यो है तापर भयो सयानौ ॥
शब्दवर्णन । ३४३
चरणदास शुकदेव कहत हैं निजकरि मूल गहीजै ।
पारब्रह्म जिन सृष्टि उपाई ताओरी चितदीजै ॥
राग बिलावल ॥
नमो नमो श्रीरामजी देवनके देवा ।
शिव नारद सनकादिलौं कोइ लहै न भेवा ॥
एजी निरगुणसों सरगुण भये कौतुक विस्तारे ।
साधुन की रक्षा करी दानव दल मारे ॥
दसरथसुत भूले कहें कोई जानत नाहीं ।
इकशत अंड दिखाइया अपने मुख माहीं ॥
गौराने परचो लियो सियभेष बनायो ।
देखे रूप अनन्तही जब मन बौरायो ॥
आदि निरंजन एक तू दूजा नहिं कोई ।
शुकदेव कहीं चरणदासको नित सुमिरौ सोई ॥
नमो नमो गोविन्दजी हूं दास तिहारी ।
चौरासी दुख सब हरो आवागमन निवारो ॥
कर्मनको प्रेरो फिरूं नहिं पायो नेरो ।
अबके ऐसी कीजिये दीजै चरणबसेरो ॥
पतितउधारण तुम सुने वेदन में गाये ।
अजामील गणिका तरे ले पार लगाये ॥
एजी गुरु शुकदेव बताइया गही तुम्हारी आसा ।
आन धर्मको छोड़िकै भयो चरणहिंदासा ॥
राग जैजैवन्ती ॥
आदितौ सनातन सोई अज अविनाशी है साईं ॥ जाको
नहिंवारपार निर्गुणको तत्त्वसार तासों भयो जग सब आप
२४
३४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निर्वासी है । अद्वै निराकार जानौ सतचिदानन्द मानौ पुरुष
को रूपधरि माया परकासी है ॥ नेति नेति वेद कहैं अस्तुति
माहीं रहैं भेद कछु नाहीं लहैं थकथक जासी है । योग ध्यान
आवै नाहीं ज्ञानसों न गहौजाई भक्तों के हिये माहि सदा जो
विलासी है ॥ सन्तों हेतु देह धरै आयके सहायकरै पृथ्वी को
दुःख हरै घटघटवासी है। एहो चरणदास जन वासों क्यों न
लावो मन शुकदेव कृपाघन खोलिदइ गांसी है ॥
सावरो सलोनोप्यारो मेरे मनभायो है माई ॥ कहा कहूं शोभा
वाकी तीन लोक माया जाकी शेषहू की रसना थाकी पारहून
पायो है । निरगुण निराकार कोऊ कहा जानै सार सन्तों की
सहायकाजे देह धरि आयो है ॥ ब्रजहू में कौतुक कीन्हे सन्तन
को सुखदीन्हे मुरली बजाय गाय रीझिकै रिझायो है । योगी
जाको ध्यान लावैं ब्रह्मा अरु वेदगावैं ताको तौ यशोदा माता
गोदमें खिलायो है ॥ चरणदास सखीपर शुकदेव कृपाकीन्ही
बांकोसो विहारी एक पलमें दिखायो है ॥
बधाई राग मलार ॥
बधाई सबही ब्रज सोहाई ।
मुदितभये वसुदेव देवकी मनमें अति अधिकाई ॥
पहुँचे जाय महरि घरमाहीं काहू भेद न जानो ।
यशुमति रानी बालक जन्म्यो सबने योंकर मानो ॥
घर घर मंगलचार भये हैं बन्दरवार बँधाईं ।
नूतन बस्तर पहिरि पहिरि कै नारि सबै घिरिआई ॥
करि कौतूहल मिलि मिलि गावत करैं उछाह घनेरा ।
याचक भीर बहुत भइ द्वारे बजत दमामे भेरा ॥
शब्दवर्णन । ३४५
जिसलायक देखा सो दीन्हा करी शुश्रुषा भारी ।
इक आवत इक जात बिदाहो देत अशीश महारी ॥
धनिगोकुल धनिंपौरि भवनधनि आये हैं जगदीश ।
शिव ब्रह्मादिक ध्यान धरत हैं लख ईशनको ईशा ॥
दुष्टदलन सन्तन सुखकाजैं लीन्ह्यो है औतारा ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं जगपति सिरजनहारा ॥
नन्दघर कौतुक करन नवीने ।
जो जो वचन किये थे आगे सो आ पूरण कीने ॥
