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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

शब्दवर्णन । ३१७
अथ श्रीचरणदासकृत शब्द प्रारम्भः ॥
मंगलाचरण गुरुस्तुति ॥
दो० ब्रह्मरूप आनन्द घन, निर्विकार निर्लेव ।
मंगल करण दयाल जी, तारण गुरु शुकदेव ॥
सतियन१ में तुम सत्त हौ, शूरन में हौ बीर ।
यतियन में तुम यत्त हौ, श्रीशुकदेव गँभीर ॥
पतित उधारण तुम लखे, धम्मे चलावन भेव ।
संकट सकल निवारियै, जै जै श्री शुकदेव ॥
चिन्ता मेटन भोहरण, दूरिकरण जगव्याध ।
गुरु शुकदेव कृपा करौ, चरण लगे सब साध ॥
दाता चारों भेदके, श्रीशुकदेव दयाल ।
चरणदास पर हूजिये, बारंबार कृपाल ॥
राग कल्याण ॥
नमो शुकदेव हों चरण पखारणं ॥ द्वंद संकटहरणं ।
करणसुखमंगलं । परम आनंद घन पतित के तारणं ॥
नामतक त्याग बैराग है मुक्तिलों तीनिहूँ गुणनते निर्विकारं ।
महानिहकाम और ध(मचौथे रहौ सिद्धि चेरी भई फिरैं लारं ॥
ज्ञानके रूप अरु भूप सब मुनिन में दयाकी नाव किये जीवपारं ।
उदैभागवतमतभानु२परगटकियो तिमिर३कियोदूरअरुधर्मधारं ॥
मोहदलजीतिअनरीतिका खण्डनं भक्तिके दृढ़करनभवबिडारं ।
चरणदासके शीशपरहाथनितहीरहै यहीमाँगौंगुरू बारबारं ॥
मंगलाचरण ॥
दो० दश चिह्न दहिने चरण, बायें हैं दश एक ।
१ संन्यासी २ सूर्य ३ अंधेरा ॥

.३१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिनके निहचल ध्यानतें, कटैं जु बिघ्न अनेक ॥
श्रीशुकदेव अज्ञा दई, चरणदास उच्चार ।
सों अब वरणन करतहूँ, शब्दमाहिं विस्तार ॥
राग कल्याण ॥
चरण चिह्न चितलाव फेरि तेरा जन्म न होगा ।
पदम¹ झलकक्षवि निरखिनैनभरि अंकुश मनअटकाव ॥
अम्बर² छत्र कुलिश यव राजत ध्वजा धेनु³ पदभाव ।
शंखचक्र अरु कलश सुधाह्रद४ तासूं चित उरझाव ॥
स्वस्तिक जम्बू फलकी शोभा जासों सुरति लगाव ।
अर्द्धचन्द षटकोन मीन बिंदु ऊर्ध्व रेख लखिचाव ॥
अष्टकोण तिरकोण बिराजै धनुष बरण उरधाव ।
कोटिकाम नख ऊपर वारूं नूपुर सुन्दर पाव ॥
श्री शुकदेव चिह्नपद बरणे सो तू हिये में लाव ।
चरणदास हित राखि भोर निशि बार बार बलिजाव ॥
मंगल आरती रागभैरव ॥
मंगल आरति या बिधि कीजै । हर्षपाय आनँदरस पीजै ॥
प्रथमँ मंगल गुरुही जान । जिनसूं पायो पद निर्वान ॥
ज्ञान भानु परगट कियो भोर । मिटगइ रैन तिमिर घनघोर ॥
द्वितिये मंगर श्री गोपार । भक्ति बछल बहुपतित उधार ॥
राम कृष्ण पूरण औतार । दुष्टदलन सन्तन रखवार ॥
तृतिये मंगल प्रभुजी के साध । मानसरोवर मता अगाध ॥
तिनकी संगति उठि गयो संसा । कागपलट गति है गयो हंसा ॥
चौथे मंगल श्रीभागौत । घट उजियार करन कूं ज्योत ॥
पाप ताप दुख मेटन हारी । जिहिनौका चढ़ि उतरौ पारी ॥
१ कमल २ अम्बारी ३ गौ ४ चन्द्रमा ॥

