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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 690 में से

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पृष्ठ 359

३२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
जैजै साधुन के सुखदाई। चरणदास तुम्हरी शरणाई ॥
आरति आदि पुरुषकी कीजै। साधौ अगमअपारअचलमनदीजै ॥
अद्भुत आरती ॐ कारा। त्रिदेवा होय जगत पसारा ॥
पहिले मच्छरूप हरि धारो। वेदलाय शंखासुर मारो ॥
रई मन्द्राचल बासुकि नेती। चौदहरतन मथन दधि सेती ॥
रूप बराह धारि हरि धाये। हिरण्याक्षहि हनि धरतीलाये ॥
खम्भ फारि हिरणाकुश मारो। नरसिंहह्वै प्रहलाद उबारो ॥
बामनह्वै करि बलि छलि लीन्हे। तीनि लोक तीनों डगकीन्हे ॥
परशुराम ह्वै शरतर धारे। क्षत्री सबै निकछ करि डारे ॥
रामरूप रावण दलमलिया। लंकाराज बिभीषण मिलिया ॥
कृष्णरूप ह्वै कंस पछारो। दर्शनदे ब्रज सकल उधारो ॥
बोधरूप अचरज गति तेरी। कौतुक देखि थकी बुधि मेरी ॥
निष्कलंक निर्लिंस निरासा। संभल सुरतलियो जहाँबासा ॥
हरि हैं एकरूप बहुधारे। निराकार आकार नियारे ॥
दश अवतार आरती गाऊँ। निरभै होय अभैपद पाऊँ ॥
चरणदास शुकदेव बतायो। निरगुणहरिसरगुणह्वै आयो ॥
आरति रमता राम कि कीजै। अन्तर्द्धान निरखि सुखलीजै ॥
चेतन चौकी सतको आसन। मगनरूप तकिया धरि दीजै ॥
सोहंथाल खैंचि मन धरिया। सुरतिनिरतदोउबाती वरिया ॥
योगयुगति सूं आरतिसाजी। अनहद घंट आपसूं बाजी ॥
सुमति सांझकी बिरियाआई। पांचपचीसमिलि आरतिगाई ॥
चरणदास शुकदेव को चेरो। घटघट दर्शै साहब मेरो ॥
आरति करत हँसै मनमेरो। वार पार कछु दिखै न तेरो ॥