भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६६
चारमास वह आप फेरि बरषा करै ।
वा जलको कछु लोभ नहीं मनमें धरै ॥
ऐसे साधू होय जु कछु कोइ देतहै ।
वाको आछी भांति सोई वह लेत है ॥
मोह न कवहूँ करै जु कोई कछु चहै ।
चरणहिंदासा जानि सोई यह गति लहै ॥
दो० लेते कछु हरषै नहीं, देते दुख नहिं होय ।
ऐसे निलोभी रहै, चरणदास है सोय ॥
अष्टपदी ॥
दूजे जो प्रतिबिम्ब सूर को देखिये ।
जल भांडौं के माहिं सबन अवरेखिये ॥
खोजिकै देखौ वाहि सूर तौ एकहै ।
घट घटमें प्रतिबिम्ब विचारि अनेकहै ॥
ना काहूसे वैर प्रीतिहू ना करै ।
सूरज एक निहारि सकल घट छवि धरै ॥
ऐसेही निर्मोह सदा निर्लेप है ।
वाको साधूजान सो ऐसी विधिरहै ॥
अठवैंकियो कपोत गुरू मैं विचारिकै ।
निर्मोहित मन भयो तभी जु निहारिकै ॥
उठी एक मनमाहिं नारि सुत कीजिये ।
जगमें ह्वै निश्चिन्त बहुत सुख लीजिये ॥
सहज बागके माहिं जाय ठाढ़ो भयो ।
वृक्षपै एक कपोत कपोतिनि को लह्यो ॥
ता ऊपर उन गेह आपनो साजिया ।
बहुत प्रीति सुखमानि सकल दुख भाजिया ॥
२७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० करि विचार मनमें धरी, धन्यभाग सुख होय ।
हम समान या जगतमें, और न दीखै कोय ॥
अष्टपदी ॥
भयो कपोतिनि गर्भ अण्ड द्वै वा दिये ।
प्रीतिसों सेवन किये फूटि द्वै सुत भये ॥
केतक दिवसन माहिं पंख निकसे सभी ।
उड़िकै बैठन लगे डार ऊपर तभी ॥
निरखत बहुसुख मानि कपोत कपोतिनी ।
हमरे अति बड़भाग दियो यह सुख धनी ॥
एक रहे घर माहिं जु रक्षा धारने ।
दूजे वन में जाय जीविका कारने ॥
बनसे चूगालाय बचन मुखं डारई ।
बाते उनकी क्षुधा सकल निरवारई ॥
जन्म सुफल मन जानि रैनदिन यों रहै ।
वसुधामें कछु शोच न हियमाहीं लहै ।
इकदिन कह्योकपोत कपोतिनि साथही ।
ये बच्चा अब बड़े भये सब गातही ॥
एतौ रहैं गृहमाहिं दोऊ हम वन चलें ।
चूगा लावैं बहुत करैं भोजन भलैं ॥
है करि निस्संदेह दोऊ वन को चले ।
कहैं चरणहींदास चुगन लागे भले ॥
दो० पाछे बधिक जु आइया, दीनो जाल बिछाय ।
पकरन की मनमें करी, बैठ्यो घात लगाय ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७१
अष्टपदी ॥
दोऊ गये वनमाहिं वधिक इक आइया ।
उन बचनको देखिकै जाल बिछाइया ॥
तापर किणका डारि आपतौ छिपिरह्यो ।
बचन चूगा देखि भेद कछु ना लह्यो ॥
यह कण कारण मात पिता वनको रमै ।
सो पायो यहि ठौर चुगैं क्यों ना हमै ॥
दोऊ उतरे तहां जबै मुख डारिया ।
तब वहि वधिकने जाल फंदकों मारिया ॥
आय कपोतिनि जबै शब्द नाहीं सुनो ।
घरमें पाये नाहि शीश तबहीं धुनो ॥
बचन कारण शब्द कियो हंकारिकै ।
बोले पिंजर माहिं जु वचन निहारिकै ॥
