भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें.३१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिनके निहचल ध्यानतें, कटैं जु बिघ्न अनेक ॥
श्रीशुकदेव अज्ञा दई, चरणदास उच्चार ।
सों अब वरणन करतहूँ, शब्दमाहिं विस्तार ॥
राग कल्याण ॥
चरण चिह्न चितलाव फेरि तेरा जन्म न होगा ।
पदम¹ झलकक्षवि निरखिनैनभरि अंकुश मनअटकाव ॥
अम्बर² छत्र कुलिश यव राजत ध्वजा धेनु³ पदभाव ।
शंखचक्र अरु कलश सुधाह्रद४ तासूं चित उरझाव ॥
स्वस्तिक जम्बू फलकी शोभा जासों सुरति लगाव ।
अर्द्धचन्द षटकोन मीन बिंदु ऊर्ध्व रेख लखिचाव ॥
अष्टकोण तिरकोण बिराजै धनुष बरण उरधाव ।
कोटिकाम नख ऊपर वारूं नूपुर सुन्दर पाव ॥
श्री शुकदेव चिह्नपद बरणे सो तू हिये में लाव ।
चरणदास हित राखि भोर निशि बार बार बलिजाव ॥
मंगल आरती रागभैरव ॥
मंगल आरति या बिधि कीजै । हर्षपाय आनँदरस पीजै ॥
प्रथमँ मंगल गुरुही जान । जिनसूं पायो पद निर्वान ॥
ज्ञान भानु परगट कियो भोर । मिटगइ रैन तिमिर घनघोर ॥
द्वितिये मंगर श्री गोपार । भक्ति बछल बहुपतित उधार ॥
राम कृष्ण पूरण औतार । दुष्टदलन सन्तन रखवार ॥
तृतिये मंगल प्रभुजी के साध । मानसरोवर मता अगाध ॥
तिनकी संगति उठि गयो संसा । कागपलट गति है गयो हंसा ॥
चौथे मंगल श्रीभागौत । घट उजियार करन कूं ज्योत ॥
पाप ताप दुख मेटन हारी । जिहिनौका चढ़ि उतरौ पारी ॥
१ कमल २ अम्बारी ३ गौ ४ चन्द्रमा ॥