शब्दवर्णन । ३१६
पाँचवें मंगल श्रीशुकदेव । तनमन सूं करि उनकी सेव ॥
चरणहिं दास चरण चितलायो । मंगल चार भये जस गायो ॥
मंगल आरति कीजै प्रात । सकल अविद्या¹ घटगइ रात ॥
सूरज ज्ञान भयो उजियारा । मिटिगये ओगुण कुबुधि बिकारा ॥
मनके रोग शोग सब नाशे । सुमति नीर शुभजलज² प्रकाशे ॥
भय अरु भर्म नहीं ठहराई । दुविधागई एकता आई ॥
जाति बरण कुलसूझे नीके । सब सन्देह गये अब जीके ॥
घटघट दरशै दीनदयाला । रोम रोम सब होगइ माला ॥
दृष्टि न आवै दुख जग जाला । कागपलटि गति भये मराला³ ॥
अनहद बाजे बाजन लागे । चोर नगरिया तजि तजि भागे ॥
गुरुशुकदेव कि फिरी दोहाई । चरणदास अन्तरलौ लाई ॥
भोरकी ध्वनि रागभैरव ॥
जैजै ब्रह्म अचल अविनाशी । आपनिहीं सब ज्योति प्रकाशी ॥
जैजै अखिल निरंजन देवा । ऋषिमुनि शारदलहैं न भेवा ॥
जैजै आदि पुरुष जगदीश । हर्षित तोहि नवाऊं शीश ॥
जैजै जगपति सिरजनहारा । व्यापिरह्यो जीव जन्तु मँझारा ॥
जैजै भूमिभार परहारी । प्रकट होत संतन हितकारी ॥
जैजै बपुधारी चौबीश । लीला कारण त्रिभुवन ईश ॥
जैजै कृष्ण मनोहर गाता । नैन बिशाल प्रेमके दाता ॥
जैजै भक्तवछल भगवान । व्याधि कटतहैं जिनके ध्यान ॥
जैजै निरगुण सरगुण रूप । नाना भांती अधिक अनूप ॥
जहां तहां छबिधारे रहें । जाकी महिमा को कबिकहैं ॥
जैजै हो शुकदेव विराजैं । मम मस्तकपर निशिदिनराजैं ॥
जैजै प्रेम सुधारस पिये । जैजै तिलक शिर मिली किये ॥
१ माया २ कमल ३ हंस ॥

३२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
जैजै साधुन के सुखदाई। चरणदास तुम्हरी शरणाई ॥
आरति आदि पुरुषकी कीजै। साधौ अगमअपारअचलमनदीजै ॥
अद्भुत आरती ॐ कारा। त्रिदेवा होय जगत पसारा ॥
पहिले मच्छरूप हरि धारो। वेदलाय शंखासुर मारो ॥
रई मन्द्राचल बासुकि नेती। चौदहरतन मथन दधि सेती ॥
रूप बराह धारि हरि धाये। हिरण्याक्षहि हनि धरतीलाये ॥
खम्भ फारि हिरणाकुश मारो। नरसिंहह्वै प्रहलाद उबारो ॥
बामनह्वै करि बलि छलि लीन्हे। तीनि लोक तीनों डगकीन्हे ॥
परशुराम ह्वै शरतर धारे। क्षत्री सबै निकछ करि डारे ॥
रामरूप रावण दलमलिया। लंकाराज बिभीषण मिलिया ॥
कृष्णरूप ह्वै कंस पछारो। दर्शनदे ब्रज सकल उधारो ॥
बोधरूप अचरज गति तेरी। कौतुक देखि थकी बुधि मेरी ॥
निष्कलंक निर्लिंस निरासा। संभल सुरतलियो जहाँबासा ॥
हरि हैं एकरूप बहुधारे। निराकार आकार नियारे ॥
दश अवतार आरती गाऊँ। निरभै होय अभैपद पाऊँ ॥
चरणदास शुकदेव बतायो। निरगुणहरिसरगुणह्वै आयो ॥
आरति रमता राम कि कीजै। अन्तर्द्धान निरखि सुखलीजै ॥
चेतन चौकी सतको आसन। मगनरूप तकिया धरि दीजै ॥
सोहंथाल खैंचि मन धरिया। सुरतिनिरतदोउबाती वरिया ॥
योगयुगति सूं आरतिसाजी। अनहद घंट आपसूं बाजी ॥
सुमति सांझकी बिरियाआई। पांचपचीसमिलि आरतिगाई ॥
चरणदास शुकदेव को चेरो। घटघट दर्शै साहब मेरो ॥
आरति करत हँसै मनमेरो। वार पार कछु दिखै न तेरो ॥

शब्दवर्णन । ३२१
अमर अडोल निरीच्छन भेखा । त्रिगुण रहत रूप नहिं रेखा ॥
चेतन आनँद नित निराधारा । निराकार निर्लिप्त निरारा ॥
निराकार आकार बिवरजाति । निरगुण अरुसरगुणतेरीगति ॥
हाथ पाँव अरु शीश घनेरे । कैसे आरती करूं प्रभु मेरे ॥
सोहं बाती घीव अखण्डा । एकहि ज्योति बलै ब्रह्माण्डा ॥
तुही थाल तुहि आरति साजै । तुहि घंटा तुहि झांझरिबाजै ॥
चरणदास शुकदेव लखायो । सुरति थकी पै पार न पायो ॥
गगन मँडल में आरति कीजै । उत्तम सोंज सकल सजिलीजै ॥
सुखमन अमृत कुम्भ धरावै । मनसा मालिनि फूल चढ़ावै ॥
घीव अखण्डा सोहं बाती । त्रिकुटी ज्योति बलै दिनराती ॥
पवन साधना थाल करीजै । तामें चौमुख मन धारदीजै ॥
रबिशशि हाथगहौ तिहिमाहीं । खिन दहिनो खिन बायें लाई ॥
सहसकमल सिंहासन राजैं । अनहदझालरि नितही बाजैं ॥
इहिबिधि आरति सांचीसेवा । परम पुरुष देवन को देवा ॥
चरणदास शुकदेव बतावैं । ऐसी आरति पार लगावैं ॥
ऐसें आरति करि हुलसावै । दै परिक्रमा शीश नवावै ॥
तनकोथालअरुमनको चौमुख । ज्ञान ध्यान की बाती लावै ॥
भक्तिभावको घी भरि तामें जगमग जगमग ज्योति जगावै ॥
अर्ध ऊर्ध हितसूं करि फेरै रचना रचै ल बर्षावै ॥
सुरति मृदंग अरु निरति तँबूरा झैंगड़ झैंगड़ झांझ बजावै ॥
ताल बीण मुरचंग शंखध्वनि प्रेम मगन ह्वै हरिगुण गावै ॥
सोरन कलशा जलको राखै धूपरु अगर सुगन्धि धरावै ॥
या बिधि सों शुकदेव श्यामकी गाय आरतीको फलपावै ॥
युगलकिशोर निरखि नैननसों चरणदासि सखिबलि बलिजावै ॥