देखि कपोतिनि जालमें यह मन आनिया ।
अपना जीवन अफल जगतमें जानिया ॥
तनमें अतिदुख पाय कल्पना बहु करी ।
कहैं चरणहींदास बुरी आशा धरी ॥
दो० जाल माहिं मोसुत फँसे, जाय परौं वा ठौर ।
विकल होय चाली तबै, कियो विचार न और ॥
अष्टपदी ॥
मोह फंद वश होय जाल माहीं परी ।
वाहू को गहि वधिक पिंजर माहीं धरी ॥
आयो बहुरि कपोत लख्यो सुत बालहूँ ।
इन बिन कैसे जिऊं मरौं बेहालहूँ ॥
३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परो जाल के माहिं बहुत दुख मानिकै ।
चारौ गहिलै चलो वधिक सुख जानिकै ॥
राजा मो मनहुतीं जु सुत दाराकरूं ।
निरखिलई यह सीख बहुरि नहिं चितधरूं ॥
वाकौ कीन्ह्यो गुरू चरित यह देखिकै ।
हरि सुमिरण से पगोरहूं जु विशेषिकै ॥
मोह महादुखरूप सकल बिसराइया ।
लिये रहूं वैराग परमसुख पाइया ॥
सदा रहूं निर्बंध दुःख सब भाजिया ।
चरण कमलको ध्यान हियेमें साजिया ॥
तहां बसौं निशिभोर अंत नहीं बहूं ।
चरणहिंदासा होयकै निज आनँद लहूं ॥
दो० नवां गुरू अजगरकियो, लियो परम संतोष ।
परलब्ध दृढ़ करि गही, रहा राग नहिं दोष ॥
अष्टपदी
जिहि कारण गुरु कियो कहूँ कारण सभी ।
जासों रहौं दृढ़बैठि भयो धीरज तभी ॥
आगे भिक्षा काज ध्यान तजि डोलतो ।
कोऊ देतो भीख कोउ दुर्बोलतो ॥
जो कोउ भोजन दियो मगन होतो तहां ।
जो कोउ नाहीं दियो क्रोध करतो तहां ॥
अजगर इकदिन लखो जहां उतपति भयो ।
निशिदिन ठांईं रह्यो कहूं नाहीं गयो ॥
आंय अचानक मृगा सिंह वा मुख धँसै ।
चौपाये यौं आय तासु मुखमें फँसै ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७३
जो वह जागत होय उन्हें मुख सों गहै ।
तिनको भोजन करै उदर योंही भरै ॥
परालब्ध जो होय सोई ह्वां आरहै ।
परो रहै वहि ठौर सभी दुख सुख सहै ॥
वाकी लीनी रहनि बहुत सुखपाइया ।
चरणहिंदासा होय अधीर गँवाइया ॥
दो० जबसों पर आशा तजी, गृही द्वार नहिं जावँ ।
लगो रहौं हरि ध्यान में, सहज मिलै सो खावँ ॥
अष्टपदी ॥
मन राखौं प्रभु ध्यान सदा आनंदमें ।
ज्ञान दिशा अब भई रहो नहिं द्वन्दमें ॥
याचक घर घर फिरै न भिक्षा पावई ।
साधुनको वनमाहिं भोजन हरि ख्वावई ॥
जब भइ ऐसी समझ निचल बुधि आइया ।
जहँलग जिह्वा स्वाद सभी जु गँवाइया ॥
स्वादी अरु बिन स्वाद जो भोजन आवई ।
करि सब अंगीकार सुरुचि सों पावई ॥
सूखो गीलो होय जु भूनोहो कछू ।
ताको फेरौं नाहिं सभी लेकर भछूँ ॥
जो कछु आवै नाहिं ह्वांईं बैठो रहूँ ।
परालब्धही जानि बुरो भल ना कहूँ ॥
सकल बिकल नहिं होय न आशा कछु कहीं।
नारायण के ध्यान रहूँ लागो वहीं ॥
अजगर की सी वृत्ति निरी मेरे रही ।
