भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३१७
अथ श्रीचरणदासकृत शब्द प्रारम्भः ॥
मंगलाचरण गुरुस्तुति ॥
दो० ब्रह्मरूप आनन्द घन, निर्विकार निर्लेव ।
मंगल करण दयाल जी, तारण गुरु शुकदेव ॥
सतियन१ में तुम सत्त हौ, शूरन में हौ बीर ।
यतियन में तुम यत्त हौ, श्रीशुकदेव गँभीर ॥
पतित उधारण तुम लखे, धम्मे चलावन भेव ।
संकट सकल निवारियै, जै जै श्री शुकदेव ॥
चिन्ता मेटन भोहरण, दूरिकरण जगव्याध ।
गुरु शुकदेव कृपा करौ, चरण लगे सब साध ॥
दाता चारों भेदके, श्रीशुकदेव दयाल ।
चरणदास पर हूजिये, बारंबार कृपाल ॥
राग कल्याण ॥
नमो शुकदेव हों चरण पखारणं ॥ द्वंद संकटहरणं ।
करणसुखमंगलं । परम आनंद घन पतित के तारणं ॥
नामतक त्याग बैराग है मुक्तिलों तीनिहूँ गुणनते निर्विकारं ।
महानिहकाम और ध(मचौथे रहौ सिद्धि चेरी भई फिरैं लारं ॥
ज्ञानके रूप अरु भूप सब मुनिन में दयाकी नाव किये जीवपारं ।
उदैभागवतमतभानु२परगटकियो तिमिर३कियोदूरअरुधर्मधारं ॥
मोहदलजीतिअनरीतिका खण्डनं भक्तिके दृढ़करनभवबिडारं ।
चरणदासके शीशपरहाथनितहीरहै यहीमाँगौंगुरू बारबारं ॥
मंगलाचरण ॥
दो० दश चिह्न दहिने चरण, बायें हैं दश एक ।
१ संन्यासी २ सूर्य ३ अंधेरा ॥