३२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सच में ॥
या बिधि गोबिन्द भोगलगावो । भक्त बछल हरिनाम कहावो ॥
बेर भीलनी के तुम पाये । देखि ऋषीश्वर सकल लजाये ॥
जैसे साग विदुर घर पायो । दुर्योधन को मान घटायो ॥
भक्त सुदामा के तंदुल लीन्हे । कंचनमहल अधिक सुख दीन्हे ॥
ज्यों करमा की खिचरी खाई । नेहलियो सब शुचि बिसराई ॥
तुम्हरी बिभौ प्रभु तुम्हरेहि आगे । हमसें दीनन को कहा लागे ॥
प्रेम प्रीतिसूं भोजन कीजै । बचै सीथ सन्तनकूं दीजै ॥
चरणदास भरि राखी झारी । अँचवो हरि शुकदेव मुरारी ॥
भोगके आगेकी ध्वनि काफी ॥
जै जै पारब्रह्म परधान । जाकूं पावै गुरु के ज्ञान ॥
ब्रह्म पुरुष को धरो स्वरूप । सो तौ कहिये अधिक अनूप ॥
जै जै ॐ और त्रै देव । जै जै दश औतार अभेव ॥
जै जै वृन्दाबन निज धाम । जै जै गोकुल अरु नँदग्राम ॥
जै जै गोपी जै जै ग्वाल । जै जै सदा बिहारीलाल ॥
जै जै कुंजगली नँदलाल । मोर मुकुट मुरली बनमाल ॥
जै जै राधे कृष्ण मुरार । जै जै व्यास वेद उच्चार ॥
जै जै महा विदेह जनकजी । जै जै श्री शुकदेव दयाल ॥
इन को नाम जपै जो कोय । प्रेम भक्ति पावत है सोय ॥
चरणदास सुख बास लहैं । हरि चरणन के पास रहैं ॥
अथ गुरुदेव का अंग राग कल्याण ॥
सतगुरु पांचौ भूत उतारो ।
जन्म जन्म के लागेहि आये दै मन्तर अब तिन्हें बिडारो ॥
काम क्रोध मोह लोभ गर्भने मन बौराय कियो अपभायो ।

शब्दवर्णन । ३२३
जिनके हाथ परो जिय मेरो घेरा घेरी बहु दुख पायो ॥
एकघरी मोहिं छोड़त नाहीं लहरि चढ़ायकै बहुत नवायो ।
कपि ज्यों घर घर द्वार नचावै उत्तम हरिको नाम छुटायो ॥
अबके शरणि गही है तुम्हरी चरणहिंदास अयाने ।
किरपा करि यह व्याधि छुटावो गुरु शुकदेव सयाने ॥
राग धनाश्री ॥
अब मैं सतगुरु शरणै आयो ।
बिन रसना बिन अक्षर बाणी ऐसोहि जाप सुनायो ॥
काम क्रोध मद पाप जराये त्रिबिधि ताप नशायो ।
नागिनि पांच मुई सँग ममता दृष्टिसूं काल डरायो ॥
किरिया कर्म अचार भुलाना ना तीरथ मग धायो ।
समझौ सहज बचन सुनि गुरु के भर्म को बोझ बगायो ॥
ज्यों ज्यों जपूँ गरकहौं वामें वह मों माहिं समायो ।
जग झूंठो झूंठो तन मेरो यों आपा नहिं पायो ॥
वाकूं जपै जन्म सोइ जीतै सोहम् शुद्ध बतायो ।
चरणदास शुकदेव दया यों सागर लहर समायो ॥
राग सोरठ ॥
गुरुदेव हमारे आवो जी ।
बहुत दिनों से लगी उमाहो आनंद मंगल लावोजी ॥
पलकन पंथ बहारूं तेरो नैनन परि पग धारोजी ।
बाट तिहारी निशिदिन देखूं हमरी ओर निहारोजी ॥
करौं उछाह बहुत मन सेती आंगन चौक पुरावोंजी ।
करूं आरती तन मन वारूं बारबार बलिजावोंजी ॥
दे परिक्रमा शीश नवाऊं सुनि सुनि बचन अघाऊंजी ।
गुरु शुकदेव चरणहूंदासा दर्शन माहिं समाऊंजी ॥

