भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 360, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३२१
अमर अडोल निरीच्छन भेखा । त्रिगुण रहत रूप नहिं रेखा ॥
चेतन आनँद नित निराधारा । निराकार निर्लिप्त निरारा ॥
निराकार आकार बिवरजाति । निरगुण अरुसरगुणतेरीगति ॥
हाथ पाँव अरु शीश घनेरे । कैसे आरती करूं प्रभु मेरे ॥
सोहं बाती घीव अखण्डा । एकहि ज्योति बलै ब्रह्माण्डा ॥
तुही थाल तुहि आरति साजै । तुहि घंटा तुहि झांझरिबाजै ॥
चरणदास शुकदेव लखायो । सुरति थकी पै पार न पायो ॥
गगन मँडल में आरति कीजै । उत्तम सोंज सकल सजिलीजै ॥
सुखमन अमृत कुम्भ धरावै । मनसा मालिनि फूल चढ़ावै ॥
घीव अखण्डा सोहं बाती । त्रिकुटी ज्योति बलै दिनराती ॥
पवन साधना थाल करीजै । तामें चौमुख मन धारदीजै ॥
रबिशशि हाथगहौ तिहिमाहीं । खिन दहिनो खिन बायें लाई ॥
सहसकमल सिंहासन राजैं । अनहदझालरि नितही बाजैं ॥
इहिबिधि आरति सांचीसेवा । परम पुरुष देवन को देवा ॥
चरणदास शुकदेव बतावैं । ऐसी आरति पार लगावैं ॥
ऐसें आरति करि हुलसावै । दै परिक्रमा शीश नवावै ॥
तनकोथालअरुमनको चौमुख । ज्ञान ध्यान की बाती लावै ॥
भक्तिभावको घी भरि तामें जगमग जगमग ज्योति जगावै ॥
अर्ध ऊर्ध हितसूं करि फेरै रचना रचै ल बर्षावै ॥
सुरति मृदंग अरु निरति तँबूरा झैंगड़ झैंगड़ झांझ बजावै ॥
ताल बीण मुरचंग शंखध्वनि प्रेम मगन ह्वै हरिगुण गावै ॥
सोरन कलशा जलको राखै धूपरु अगर सुगन्धि धरावै ॥
या बिधि सों शुकदेव श्यामकी गाय आरतीको फलपावै ॥
युगलकिशोर निरखि नैननसों चरणदासि सखिबलि बलिजावै ॥