सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 358

शब्दवर्णन । ३१६
पाँचवें मंगल श्रीशुकदेव । तनमन सूं करि उनकी सेव ॥
चरणहिं दास चरण चितलायो । मंगल चार भये जस गायो ॥
मंगल आरति कीजै प्रात । सकल अविद्या¹ घटगइ रात ॥
सूरज ज्ञान भयो उजियारा । मिटिगये ओगुण कुबुधि बिकारा ॥
मनके रोग शोग सब नाशे । सुमति नीर शुभजलज² प्रकाशे ॥
भय अरु भर्म नहीं ठहराई । दुविधागई एकता आई ॥
जाति बरण कुलसूझे नीके । सब सन्देह गये अब जीके ॥
घटघट दरशै दीनदयाला । रोम रोम सब होगइ माला ॥
दृष्टि न आवै दुख जग जाला । कागपलटि गति भये मराला³ ॥
अनहद बाजे बाजन लागे । चोर नगरिया तजि तजि भागे ॥
गुरुशुकदेव कि फिरी दोहाई । चरणदास अन्तरलौ लाई ॥
भोरकी ध्वनि रागभैरव ॥
जैजै ब्रह्म अचल अविनाशी । आपनिहीं सब ज्योति प्रकाशी ॥
जैजै अखिल निरंजन देवा । ऋषिमुनि शारदलहैं न भेवा ॥
जैजै आदि पुरुष जगदीश । हर्षित तोहि नवाऊं शीश ॥
जैजै जगपति सिरजनहारा । व्यापिरह्यो जीव जन्तु मँझारा ॥
जैजै भूमिभार परहारी । प्रकट होत संतन हितकारी ॥
जैजै बपुधारी चौबीश । लीला कारण त्रिभुवन ईश ॥
जैजै कृष्ण मनोहर गाता । नैन बिशाल प्रेमके दाता ॥
जैजै भक्तवछल भगवान । व्याधि कटतहैं जिनके ध्यान ॥
जैजै निरगुण सरगुण रूप । नाना भांती अधिक अनूप ॥
जहां तहां छबिधारे रहें । जाकी महिमा को कबिकहैं ॥
जैजै हो शुकदेव विराजैं । मम मस्तकपर निशिदिनराजैं ॥
जैजै प्रेम सुधारस पिये । जैजै तिलक शिर मिली किये ॥
१ माया २ कमल ३ हंस ॥