३२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ ॥
हो अँखियाँ गुरु दर्शन की प्यासी ।
इकटक लागी पंथ निहारूं तनसूं भई उदासी ॥
राति दिना मोहिं चैन नहीं है चिन्ता अधिक सतावै ।
तलफतरहूँ कल्पना भारी निश्चल बुधि नहिं आवै ॥
तन गयो सूख हूक अति लागी हिरदय पावक बाढ़ी ।
खिनमें लेटी खिनमें बैठी घर अँगना खिन ठाढ़ी ॥
भीतर बाहर संग सहेली बात नहीं समझावैं ।
चरणदास शुकदेव पियारे नैनन ना दर्शावैं ॥
राग भैरव ॥
गुरु बिन मेरे और न कोय । जग के नाते सब दिये खोय ॥
गुरुही मातु पिता अरु वीर । गुरुही सम्पति जीव शरीर ॥
गुरुही जाति वरण कुल गोत । जहां तहां गुरु संगी होत ॥
गुरुही तीरथ बरत हमार । दीन्हे और धरम सबडार ॥
गुरुही नाम जपौं दिन रैन । गुरुको ध्यान परम सुख दैन ॥
गुरु के चरण कमलकर वास । और न राखूं कोई आस ॥
जो कुछ चाहें गुरुही करें । भावै छाँहँ धूप लै धरैं ॥
आदिपुरुष गुरुही कूं जानूं । गुरुही मुक्तीरूप पिछानूं ॥
चरणदास के गुरु शुकदेव । और न दूजा लागै लेव ॥
अथ भक्तिअंग वर्णन राग करखा ॥
राखिये लाज महाराज गोपालजी दीनजन शरण आयो
तिहारी । लगो मोहि ध्यान दृढ़ चरण ही कमल में कीजिये
किरपा सुनिहो बिहारी ॥ विषय जंजार रस स्वाद घेरो
घनो पांचहूं चोर दुख देहिं भारी । नीच बहु दुष्ट बलवान
ठग तकैं निसि द्यौस हिये घात डारी ॥ पकरि गज-

' शब्दवर्णन । ३२५
राज कूं ग्राह खैंच्यो तबै टेरदे हेर कीन्ही पुकारी । गरुड़ तजि
धाय आये छुटायो तुरत हरि हिये ब्याधि तनु बिपति डारी ॥
ध्रुव अचल कियो प्रहादकूं दर्श दियो दास हनुमानसूं प्रीति
भारी । भीलनी अरु कामी अजामील से अधम अति पतित
गणिका उबारी ॥ पाण्डुसुतहूँ बचाये जरत अग्निसूं द्रौपदी
चीर बाढ़ो अपारी । नामदेव सैन पीपा कबीरा सदन नरसिया
दासिमीरा उधारी ॥ कोटि अनगिन भक्त तारि दिये तनक
मैं कहो मेरी सुरति क्यों बिसारी । तो बिना कहां जाऊँ कहीं
ठौर ना तेरेही द्वार कोहूँ भिखारी ॥ सकल संशय हरण तूही
तारणतरण श्याम शुकदेव गिरिधर मुरारी । दास चरणदास
को आसरो तुही है आपनो जानलीजै सँभारी ॥१॥ साधौ सोई
जनशूर जो खेत में मड़रहै भक्ति मैदान में रहै ठाढ़ो । सकल
लज्जा तजै महा निरभै गजै पैज नीशान जि आय गाड़ा ॥
भये बहुबीर गम्भीर जे धीर मत सबन को यश कहत ग्रन्थ
होई । तिनविषे कछू इकनाम वर्णन करूं सुनौ हो सन्तदै
चित्त सोई ॥ पितासूं रूठि ध्रुव पांचही वर्षकौ टेक गहि भक्ति
के पन्थ धायो । छल भयो ना डिगो टेक पूरी भई जीति
मैदान हरि दर्श पायो ॥ हठो प्रहाद हरिनाम छाँड़ो नहीं
बापने त्रासदै बहु डिगायो । टेक जब ना टरी राम रक्षाकरी
दुष्ट को मारिक जन जितायो ॥ कबीर दादू धने पहिरि
बख्तर बने नामदेव सारिखे बहुत कूदे । सेन सदना बली भक्त
पीपा बड़ो रामकी ओरकूं चले सूधे ॥ मलूक जैदेव गज ग्राह
कलँगी धरे शूर रैदास मुख नाहिं मोड़ा । ध्यान बन्दूक में
प्रेम रञ्जकजमा मीरमाधो चला कुदाय घोड़ा ॥ दासमीरा
पिली प्रेम सम्मुख चली छोड़ि दई लाजकुल नाहिं माना ।