२७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणहिंदासा होय भक्ति दृढ़करि गही ॥
दो० दशवें गुरु कियो सिन्धुको, कहूँ सोई परसंग ।
लीन्हे समझ बिचारिकै, जाके तीनों अंग ॥
अष्टपदी ॥
खारी नीर स्वभाव सदा इक रस वही ।
मीठी सरिता बहुत चली आवै बही ॥
मिलि नहिं फिरै स्वभाव तासु को जानिये ।
ऐसे विरकतरहै जगत में मानिये ॥
बहुतै होय गँभीर थाह नहिं पावई ।
ऐसा साधू जानि राम मन भावई ॥
वर्षाऋतुकी नदी रलैं बहु वादसों ।
घटै बढ़ वह नाहिं रहै मर्यादसों ॥
एकादश जो पतंग कहूँ मैं सुनायकै ।
देखि दीपकी ज्योति गिरैहै आयकै ॥
दीन्हो आप जराय हाथ कछु ना लगो ।
समुझि कामिनी रूप सो मैं दूरीभगो ॥
ज्ञान जाय अरु नरकपरै इस रीति को
सुन्दररूप निहारि करो मत प्रीति को ॥
दो० फूल फूलपर बैठिकै, उदर भरै तिस नाल ।
सो भवँरा गुरु बारवां, लई जू वाकी चाल ॥
अष्टपदी ॥
भिक्षा कारण मांगन घर घर जात हो ।
कोऊ देते आनि कोऊ जु रिसात हो ॥
ताते शिक्षा भवँर कि यह उरमें लही ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७५
सूक्ष्म सबही पुष्पसों उन रस मांगही ॥
तब में कियो विचार इकट्ठो लेनते ।
देनहार को दुःख बहुतही होत है ॥
नेक नेकही लेहु बहुत घरजायकै ।
उदर पूरणा करूं जु आनंद पायकै ॥
जितना होय अहार सोई अब लेत हौं ।
वासी नेक न राखि न काहू देत हौं ॥
अलिसुतकी यह रीति भूखभरि खावई ।
और दिना के काज न नेक वचावई ॥
फूलन को रस चाटि नहीं उनसों बँधै ।
ऐसे विरक्त रूप जगत में ना फँधै ॥
चरणहिंदासा होय त्याग मन राखई ।
राजा सों इहिभांति ऋषीश्वर भाखई ॥
दो० देखि दशा माँखीनकी, तजो सकल संग्रह ।
मिटिदुविधा निर्भयहुये, भई सुखारी देह ॥
अष्टपदी ॥
तेरह सहतकी माँखी ताहि पिछानियाँ ।
सब वृक्षनको मीठो इकठाँ आनियाँ ॥
जब छत्ता भयो पूर किसीने तोरिया ।
सब रस लीन्हो काढिकै वाहि मरोरिया ॥
बहुत भयो उन कष्ट जुवै भागी फिरीं ।
बहुत मरीं वहि ठावँ बहुत सिसकैं गिरीं ॥
ताते माँखी गुरू हिये माहीं धरो ।
कोउ जगकी वस्तुको संग्रह ना करो ॥
२७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौदह हाथी जानि काम वश होयकै ।
आपा आप बँधाय जन्म दियो खोयकै ॥
इक गज मातो हुतो जँगल के बीचही ।
अति बलवंत विशेषि कोऊ वा सम नहीं ॥
वा ढिग हस्ती और कोई नहिं जातहौ ।
मानुष पशुजिय योनि कहूं कह बातहौ ॥
वाकी आई बात जु राजापै चली ।
इक कुंजर वनमाहिं रहतहै अतिबली ॥
भूपति आज्ञादई पकरि वा लीजिये ।
जामें आवै हाथ यतन सोइ कीजिये ॥
दो० पीलवान आज्ञा लई, खोदी खंदक जाय ।
चरणदास तहाँ छल कियो, दीन्हीं घास बिछाय ॥
अष्टपदी ॥
भगल की हथिनि बनाय सँवारी बुद्धिसों ।
खंदक ऊपरधरी खरी करि शुद्धिसों ॥
