भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
करही को करपत्र पानी तामें पियो ॥
अष्टधातु कों लोभत्याग सबही कियो ।
कैसोहि बस्तरदेहु छांड़ि तितही दियो ॥
ज्यों बालक निज खेलमें आनँदसों रहै ।
त्यों परमातम संग कछू दुखहू न भै ॥
तुरिया पद निर्वाण मातु समहीं कहूँ ।
ताकी गोदी माहिं सदा सुखसों रहूँ ॥
चरणहिंदासा होयकै गर्व नशाइया ।
छोटापन के अंग सबै तब आइया ॥
दो० कन्या गुरु कियो बीसवों, समझि विचारिकै देखि ।
रहौ अकेलो तभीसों, पायौ यही विवेक ॥
अष्टपदी ॥
पुण्य तू बिसवों जान गुरू कन्या कियो ।
वाको मत अनुराग हिये माहीं लियो ॥
इक नगरी के माहिं एक दिन हम गये ।
इक गृहचारी के गेह जाय ठाढ़े भये ॥
स्यानी कन्या तासु जु घरमाहीं हुती ।
मात पिता केहु काज गवन कीन्हों तभी ॥
करन सगाई आय लोग बैठे तहीं ।
या कन्याकी करें सगाई आजहीं ॥
कन्या कीन्हों सोच यही कैसे कहूँ ।
मात पिता कहिं गये अकेली मैं अहूँ ॥
ऐहैं मातरु पिता चिन्त मनमें करैं ।
भोजन को कछु नाहिं जु हम आगे धरैं ॥