सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 356

शब्दवर्णन । ३१७
अथ श्रीचरणदासकृत शब्द प्रारम्भः ॥
मंगलाचरण गुरुस्तुति ॥
दो० ब्रह्मरूप आनन्द घन, निर्विकार निर्लेव ।
मंगल करण दयाल जी, तारण गुरु शुकदेव ॥
सतियन१ में तुम सत्त हौ, शूरन में हौ बीर ।
यतियन में तुम यत्त हौ, श्रीशुकदेव गँभीर ॥
पतित उधारण तुम लखे, धम्मे चलावन भेव ।
संकट सकल निवारियै, जै जै श्री शुकदेव ॥
चिन्ता मेटन भोहरण, दूरिकरण जगव्याध ।
गुरु शुकदेव कृपा करौ, चरण लगे सब साध ॥
दाता चारों भेदके, श्रीशुकदेव दयाल ।
चरणदास पर हूजिये, बारंबार कृपाल ॥
राग कल्याण ॥
नमो शुकदेव हों चरण पखारणं ॥ द्वंद संकटहरणं ।
करणसुखमंगलं । परम आनंद घन पतित के तारणं ॥
नामतक त्याग बैराग है मुक्तिलों तीनिहूँ गुणनते निर्विकारं ।
महानिहकाम और ध(मचौथे रहौ सिद्धि चेरी भई फिरैं लारं ॥
ज्ञानके रूप अरु भूप सब मुनिन में दयाकी नाव किये जीवपारं ।
उदैभागवतमतभानु२परगटकियो तिमिर३कियोदूरअरुधर्मधारं ॥
मोहदलजीतिअनरीतिका खण्डनं भक्तिके दृढ़करनभवबिडारं ।
चरणदासके शीशपरहाथनितहीरहै यहीमाँगौंगुरू बारबारं ॥
मंगलाचरण ॥
दो० दश चिह्न दहिने चरण, बायें हैं दश एक ।
१ संन्यासी २ सूर्य ३ अंधेरा ॥