जल पीवनके काज जु हस्ती आइया ।
वा हथिनीको देखिकै अधिक लोभाइया ॥
जब हथिनी की ओर चलो मतिहीनहीं ।
सपरश इच्छा धारि परो खंदकमहीं ॥
निकसन कैसे होय बहुत लंघन करे ।
अतिदुर्बल तन भयो पराक्रम सब हरे ॥
तब वापर चढ़ि बैठ महावत आयकै ।
बाहर लायो काढ़ि जु ताहि सधायकै ॥
फिर राजाके पास खड़ो कियो लायकै ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७७
अंकुश शिरके माहि जु बेड़ी पायँकै ॥
शीश धुनै पछिताय वै आनँद कितगये ।
जो सुख वनके माहिं सभी स्वप्ना भये ॥
सदाहुतो निर्बन्ध आय बंधन बँधो ।
कहैं चरणहींदास काम फंदन फँधो ॥
दो० सपरशकी इच्छा किये, भया जु ऐसा हाल ।
पशु पक्षी नर नारिही, फँसे कामके जाल ॥
अष्टपदी ॥
भाषत दत्तात्रेय जु साधूजन कभी ।
कामिनि ओर निहारि करै सपरश तभी ॥
हस्ती कैसो हाल साधुको होय है ।
सुमिरण ज्ञानरुध्यान जु सबही खोय है ॥
जो कहै हमहैं साधु जु कोई भार्या ।
चूमै हमरे चरण तासु होयहै कहा ॥
चरणन चूमै आय हाथ धरि पायँ पै ।
साधूमन चलिजाय स्पर्श सुख पायकै ॥
वाको सुख उरधारि करै इक कामिनी ।
वाते पुत्र कलत्र बहुतही यामिनी ॥
वनमें तप अरु योग जु करतो निशदिना ।
सो सबही गयो भूलि नहीं सुख इकछना ॥
ताते हस्ती गुरू हिये में धारिया ।
कामिनि को परसंग सकल निवारिया ॥
काठ कि पुतली होय कै कागज में रंची ।
चरणहिंदासाहोय सोभी देखन तजी ॥
॥७३॥
२७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० पन्द्रहवों गुरु मृग कियो, ताकी गति सुनिलेहु ।
औगुणहीं को छोड़िकरि, गुणहीं में चितदेहु ॥
अष्टपदी ॥
मृग देखो वन माहिं तासु मति आनियां ।
जीव दियो वहि ठौर सोई हम जानियां ॥
वधिक बजाई बीण राग गावनलगो ।
सरवण सुनि वह हिरण रीझि आयो भगो ॥
पहुँचेा पारधि पास बाण उन मारिया ।
ता दिन रागको चाव सकल निवारिया ॥
जो विरक्त सुनै राग जु रस शृङ्गारको ।
ऐसहि होवै ख्वार नरकमें जायसो ॥
सुनिये गुण गोपाल चरित कर्त्तारको ।
जासों दुख छुटिजाय ये मायाजारको ॥
तासों उपजै ज्ञान ध्यान दृढ़ करि गहै ।
पावै पद निर्वाण जहां सुखसों रहै ॥
निश्चयही तू जान जु मैंने यह कही ।
चंचलता गह छूटि जु बुधि निश्चल भई ॥
ताना रीरी राग नाच बिसराइया ।
चरणहिंदासा होय चरण चित लाइया ॥
दो० कहूं सोलवीं मीनकी, बुरी जीभ की स्वाद ।
जो कोई यामें फँसै, लगै बहुत उठि व्याध ॥
अष्टपदी ॥
सोलहौं गुरु सुन मीन जो ऐसे देखिया ।
वा मच्छी को एक वधिक अवरेखिया ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७६
थोरो मांस लगाय जु बंशी साथही ।
जलमें दी छुटकाय डोर गहि हाथही ॥
जिह्या स्वाद के काज मीन वह खाइया ।
