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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 690 में से

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पृष्ठ 361

३२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सच में ॥
या बिधि गोबिन्द भोगलगावो । भक्त बछल हरिनाम कहावो ॥
बेर भीलनी के तुम पाये । देखि ऋषीश्वर सकल लजाये ॥
जैसे साग विदुर घर पायो । दुर्योधन को मान घटायो ॥
भक्त सुदामा के तंदुल लीन्हे । कंचनमहल अधिक सुख दीन्हे ॥
ज्यों करमा की खिचरी खाई । नेहलियो सब शुचि बिसराई ॥
तुम्हरी बिभौ प्रभु तुम्हरेहि आगे । हमसें दीनन को कहा लागे ॥
प्रेम प्रीतिसूं भोजन कीजै । बचै सीथ सन्तनकूं दीजै ॥
चरणदास भरि राखी झारी । अँचवो हरि शुकदेव मुरारी ॥
भोगके आगेकी ध्वनि काफी ॥
जै जै पारब्रह्म परधान । जाकूं पावै गुरु के ज्ञान ॥
ब्रह्म पुरुष को धरो स्वरूप । सो तौ कहिये अधिक अनूप ॥
जै जै ॐ और त्रै देव । जै जै दश औतार अभेव ॥
जै जै वृन्दाबन निज धाम । जै जै गोकुल अरु नँदग्राम ॥
जै जै गोपी जै जै ग्वाल । जै जै सदा बिहारीलाल ॥
जै जै कुंजगली नँदलाल । मोर मुकुट मुरली बनमाल ॥
जै जै राधे कृष्ण मुरार । जै जै व्यास वेद उच्चार ॥
जै जै महा विदेह जनकजी । जै जै श्री शुकदेव दयाल ॥
इन को नाम जपै जो कोय । प्रेम भक्ति पावत है सोय ॥
चरणदास सुख बास लहैं । हरि चरणन के पास रहैं ॥
अथ गुरुदेव का अंग राग कल्याण ॥
सतगुरु पांचौ भूत उतारो ।
जन्म जन्म के लागेहि आये दै मन्तर अब तिन्हें बिडारो ॥
काम क्रोध मोह लोभ गर्भने मन बौराय कियो अपभायो ।