भक्तबछल करतार गुसाईं धरिआये औतारा ।
रक्षाकारण साधु ऋषिनकी भूमि उतारण भारा ॥
जब जब भार बढ़त पृथ्वीपर तब तब होत सहाई ।
मर्यादा पुरुषोत्तम येही बिगरी सबै बनाई ॥
निरगुणसों सरगुण वपुधारे कष्ट निवारण काजै ।
योगेश्वर जेहि ध्यान लगावैं नामलिये अघ भाजै ॥
भाग बड़े यशुमति रानी के दर्शन दीन्हें आई ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं सुर मुनि करी बधाई ॥
जगतपति देखि महरघर आये ।
बाल चरित्र ही दिख्लावन आनँद अधिक बधाये ॥
तप कीन्हों थो नन्द यशोदा पिछले जन्म अघाई ।
वरमांगो थो हम सुत होके खेलो भवन मँझाई ॥
वचन न मोड़ा आय विराजे भक्तोंवश सुखदाई ।
जो जो चाहो सो सुखदीयो हुये कुँवर कन्हाई ॥
संग लियो समीप मुक्तिको ब्रज में अवन कियो है ।
सुख उपजायो नर नारिनको दर्शन आय दियो है ॥
३४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जब जब प्रकटे चारों युगमें सत कलि द्वापर त्रेता ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं सन्तनही के हेता ॥
सखीरी आज गोकुल भाग बड़ाई ।
दर्शन दे वसुदेव देवकी नँदघर प्रकटे आई ॥
भादौंमास वदी बुध आठौं ग्रह नक्षत्रर नीके ।
यशुमति रानी गोद सिरानी भये मनोरथ जीके ॥
भयो उछाह स्वरग के माहीं देव सभी हर्षाये ।
अपने अपने बैठि विमानन पुष्प अधिक वर्षाये ॥
यह धरती परफुल्ल भई है फूलउठा वन सारा ।
कालिन्दी को बड़ो उमाहो करिहैं लाल विहारा ॥
किरपासागर होय उजागर मर्यादा बँधबांधन ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं कारण अपने साधन ॥
सखीरी सुन देख अभी मैं आई ।
यशुमति रानी बालक जायो यहतोहिं आनि सुनाई ॥
नयनि डोलै हँसि हँसि बोलै घर घर कहत बधाई ।
भयो उछाह सकल गोकुल में बातभई मनभाई ॥
सुन सुन आपस में मुसकाने देन बधाई लागे ।
भूषण वस्तर लगे सवाँरन नरनारी रसपागे ॥
वनसों रहे गये नँदद्वारे ग्वाल सभी हरषाये ।
बड़ो पौरि के आगे याचक गावनहीं को आये ॥
मैं घर जाऊ वनकर आऊं तुमहूं देह शिंगारो ।
साथ चलेंगी जाय मेलेंगी होइहै कौतुक भारो ॥
शुकदेवा का मुँह देखेंगी करिहैं अधिक हुलासा ।
ऐसे कहि वह भवन सिधारी भनै चरणहीदासा ॥
शब्दवर्णन । ३४७
राग हिंडोलनो ॥
झूलत हरिजन सन्तभक्ति हिंडोलने ।
ररा ममा दृढ़खंभ रोपे प्रेम डोरी लाय ।
टेक पटरी बैठि सजनी अतिअनन्द बढ़ाय ॥
ध्यानके जहाँ मेघ बरसें होय उमँग हुलास ।
गुरुमुखी जहाँ समझ भीजैं पूरण हरिके दास ॥
बुद्धि विवेक विचारि गावैं सखी सहेली साथ ।
अगमलीला रटैं सजनी जहां ब्रह्मविलास ॥
परमगुरु श्रीजनक झूलैं झूलैं गुरु शुकदेव ।
चरणदासी सखी सदा झूलैं कोइ न पावै भेव ॥
राग हेली ॥
और न मेरे कोय हेली ।
प्राणपियारे लालजी ॥ रोम रोमरोम वेई रमेरी अरी हेली तन
मन व्यापक सोय ॥ जित देखों तित लालकोरी अरी हेली दूजा
नाहीं और ॥ आदि अन्त है लालजी सर्वमयी सबठौर ॥
देश काल सबलालहैं री अरी हेली अर्धऊरध है लाल । दहिने
बायें लालजी दशोंदिशा में लाल ॥ सोवतही में लालहैं री