गई उदर के माहिं हिये अटकाइया ॥
तीक्ष्ण कांटा लोह उदरको फारिया ।
ताहीक्षण वह मीन प्राण तजि डारिया ॥
ताते मच्छी गुरू हिये माहीं करो ।
जिह्याको कछु स्वाद नहीं मनमें धरो ॥
जो विरक्त को स्वाद जीभको चाहिये ।
बहुत भांति दुख होय नहीं सुख पाइये ॥
जिह्या स्वाद के काज गृही घर जायहै ।
आछो भोजन पाय तौ रुचिसों खायहै ॥
भोंड़ो भोजन होंय तौ नाक चढ़ावई ।
हरि सुमिरण को त्यागिकै जिततित जावई ॥
ताते साधूलोग नहीं घर घर फिरैं ।
जिह्या को कछु स्वाद नहीं चितमें धरैं ॥
ऐसे भोजन खाय लखै ज्यों औषधी ।
सबही रोग नशाहिं रहै काया शुधी ॥
चीकन भोजन खाय नींद बहु आवई ।
ध्यान भजनकी रीति सकल बिसरावई ॥
सब इन्द्रिन के माहिं जो जिह्यावशकरै ।
जो आवै सोइ खाय कभूं भूखो रहै ॥
जो जिह्यावश होय तौ इन्द्री वश सबै ।
जो रसना वश नाहिं तौ सब परबल तबै ॥
चीकन भोजन खाय तौ इन्द्री सब जहां ।
२०
२८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अतिही है बलवन्त करें औगुण तहां ॥
षटरसही के स्वाद सों नारी वशभये ।
जग माहीं दुखपाय मुये नरकैगये ॥
मन्में देखि विचारि गुरू कियो मीनहूं ।
जासों लीनी सीख इन्द्रिभइ क्षीनहूं ॥
सबही स्वाद भुलाय शरण हरिकी लई ।
चरणहिंदासा होय सुरति निर्मल भई ॥
दो० सत्रहवों गुरु पिंगला, लीन्हों जासों ज्ञान ।
आशातजिनिर्मलभयो, लगो रहूं हरिध्यान ॥
अष्टपदी ॥
गुरु सत्रहवों जान हमारो पिंगला ।
पर आशा दइ छांड़ि रहूं आनँद मिला ॥
इक दिन राजा जनक विदेही के नगर ।
गयो अचानक लख्यो पिंगला को बगर ॥
पिंगला उठि परभात भली विधि न्हाइया ।
भूषण बस्तर पहिरि सुगन्ध लगाइया ॥
घरके द्वारे बैठि जु बाट निहारई ।
कोऊ दे बहु द्रव्य सु ह्वां पग धारई ॥
मारग में नर देखि यही आशा करै ।
आवतजानै ताहि खुशी हियमें धरै ॥
जब वह आयो नाहिं दुखी मनमें भई ।
कबहूं आश निराश ऐसही निशि अई ॥
ऐसे सब दिन बीतिगयो यहि भांतिही ।
मनमें भई मलीन आइ पुनि रातिही ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन २८१
काया आलस धारि जु घर भीतर गई ।
पलका बैठी जाय जहां भलि सेजही ॥
बिछे बिछौना श्वेत फूल तापर धरे ।
लेटी तहां मग जोय नैन निद्राभरे ॥
कबहूं उठिजा द्वार कभूं जा भीतरै ।
कहै चरणहींदास नींद नाहीं परै ॥
दो० आशाकी डोरी बँधी, क्षण घर में क्षण द्वार ।
थिरताना संतोषबिन, दुखी पिंगलानार ॥
अष्टपदी ॥
ऐसे आधीराति गई जब बीति कै ।
कोऊ आयो नाहिं सुहां कछु प्रीतिकै ॥
पिंगला उपजो ज्ञान हिये परकाशही ।
उदयभयो संतोष लोभ गयो नाशही ॥
वर्ष सहसदश माहिं जु तप कोऊ करै ।
हिरदै निर्मल होय सभी कलिमल हरै ॥
