भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
२६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
माखी हाथी मृगा मीन अरु पिंगला लहिये ॥
चील्ह बाल कन्या कहूं तीर बनावनहार ।
सांप माकरी भृंग जो चौबीसौं उरधार ॥
दो० भिन्न भिन्न अब कहतहों, जुदो जुदो विस्तारि ।
ताको सुनि करि चेतियो, चरणदास नरनारि ॥
अष्टपदी ॥
दत्तात्रेय कि बात सकल अब गायहौं ।
बीसचारि गुरु किये ताहि समुझायहौं ॥
जिसकारण जिसहेतु जु उन ऐसी करी ।
जो जो शिक्षालई समझ हिरदयधरी ॥
जासों भजै मन रोग जक्त ब्याधानसी ।
उपजि परम संतोष क्षमा हिय आ बसी ॥
परम भये आनंद परमपद पाइया ।
जीवन्मुक्ता होय कि चाह उठाइया ॥
सोइ कहूं अब साध सबै सुनि लीजिये ।
शुकदेव परीक्षित सों कहो सांच पतीजिये ॥
दत्तात्रेय अवतार श्री भगवान के ।
राजा यदुसों बोलि वचन भाषत भये ॥
हमने गुरू चौबीस करे संसार में ।
तिनको ज्ञान विचार कहूं निरधारमें ॥
पहिले गुरुकी शरणगही बहुप्रीति सों ।
उन दीनो उपदेश मंत्र जौ रीतिसों ॥
दो० सतगुरु ने किरपा करी, धरो हाथ मम शीश ।
यही कही सुमिरण करो, ध्यान करो जगदीश ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६१
अष्टपदी ॥
काया छीजत देखि यही मनमें धरो ।
बिरथा खोवत आयु नेम तप को करो ॥
गहि विरक्तकी रीति तभी गृहको तजो ।
रामभक्ति को चाव हमारे मन रचो ॥
जगसों रहो उदास वास हरिपद जहां ।
छुटि छुटि जावै ध्यान न मन लागे जहां ॥
बालक गारी देइ कोई बेलानहीं ।
शिरपै डारै खेह सोई बेकाजहीं ॥
हँसि हँसि ताली पीट जु हमरे सँगलगेँ ।
मैंहूं चलो उठाय तौ वे आगे भगेँ ॥
ताते निशिदिन क्रोध आपने मनधरूं ।
हरि सुमिरण गो भूलि जक्तमें यों फिरूं ॥
अब शिक्षा गुरु किये चौबीसौ भेदही ।
सो अब वर्णन करूं छुटै सब खेदही ॥
तिनसों सीखी चाल सभी उरमें धरी ।
चरणहिं दासा होय सुरति आनँद भरी ॥
दो० पहिले गुरु पृथ्वी किया, तीन सीख लइ तास ।
गिरिवर तरुवर मही जो, भयो चरण की दास ॥
अष्टपदी ॥
पहिले पृथ्वी गुरू हमारो जानिये ।
ताते लइ मति तीन साच हिय आनिये ॥
पहिले पर्वत एक मही ऊपर लखा ।
जाके निकटै जाय जु चढ़ि बैठा शिखा ॥
२६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोइ ऊपर चढ़ि जाय कोई आवै तले ।
जल बरषै ना बहै पवन सों ना हिलै ॥
वा पर्वतकी सीख बुद्धि में मानियां ।
देह लोभ दियो त्याग जुथिरता आनियां ॥
क्रोध दियो बिसराय जो तामस डारई ।
कोउ कहौ दुर्वचन कोउ क्यों न मारई ॥
क्रोध लोभ जो होय करै मन भंग है ।
कैसे सुमिरण होय लगे हरिरंग है ॥
क्रोध लोभ छुटिजाय रहन ये अगाध है ।
पर्वत की सम होय जो निश्चल साधहै ।
वृक्ष कहूँ अब जान जासु मति पाइया ॥