३२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और शबरी मंडी तोड़ि ऊँचीगढी दौर करमाचली प्रेम जाना ॥
श्रीशुकदेव रणजीत सांवत कियो लड़े कलियुग बिषे खम्भ
गाड़े । बहुत सेना लिये ललक हूहू किये चरणहींदास सँग
नाहिं छांड़े ॥
राग काफी ॥
हे जगके करतार तेरी कहा अस्तुति कीजै ।
तूही एक अनेक भयो है अपनी इच्छाधार ॥
तूही सिरजै तूही पालै तूही करै संहार ।
जितदेखूं तित तूही तूहै तेरा रूप अपार ॥
तूही रामनरायण तूही तूही कृष्ण मुरार ।
साधौं की रक्षाके कारण युग युग ले अवतार ॥
तुही आदि अरु मध्य तुही है अन्ततेरा उजियार ।
दानव देव तोहीसूं प्रगटे तीनलोक बिस्तार ॥
जल थल में व्यापक है तूही घटघट बोलनहार ।
तोबिन और कौन है ऐसो जासों करों पुकार ॥
तूही चतुर शिरोमणि है प्रभु तूही पतित उधार ।
चरणदास शुकदेव तुही है जीवन प्राणअधार ॥१॥
तव गुण करूं बखान यह मेरी बुद्धि कहां है ।
चतुर्मुखी ब्रह्मा गुण गावैं तिनहुँ न पायो जान ॥
गण गावत शंकर जब हारे करनेलागे ध्यान ।
गुण अपार कछु पार न पायो सनकादिक कथज्ञान ॥
गण गावत नारदमुनि थाके सहसमुखनसूं शेष ।
लीला को कछु वार न पारा ना परिमाण न भेश ॥
शक्ति घनी अनगिनत तुम्हारी बहुरूप बहुनावँ ।
जबहिं बिचारूं हियेमें हरूं अचरज हेरि हिरावँ ॥

शब्दवर्णन । ३२७
अति अथाह कछु थाह न पाऊं सोच अचक रहिजावँ ।
गुरु शुकदेव थके रणजीता मैं कछु कौन कहावँ ॥
राग पर्ज ॥
रामगुण कोई न जानेहो ।
शेष महेश गणेश अरु ब्रह्मा रहे थकानेहो ॥
सुरति निरति बुधिगम नहीं सबदेव भुलानेहो ।
सनकादिक नारदहू हारे कौन बखानेहो ॥
योगी जंगम ऋषि मुनि तपसी सुर ज्ञानेहो ।
ध्यान लगावें अन्त न पावें गये हिराने हो ॥
पशु मनुष कहा कहिसकै विषय रस लपटानेहो ।
चरणदास शुकदेव दया यह बात पिछाने हो ॥
राग काफी ॥
रामा रामा जी साइ ॥
अलख निरंजन रूपा । तूही एक अनेक स्वरूपा ॥
तेरी ज्योति सकल जगछाई । तू घटघट रहो समाई ॥
तूही आदि अनादि कहावै । ब्रह्मादिक पार न पावै ॥
अबिगत अविनाशी जाना । निरगुण सरगुण पहिंचाना ॥
बहु बिधि के भेष बनावै । सिरजै पालै बिनशावै ॥
अचरज कौतुक बिस्तारा । जनकारण ले अवतारा ॥
तूही है देवनको देवा । सनकादिक लहैं न भेवा ॥
चाहै सो करै पलमाहीं । तूही व्यापक है सब ठाहीं ॥
तूही ज्ञानी गुणी अपारा । पूरण परमातम प्यारा ॥
गुण बहुत कहांलौं गाऊं । बिनती करि शीश नवाऊं ॥
शुकदेव गुरू बतलाया । चरणदास शरण तेरी आया ॥
रामारामाजी टे० सुनिलिजै बिनती मेरी । मैं शरण गही है तेरी ॥
२३

३२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तैं बहुतै पतित उधारे । भवजलसूं पार उतारे ॥
हौं सब को नाम न जानूं । अब कोइ कोइ भक्त बखानूं ॥
अँबरीष सुदामा नामा । सो पहुँचाये निजधामा ॥
ध्रुव पांच बरष को बाला । तेहि दर्शन दियो गोपाला ॥
प्रह्लाद टेक तुम राखी । यों जानत हैं सब साखी ॥
शबरी के फल तुम खाये । त्रयलोचन के घर आये ॥
पांडवन की करी सहाई । द्रौपदी की लाज बचाई ॥
गणिकाहू पार लगाई । करमा की खिचरी खाई ॥
मीरा तुम्हारे रंग भीनी । नरसी की हुंडी लीनी ॥
धन्नाको खेत जमायो । तैं साग विदुर घर पायो ॥
कबिराके बादल लाये । सब काज किये मनभाये ॥
सदना से सेना नाई । तैं बहुत किये मुकताई ॥
ग्राहसुं गज जाय छुटायो । तैं मोकूं क्यों बिसरायो ॥
सनकादिक ब्रह्मा ध्यावैं । तेरा शेश आदि यश गावैं ॥
तेरा वेद पार नहीं पाया । जिन नेति नेति बतलाया ॥
मैं काम क्रोध ने घेरा । ममता की उर उरझेरा ॥
मोह लोभ के फन्दे फरिया । तेरा नाम बिसरि दुखभरिया॥
अब तुम्हीं करो निबेरा । मोहिं जानि चरणकों चेरा ॥
मैं पापी महा सन्तापी । अपराधी बहुत कलापी ॥
तुमै छाँड़ि कासुपै जाऊं । यह दुख कौने समझाऊं ॥
शुकदेव गुरू मैं पाया । जिन तेराही नाम बताया ॥
चरणदास आपनो कीजै । मोहिं भक्तिदान बर दीजै ॥
राग रामकली ॥
पतित उधारण बिरद तुम्हारो ।
जो यह बात सांच है हरिजी तौ तुम हमको पार उतारो ॥