ऐसो ज्ञान उजास पिंगला को भयो ।
तब उन हिरदै माहिं वचन ऐसो कह्यो ॥
हीन हमारे भाग जन्म योंहीं गयो ।
मनुष रूपसों काम क्रोध लोभै छयो ॥
ताते जिविका आप हिये में चाहिया ।
परमातम भगवान सों प्रीति न लाइया ॥
सदा विराजत निकट दूरि नहिं होतहै ।
सबविधि पूरणकाम सकल जग ज्योतिहै ॥
सबहीको नित देतु खान अरु पानई ।
चरणहिंदासा होय सोई यह जानई ॥
२८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० लख चौरासी योनि में, सवको भोजन देय ।
सदा वही पालन करै, अपनो नाम न लेय ॥
अष्टपदी ॥
मनुषरूप जो देय एकदिन खानको ।
दूजे दिन वह बहुत घटावै मानको ॥
नारायण सों भक्ति जो जगको सुख चहै ।
ऐसे वाको देय सदा एकरस रहै ॥
जाके लीन्हे नाम सकल पातक नसैं ।
कथा जु उनकी सुनै हिये आनँद लसैं ॥
ऐसो हरि विसराय मनुषको चाहिया ।
विरथा जन्म गवाँयकै सुख नहिं पाइया ॥
काया है इक गेह हाड़ अरु मांस को ।
नाड़ी गुणसों बांधि रखो है तासु को ॥
चामरु लोहू पीब तहां नव द्वारहैं ।
सदा बहतही रहत यही जु विचारहैं ॥
विष्ठा मूत जो होय या गेहके माहिंहीं ।
ऐसे घरसों भोग मुदित मन चाहहीं ॥
ऐसे विरथा आयु सकल जु गवाँइया ।
हरि के चरणनदास नहीं जु कहाइया ॥
दो० अब उरमें ऐसी उठी, करूं भक्ति चितलाय ।
चरणकमल में मन धरूं, जगसों नेह उठाय ॥
अष्टपदी ॥
• अब करूं भक्ति उपाय जु हरि मनभाइया ।
ताते लेहुं रिझाय परमगुण गाइया ॥
जैसे लछमी सेव करी मन लायकै ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८३
कीन्हे महाप्रसन्न श्रीपति धायकै ॥
ऐसे मन भगवान सों अपनौ लायलौं ।
पावों पुरुष निधान प्रीतिके भायहौं ॥
लछमी करी जु भक्ति पुराणन में कहैं ।
नारायण दई ठौर सदा हियमें रहें ॥
मैंहूं ऐसी भक्ति करूं अतिप्रेम सों ।
करूं महापरसन्न अधिकही नेमसों ॥
आज के दिनसे आश पुरुष की त्यागिकै ।
राखूं प्रभुकी चाह चरणहीं लागिकै ॥
जो कछु हरि मोहिं देयँ सोई निर्दोषहै ।
करूं भजन भगवन्त तासु सों मोपहै ॥
मनुष रूप कह वस्तु जु आशा कीजिये ।
बहुत वहाँलों देत जहाँलों जीजिये ॥
दो० दुख में काम न आवई, मुये न संगी कोय ।
चरणदास यों कहत हैं, ये संसारी लोय ॥
अष्टपदी ॥
जब वह मृतक होय नहा कछु हेत है ।
हरि जु सदाही संग सभी सुधिलेत है ॥
मनुष आपनी नाहिं जु इच्छा करिसकै ।
औरन को कहा देय मूर्ख योंहीं तकै ॥
पिंगला कहो यह ज्ञान मुझे क्यों आइया ।
नीके काजन माहिं न चित्त लगाइया ॥
तीरथ बर्त्त न साधू दर्शन देखिया ।
हौं तिरिया बुरे कर्म कि चाल विशेषिया ॥
पुरुषोत्तम की दया मों यह पहिचानिये ।
२८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और बात कछु नाहिं हिये में आनिये ॥