अरी हेली जाग्रतहीमें लाल । माहिं सुषोपति लालजी तुरियाही
में लाल ॥ ज्ञान ध्यान सब लाल हैंरी अरी हेलीलालही गुरु शुकदेव
चरणदासी है लालकी बिरला जानै भेव ॥
जो होवै हो हरिदास हेली एते कुलतारै वही ॥ फल न
मुक्तिचाहै नहींरी अरी हेली भक्ति करै निर्वास ॥ बीस चार कुल ददा
केरी अरी हेली बीस नाना के जान । सोलह कुल ससुरारके
द्वादश सुता बखान ॥ बहनी के ग्यारह तरेरी अरी हेली दश
भूवा के पार । मौसी के कुल आठही वेद कहत हैं चार ॥ अष्टादश
३४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
यों कहें री अरी हेली कहें साधु अरु सन्त । चरणदास शुकदेव
भी कहें कमलाको कन्त ॥
छूटे आल जंजाल हेली चरण कमल के आसरे ॥
भर्मभूत सबही छुटेरी अरी हेली सौन नक्षत्रनाल ॥ जन्तर
मन्तर सबछुटेरी अरी हेली छूटे वीर मशान । मूठ डीठ अब
ना लगै नहीं घात को बान ॥ शनैश्चरबल अब ना चलैरी
अरी हेली नहीं राहु अरु केतु । मंगल बृहस्पति ना दहैं नहीं
भोग उनदेतु ॥ ज्योति बालपर सो नहींरी अरी हेली मानूं न
देवी देव । सतगुरु मोहि बताया सांचो झूठो भेव ॥ अठसठ
तीरथ ना फिरूंरी अरी हेली पूजूं न पाथर नीर । श्रीशुकदेव छुटा-
इया जन्म मरणकी पीर ॥ निश्चलहो हरि की भईरी अरी हेली
सुमिरूं निर्मलनावँ । अनन्य भक्ति दृढ़सूं गही मारग आन न
जावँ ॥ गोविन्द तजि औरन भजैरी अरी हेली ताके मुहड़े
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शब्दवर्णन । ३४६
कमलनैन केशव^३७ मधुसूदन^३८ सबमें^३९ सबसे न्यारा^४० ॥
हृषीकेश^४१ मुरलीधर^४२ मोहन^४३ ॐ^४४ अखिल^४५ अयोन^४६ ।
भगवंत^४७ वासुदेव^४८ भगवाना^४९ ज्ञानी^५० ध्यानी^५१ मोनी^५२ ॥
दीनानाथ^५३ गोपाल^५४ हरी^५५ हरै गरुड़ध्वज^५६ घनश्यामा^५८ ।
भक्तिवछल^५९ अरु देवकिनन्दन^६० करता सब विधिकाम^६१ ॥
आदिप्रधान^६२ माधुरीमूरति^६३ धरणीधर^६४ बलवीरा^६५ ।
नन्दनंदन^६६ अरु यशोदानन्दन^६७ सुन्दर श्याम शरीरा^६८ ॥
परशुराम^६९ नरसिंह^७० विश्वंभर^७१ अचल^७२ अखण्ड^७३ अरू^७४पी ।
ईश^७५ अगोचर^७६ और जगतगुरु^७७ परमानँद^७८ बहुरू^७९पी ॥
करुणामय^८० कल्याण^८१ अनन्ता^८२ दयासिंधु^८३ वनवारी^८४ ।
धारण शंखचक्र^८५ रुकिमणि^८६पति आनंदकन्द^८७ विहा^८८री ॥
परमदयालु^८९ मनोहर^९० नरहरि^९१ कृपा^९२निद्धि फलदाता^९३ ।
कंसनिकन्दन^९४ रावणगंजन^९५ जगपति^९६ लक्ष्मीनाथा^९७ ॥
जगन्नाथ^९८ अरु बद्रीनाथा^९९ निरगुणं^१०० सरगुणं^१०१धारी ।
दा^१०२मोदर रघुवर^१०३ सीतापति रामा^१०४ कुंजविहा^१०५री ॥
दुष्टदलन^१०६ सन्तन्को रक्षक^१०७ सकल सृष्टिको ^१०८सांई ।
दुःखहरण के कौतुक अनगिन शेष पार नहिं पाई ॥
सौ अरु आठ नामकी माला जो नर मुखों उच्चारै ।
अपने कुलकी सारी पीढी एकअरुसौ को तार ॥
गुरु शुकदेव मंत्र निज दीन्हो रामनाम ततसारा ।
चरणदास निश्चय सों जपकरि उतरो भवजलपारा ॥
राग केदारा ॥
हरिको सुमिरि संकट हरन ।
कोटि कष्टनिवारि डारै जगत पोषण भरन ॥
भक्ति पूरण देखि निश्चल अनन्य बाधों परन ।