शब्दवर्णन । ३२६
बालपने अरु तरुण अवस्था और बुढ़ापे माहीं ।
हम से भई सभी तुम जानौ तुम से नेकहु छानी नाहीं ॥
अनगिन पाप किये मनमाने नखशिख अवगुण धारी ।
फिरि फिरिकै सुनिशरणै आयो अब तुमको है लाज हमारी ॥
शुभकरमन को मारग छूटो आलस निद्रा घेरो ।
एकहि बात भली बनिआई जग में कहायौं तेरो चेरो ॥
दीनदयालु गुपाल बिश्वंभर श्रीशुकदेव गुसाईं ।
जैसे और पतित घनतारे चरणदास की गहिये बाहीं ॥
अर्ज सुनौ जगदीश गुसाईं ।
ग्रह नक्षत्र देव बिसारे चरण कमल की आयो छाई ॥
सत बिश्वास यही हिय धारो तोहि न भूलों एक घरी ।
इतउत से मन खैंचि लियो है काहू से कछु नाहिं सरी ॥
अब चाहो सो करो प्रभु तुम्हीं द्वार तुम्हारे सुरति अरी ।
भावै नरक, स्वर्ग पहुँचावो भावै राखौ निकट हरी ॥
अपनी चाहरही नहिं कोई जबसूं तुम्हरी आश धरी ।
आन भरोसो छोड़ि दियो है सकल बिकल सब प्यारकरी ॥
यह आपा तुम्हीं को दीनो मेरी मो मैं कुछ न रही ।
आदि पुरुष शुकदेव सुनोजी चरणदास यह टेरि कही ॥
राग बिभास ॥
अबकी करो सहाय हमारी ।
दुष्टदलन अरु भक्तबचावन ऐसी साखि तुम्हारी ॥
जन प्रह्लाद असुर गहि बांध्यों लीन्हो खङ्ग निकारी ।
हिरणाकुश हनि दास उबारो नरसिंह को तनु धारी ॥
खैंचि ग्राह गज बोरन लागो राम कह्यो इकबारी ।

३३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सुनत पुकार पयादेहि धाये तजिकै गरुड़ सवारी ॥
द्रौपदि लाज उतारण कारण लाये सभा मँझारी ।
दीनानाथ लई सुधि वेगहि बाढो चीर अपारी ॥
जिन जिन शरण गही संकट में कहा पुरुप कहा नारी ।
चारो युग हरि करी सहाई रक्षक भये मुरारी ॥
गुरु शुकदेव बतायो तोंकों सन्तन कौ रखवारी ।
चरणदास थकि द्वारे तेरे गुण पौरुष दिये डारी ॥
राग धनाश्री ॥
अब तुम करो सहाय हमारी ।
मन के रोग होय गये दीरघ तन के बड़े विकारी ॥
तुम सो बैद और को दूसर जाहि दिखाउं नारी ।
सजीवनमूल अमर हो जासों सोहै दया तुम्हारी ॥
क्रिया कर्म की औषधि जेती रोग बढ़ावनहारी ।
दीजै चूर्ण ज्ञान भक्ति को मेटो सकल व्यथारी ॥
जन के काज पयादे धावत चरणकमल पर वारी ।
मैं भयो दास अधीन तुम्हारो मेरी करो सँभारी ॥
जो मोहिं कुटिल कुचील जानिकै मेरी सुरति विसारी ।
चरणदास शुकदेव तुम्हारो दुष्ट हँसेंगे भारी ॥
हरिजी संकट वेगि निवारो ।
जनकूं भीर परी है भारी चक्र सुदर्शन धारो ॥
कंसनिकंदन रावणगंजन हिरणाकुश गहि मारो ।
दुष्टदलन अरु भक्तउबारन जन प्रह्लाद उबारो ॥
पांचो पाण्डव राख लिये हैं कौरव दल संहारो ।
जिन जिन द्वेष कियो सन्तन सों सो सोई हनि डारो ॥
निरभय भक्ति करें जन तेरे ऐसो समय बिचारो ।