जो कोई कहै आज कछू धन ना लयो ।
कोई आयो नाहिं ज्ञान ताते भयो ॥
आगेहू बहुदिवस कोई नहिं आइया ।
कीन्हे लंघन बहुत द्रव्य नहिं पाइया ॥
ज्ञान कबहु नहिं भयो आज जानत नहीं ।
कौन भाग बड़ मोर भयो परगट अभी ॥
कहैं गुरू शुकदेव जु उन नहिं जानियाँ ।
दत्तात्रेय के दर्शसों कुमति भुलानियाँ ॥
दो० पिंगला आई घर बिषे, छोड़ि मनुषकी आश ।
सुखी होय सोवन लगी, जब वह भई निराश ॥
अष्टपदी ॥
मनमें किय सन्तोष सकल दुख मिटिगये ।
छोड़ी जग की आश हिये आनंद छये ॥
यों कहैं दत्तात्रेय राजासों यही ।
वाकी मैं लइ सीख सोई दृढ़ करि गही ॥
गृही द्वार नहिं जावँ न मांगौं कछु कहूं ।
ताते सुखी अरु शान्त सदा बैठोरहूं ॥
उद्यम करूं कछु नाहिं वासना त्यागिकै ।
आनंद तन मन मोहिं बहुत अनुरागकै ॥
मनुष दुखी वहि होय रहै आशा लिये ।
काम क्रोध अरु लोभ मोह उतपति किये ॥
जो आशा मन आय कबहु वह नाभई ।
क्रोध भयो उत्पत्ति यही मनसा ठई ॥
काहूते इकवस्तु कभू जु मँगाइया ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८५
वाने दीन्हीं नहिं क्रोध उपजाइया ॥
वाते कीन्हों वैर अधिक रिस ठानिया ।
नारायणके ध्यान सुरति नहिं आनिया ॥
यह शिक्षा लइ मानि पिंगलासे तभी ।
जगकी छोड़ी आश भये कारज सभी ॥
दो० चील्ह अठरहों गुरु कियो, मिटो सकल सन्देह ।
रहौं अकेलो संग तजि, करौं न कछु संग्रह ॥
अष्टपदी ॥
जब गृहसेती निकसि वैरागी हम भये ।
तब हमरे मनमाहिं जु ये कारज छये ॥
दो भाजन सँग होहिं एक जल पीजिये ।
दूजे भाजन माहिं खानको लीजिये ॥
इक चादर कोपीन दोय यह चाहिये ।
ताते ओढ़ि नहान किं युक्ति बनाइये ॥
करिकै जब अस्नान ध्यान करने लगो ।
मनमें चिन्ता कोऊ कोपीनहिं लै भगो ॥
समझो यह मनमाहिं बहुत अधिकारते ।
अन्त महादुख होय मोह उरधार ते ॥
ऊंची पदवी पाय बहुरि नीचे परै ।
जब वह संपत जाय घनो मनमें झुरै ॥
जो कोइ रहै इकन्त अकेलोई सहै ।
ताहि उदर को शोच कछू नाहीं रहै ॥
दशबिस सौ जो साथ अधिक दुख लहत है ।
आप अकेलो रहै परमसुख सहत है ॥
२८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सकल विकल बिसराय जु आनँद पावई ।
चरणहिंदासा होयकै बोझ बगावई ।
दो० उड़ती देखी चील्ह को, पंजे माहीं मांस ।
बहु पक्षी घेरे फिरैं, लेन न देवैं श्वास ॥
अष्टपदी ॥
पक्षी सभी लुभाहि मांसको देखिकै ।
वाको मारै चोंच जु लोभ विशेषिकै ॥
कोई नोचै पंख कोई मस्तक भनै ।
वह दुख पावै बहुत समझि मूड़ी धुनै ॥
मैं काहूसे वैर प्रीति नहिं मानिया ।
या भक्षण के काज कष्टही जानिया ॥
मांस दियो छिटकाय जुदे पक्षी भये ।
वा भक्षण के पास सभी दौरे गये ॥
