भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३१६
पाँचवें मंगल श्रीशुकदेव । तनमन सूं करि उनकी सेव ॥
चरणहिं दास चरण चितलायो । मंगल चार भये जस गायो ॥
मंगल आरति कीजै प्रात । सकल अविद्या¹ घटगइ रात ॥
सूरज ज्ञान भयो उजियारा । मिटिगये ओगुण कुबुधि बिकारा ॥
मनके रोग शोग सब नाशे । सुमति नीर शुभजलज² प्रकाशे ॥
भय अरु भर्म नहीं ठहराई । दुविधागई एकता आई ॥
जाति बरण कुलसूझे नीके । सब सन्देह गये अब जीके ॥
घटघट दरशै दीनदयाला । रोम रोम सब होगइ माला ॥
दृष्टि न आवै दुख जग जाला । कागपलटि गति भये मराला³ ॥
अनहद बाजे बाजन लागे । चोर नगरिया तजि तजि भागे ॥
गुरुशुकदेव कि फिरी दोहाई । चरणदास अन्तरलौ लाई ॥
भोरकी ध्वनि रागभैरव ॥
जैजै ब्रह्म अचल अविनाशी । आपनिहीं सब ज्योति प्रकाशी ॥
जैजै अखिल निरंजन देवा । ऋषिमुनि शारदलहैं न भेवा ॥
जैजै आदि पुरुष जगदीश । हर्षित तोहि नवाऊं शीश ॥
जैजै जगपति सिरजनहारा । व्यापिरह्यो जीव जन्तु मँझारा ॥
जैजै भूमिभार परहारी । प्रकट होत संतन हितकारी ॥
जैजै बपुधारी चौबीश । लीला कारण त्रिभुवन ईश ॥
जैजै कृष्ण मनोहर गाता । नैन बिशाल प्रेमके दाता ॥
जैजै भक्तवछल भगवान । व्याधि कटतहैं जिनके ध्यान ॥
जैजै निरगुण सरगुण रूप । नाना भांती अधिक अनूप ॥
जहां तहां छबिधारे रहें । जाकी महिमा को कबिकहैं ॥
जैजै हो शुकदेव विराजैं । मम मस्तकपर निशिदिनराजैं ॥
जैजै प्रेम सुधारस पिये । जैजै तिलक शिर मिली किये ॥
१ माया २ कमल ३ हंस ॥