शब्दवर्णन ३३१
चरणदास के घट में बैरी तिनको क्यों न बिदारों ॥
राग बिभास ॥
राखो जी लाज गरीबनवाज ।
तुम बिन हमरे कौन सँवारे सबही बिगरैं काज ॥
भक्तबछल हरिनाम कहावो पतिउधारणहार ।
करो मनोरथ पूरण जन के शीतल दृष्टि निहार ॥
तुम जहाज मैं काग तिहारो तुम तजि अन्त न जाऊँ ।
जो तुम हरिजी मारि निकासो और ठौर नहिं पाऊं ॥
चरणदास प्रभु शरण तिहारी जानत सब संसार ।
मेरी हँसी सो हँसी तिहारी तुम्हूँ देखि बिचार ॥
राग बिलावल ॥
प्रभुजी शरण तिहारी मैं आयो ।
जो कोइ शरण तिहारी नाहीं भर्मि-भर्मि दुख पायो ॥
औरन के मन देवी देवा मेरे मन तुहि भायो ।
जबसों सुरति सँभारी जग में और न शीश नवायो ॥
नरपति¹ सुरपति² आश तिहारी यह सुनकरि मैं धायो ।
तीरथ बरत सकल फल त्यागे चरणकमल चितलायो ॥
नारदमुनि अरु शिव ब्रह्मादिक तेरोही ध्यान लगायो ।
आदि अनादि जुगादि तेरो यश वेद पुराणन गायो ॥
अब क्यों न बांह गहो हरि मेरी तुम काहे बिसरायो ।
चरणदास कहैं करता तूंहीं गुरु शुकदेव बतायो ॥
राग केदारा ॥
अबकी तारिहौ बलबीर ।
चूक मोसों परी भारी कुबुधि के संगसीर ॥
१ मनुष्य का राजा २ इन्द्र ॥

३३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भवसागर की धार तीक्ष्ण महागँधीलो नीर ।
काम क्रोध मदलोभ भँवर में चित न धरत तहां धीर ॥
मच्छ जहां बलवन्त पांचौ थाह गहर गँभीर ।
मोह पवन झकोर दारुण दूर पैलौतीर ॥
नाव तौ मँझधार भरमी हिये बाढ़ी पीर ।
चरणदास कहै कोई नाहिं संगी तुम बिना हरिहीर ॥
राग सोरठ ॥
अब जगफंद छुटावोजी हूँ तौ चरणकमल को चेरो ।
परो रहूं दरबार तिहारे संतन माहिं बसेरो ॥
बिना कामना करूं चाकरी आठौं पहरेनेरो ।
मनसब भक्ति क्रिपा करि दीजै मोहिं यही बहुतेरो ॥
खानेजाद कदीमी कहियो तुही आसरो मेरो ।
झिड़क बिड़ारौ तऊ न छांडौ सेवा सुमिरण तेरो ॥
काहू और आन देवन सों रहो नहीं उरझेरो ।
जैसे राखो त्योंही रहहूं कर लीजौ सुरझेरो ॥
तेरे घर बिन कहूं न मेरो ठौर ठिकानो डेरो ।
मोसे पतित दीन को हरिजी तुम्हीं करो निबेरो ॥
गुरु शुकदेव दयाकरि मोकूं ओर तिहारी फेरो ।
चरणदास को शरणै राखो यही इनाम घनेरो ॥
राग बिलावल ॥
तुम साहब करतार हो हम बन्दे तेरे ।
रोम रोम गुनहगार हैं बकसो हरि मेरे ॥
दशों दुवारे मैल है सब गन्दम गन्धा ।
उत्तम तेरो नाम है बिसरे सो अन्धा ॥
गुणतजिकै अवगुणकिये तुमसबपहिंचानौ ।

शब्दवर्णन ३३३
तुम सों कहा छिपाइये हरि घट घट की जानौ ॥
रहमकरो रहमान तू यह दास तिहारो ।
भक्तिपदारथ दीजिये आवागवन निवारो ॥
गुरुशुकदेव उबारलौ अब मेहर करीजै ।
चरणहिंदास गरीब को अपना करलीजै ॥
राग रामकली ॥
चारिबरण सों हरिजन ऊंचे ।
भये पवित्र हरि के सुमिरे तनके उज्ज्वल मनके सूचे ॥
जोन पतीजै साखि बताऊं शबरी के झूठे फल खाये ।
बहुत ऋषीश्वर ह्वांइरहते तिनके घर रघुपति नहिआये ॥
भीलनी पाँव दियो सरिता में शुद्धभयो जल सब कोई जाने ।
मन्दहतो सो निर्मल हूवो अभिमानी नरभये खिसाने ॥
ब्राह्मण क्षत्री भूपहुते बहु बाजो शङ्ख श्वपच जब आयो ।
बालमीकि यज्ञ पूरण कीन्हो जयजयकार भयो यश गायो ॥
जाति बरण कुल सोई नीकौ जाके होय भक्ति परकास ।
गुरु शुकदेव कहत हैं तोको हरिजन सेव चरणहीदास ॥
सब जातिनमें हरिजन प्यारे ।
रहनी तिनकी कोई न पावै तनसों जग में मनसों न्यारे ॥
साखि सुनौ अँबरीष भूप की दुर्बासा जहँ आयो ।
लगो शराप देन राजाको चक्रसुदर्शन जारन धायो ॥
प्रभुजी आये दुर्योधन के वह मनमें गरबायो ।
नाना बधिके ब्यंजन त्यागे साग बिदुर घर रुचिसों पायो ॥
सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग मान सन्त को राखो ।
भक्तों वश भगवान सदाहीं वेद, पुराणन में यों भाखो ॥