वह बैठी मन मुदित जु पंख पसारिकै ।
दीन्ह्यो दुख बिसराय जु व्याधा टारिकै ॥
वा दिनते लइ सीख जु संग्रह ना करौं ।
कछू न राखौं पास नग्न तन मैं फिरौं ॥
जहँ चाहूँ तहँ जावँ भजन आनन्द में ।
कछु मन चिन्ता नाहिं छुटो सब बन्धते ॥
काहू वस्तु न शोच कोई लैजायगो ।
चरणहिंदासा होय ध्यान हरिपाय को ॥
दो० बालक गुरु उन्नीसवों, ताके लिये स्वभाव ।
नहीं मान अपमान है, लोभ न कछू उपाव ॥
अष्टपदी ॥
बालक माहीं नहीं मान अपमानहूं ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २८७
लोभ जु वामें नाहिं रहै अनजानहूं ॥
मारै कोई वाहि रोष वह ना करै ।
करै जु फिरि वह प्यार बाल हँसि हँसि परै ॥
निन्दा अस्तुति दोय कभी नहिं धारई ।
वैर प्रीतिको अङ्ग कछू न विचारई ॥
जो मणि बहुतै मोल कि वासे लीजिये ।
खेल खिलौना फूलको पलटे दीजिये ॥
मणिको लोभ न करत कछू नहिं भाषई ।
चितको अपने खेलके माहीं राखई ॥
जो कोउ नारी पकरि हिये सों लागई ।
बालक अरु वा नारिको काम न जागई ॥
नग्न जु बालक फिरत लाज नहिं आवई ।
ज्यों भावै त्यों रहै कोई न चलावई ॥
क्रिया कर्म अरु सकुच कछू वाके नहीं ।
ठाकुर अरु चरणदास कछू जानै नहीं ॥
दो० बोले दत्तात्रेय जी, राजासों यह बैन ।
इकदिन बालक की सबै, देखी अपने नैन ॥
अष्टपदी ॥
भाषैं दत्तात्रेय बालगति देखिकै ।
वाकेलिये स्वभाव सभी जु विशेषिकै ॥
जो कहुँ हमसों प्रीति बहुत आदर कियो ।
काहूं गारी काढ़ि बहुत झड़को दियो ॥
दोनों एक समान और नहिं व्यापई ।
बैठूं सहज स्वभाव उठूं फिर आपई ॥
जो किन्हूं भोजन दियो चाटिहाई लियो ।
२८८ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
करही को करपत्र पानी तामें पियो ॥
अष्टधातु कों लोभत्याग सबही कियो ।
कैसोहि बस्तरदेहु छांड़ि तितही दियो ॥
ज्यों बालक निज खेलमें आनँदसों रहै ।
त्यों परमातम संग कछू दुखहू न भै ॥
तुरिया पद निर्वाण मातु समहीं कहूँ ।
ताकी गोदी माहिं सदा सुखसों रहूँ ॥
चरणहिंदासा होयकै गर्व नशाइया ।
छोटापन के अंग सबै तब आइया ॥
दो० कन्या गुरु कियो बीसवों, समझि विचारिकै देखि ।
रहौ अकेलो तभीसों, पायौ यही विवेक ॥
अष्टपदी ॥
पुण्य तू बिसवों जान गुरू कन्या कियो ।
वाको मत अनुराग हिये माहीं लियो ॥
इक नगरी के माहिं एक दिन हम गये ।
इक गृहचारी के गेह जाय ठाढ़े भये ॥
स्यानी कन्या तासु जु घरमाहीं हुती ।
मात पिता केहु काज गवन कीन्हों तभी ॥
करन सगाई आय लोग बैठे तहीं ।
या कन्याकी करें सगाई आजहीं ॥
कन्या कीन्हों सोच यही कैसे कहूँ ।
मात पिता कहिं गये अकेली मैं अहूँ ॥
ऐहैं मातरु पिता चिन्त मनमें करैं ।
भोजन को कछु नाहिं जु हम आगे धरैं ॥