३३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र घर कहीं होय क्यों न बासा ।
धनिकुल वह शुकदेव बखाने यह तुम सुनौ चरणहीदासा ॥
राग कान्हरा ॥
धनि वे नर हरिदास कहाये ।
रामभक्ति दृढ़हीकरि पकरी आन धर्म सबही बिसराये ॥
आठपहर गलतान भजन में प्रेममगन हिय में हुलसाये ।
आप तरै तारै औरनको बहुतक पापी पार लगाये ॥
प्रभु दर्शन बिन और न आशा धर्म्मकाम अरु मोक्ष न चाहै ।
आठो सिद्धि फिरें सँग लागी नेक न देखें नैन उठाये ॥
तिनको ऋषिमुनि जापकरत हैं हरिजन हरिदोउ सँगहीगाये ।
ऊंची पदवी इन्द्रहुते देवन देखि अधिक ललचाये ॥
कहैं शुकदेव चरणहीदासा धनि माता ऐसे जन जाये ।
जीवत शोभाजग में पाई तन छूटे हरि माहिं समाये ॥
राग सोरठा ॥
मोको कछु न चहिये राम ।
तुम बिन सबही फीके लागैं नाना सुख धन धाम
आठ सिद्धि नौनिद्धि आपनी और जननको दीजै ।
मैं तौ चेरो जन्म जन्मको निजकरि अपनो कीजै ॥
स्वर्ग फलनकी मोह न आशा ना वैकुंठ न मोक्षहि चाहूँ ।
चरणकमल के राखौ पासा
यहउरमाहिंउमाहूँभक्तिनछांडौंमुक्तिन मांगौंसुनुशुकदेवमुरारी
चरणदास की यही टेक है तजौं न गैल तुम्हारी ॥
राग भैरव ॥
वह पुरुषोत्तम मेरा यार । नेह लगा टूटै नहिं तार ॥
तीरथ जाऊं न बर्त्त करूं । चरणकमल को ध्यान धरूं ॥

शब्दवर्णन । ३३५
प्राण पियारे मेरेहि पासा । बन बन माहिं न फिरूं उदासा ॥
पढूं न गीता वेद पुरान । एकहि सुमिरौं श्रीभगवान ॥
औरनको नहिं नाऊं शीश । हरिही हरि हैं बिस्वेबीश ॥
काहूकी नहिं राखूं आस । तृष्णा काटि दही है फाँस ॥
उद्यम करूं न राखूं दाम । सहजहि ह्वै रहै पूरणकाम ॥
सिद्धि मुक्तिफल चाहौं नाहिं । नितहि रहूँ हरि संतन माहिं ॥
गुरु शुकदेव यही मोहिं दीन । चरणदास आनँद लवलीन ॥
यों कहैं हरिजी दयानिधान । सन्त हमारे जीवनप्रान ॥
सन्त चलैं जहाँ सँगही जावँ । सन्त दियो सो भोजन खावँ ॥
सन्त सुलावैं जितरहूँ सोय । सन्त बिना मेरे और न कोय ॥
सन्त हमारे माई बाप । सन्तहि को मनराखूं जाप ॥
सन्तको ध्यान धरौं दिनरैन । सन्त बिना मोहिं परै न चैन ॥
सन्त हमारी देही जान । सन्तहिं की राखूं पहिंचान ॥
सन्तकी सकल बलइया लेवँ । सन्त कूं अपनो सर्वस देवँ ॥
संतहिहेत धरूं अवतार । रक्षाकारण करूं न बार ॥
[

३३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परमेश्वर मिलनेकी लहरैं इक आवै इक जावै ।
कहैं शुकदेव चरणहीं दासा हरिहू कंठ लगावै ॥
राग विलावल ॥
हमारे चरणकमल को ध्यान ।
मूरख जगत भर्मता डोले चाहत जल अस्नान ॥
सब तीरथ वाही सों प्रकटे गंगा आदिक जान ।
जिन सेवन सब पातक नाश नितहोवै कल्यान ॥
साकत गिरही बानेधारी हैं सब ही अज्ञान ।
हरिसो हीरा छांड़िदियो है पूजे कांच पखान ॥
हरि चरण की महिमा जानैं हैं वे सन्त सुजान ।
भौंदू नर मायाके चेरे इनको कहा पहिंचान ॥
चरणदास शुकदेव गुरूने दीन्हों अंजन ज्ञान ।
साँचो प्रीतम सूझ परो है बिसरिगयो सब आन ॥
राग नट व विलावल सारंग ॥
हमारे रामभक्ति धनभारी ।
राज न डांडै चोर न चोरै लूटि सकै नहिं धारी ॥
प्रभु पैसे अरु रामरुपइये मुहर मुहब्बत हरिकी ।
हीराज्ञान युक्तके मोती कहा कमी हां ज़रकी ॥
सोना शील भँडार भरे हैं रूपा रूप अपारा ।
ऐसी दौलत सतगुरु दीन्हीं जाका सकल पसारा ॥
बाँटों बहुत घटै नहिं कबहूं दिन दिन ज्यौढ़ी ज्यौढ़ी ।
चोखा माल द्रव्य अति नीका बट्टा लगै न कौड़ी ॥
साह गुरू शुकदेव विराजैं चरणदास बन जोटा ।
मिलि मिलि रंक भूप हो बैठै कबहूँ न आवै टोटा ॥