कहै चरणको दास जो चित्त लगाइया ।
दो० तरुवर ने काया धरी, परमारथ के हेत ।
कोऊ बैठे छाहँ में, कोऊ कारज लेत ॥
अष्टपदी ॥
दूजे देखे वृक्ष धरणि ऊपर भले ।
उनहूँकी लइ सीख गयो उनके तले ॥
मननहुती यह बात जु परकारज करूं ।
या प्राणी के काज नहीं करतो फिरूं ॥
जब आई यह रीति वृक्षकी दृष्टिमें ।
मैं लीन्हीं सोइ धारि भलीविधि सृष्टिमें ॥
कोई बैठे छाहँ कोई डारी हनै ।
कोई ले फल फूल वृक्ष कछु ना भनै ॥
परमारथ के काज वृक्षदेही धरी ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६३
सकल जीव ब्योसाय यही मनसा करी ॥
जो विरक्तसों काज कोई अपनो कहै।
वाको नाटै नाहिं सभी शिर पर सहै ॥
काहुको कछु काज जो काया सों सरै ।
यह शिक्षा भलिभांति वृक्षकी मनधरै ॥
तीजे शिक्षा और मही की धारिया ।
चरणहिंदासा होय अहूँ को मारिया ॥
दो० कोई खोदै नीवको, कोई खोदै कूप ।
अरु ऐसे कारज किये, ऐसो धरो स्वरूप ॥
अष्टपदी ॥
काहूको वह भलो बुरोहू ना कहै ।
ऐसे विरकत रहै सभी दुख सुख सहै ॥
हरि सुमिरण में मगन सदा आनँद रहै ।
भलो बुरो नहिं मान एकता दृढ़ गहै ॥
दूजे गुरु किंयो पवन सीख लह जासुकी ।
दोय भांति पहिंचान हिये धरि तासुकी ॥
इक दिन बाग के माहिं सहजही मैं गयो
देखन लाग्यों फूल जाय ठाढ़ो भयो ॥
पुष्पन सों लगि पवन वास मोहिं आइया ।
जबहीं कीन्हों ज्ञान बात सब पाइया ॥
वह तौ अतिहि सुगन्ध हरष उपजावई ।
फिर आई दुर्गन्ध बहुत अनखावई ॥
गन्धहि सों लगि पवन आप गन्धहि भई ।
पुनि आई बिन गन्ध शुद्ध निर्मल वही ॥
३९
२६४ ' श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वाको देखि स्वभाव यही मन आइया ।
चरणहिं दासा होय अंग उपजाइया ॥
दो० 'एक दिना इच्छा करी, भिक्षा मांगी जाय ।
अपनी श्रद्धा उन दियो, भोजन करमें लाय ॥
अष्टपदी ॥
वाकी अस्तुति नाहिं कछू मुखते कही ।
फिरि गयो दूजे द्वार दई भिक्षा नहीं ॥
जाकी निंदा नाहिं कछूक उचारिया ।
अस्तुति निन्दा त्याग यही जु विचारिया ॥
जिन कछु दीन्हो नाहिं नहीं औगुण धरो ।
जो कछु पहिले आयो सोई भोजन करो ॥
जो कहु अपने काज गयो भलि ठांवहीं ।
गिरहण कीन्हो नाहिं रंग नहिं लावहीं ॥
जो गयो भोंड़ी ठौर बुरो नहिं जानियां ।
आतमरूप सँभाल जहाँ मन आनियां ॥
सबही सों निर्लेप सबन के माहिंहूं ।
सहज भवन में आय सहज कहि जाहिंहूं ॥
परालब्ध जो पाय ताहि भोजन कियो ।
नातौ करि प्रणाम बैठि योंही रह्यो ॥
जिद्धालौहीं जान स्वाद भोजन सभी ।
इकसम सबही होयँ उदर जावैं जभी ॥
अब आयो सन्तोष कल्पना सब गई ।
चरणहिंदासा भयो जभी यह मति लई ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६५
दो० तीजे गुरु आकाश को, कीन्हो समझ सँभार ।
जाकी मति के लेतही, पायो ब्रह्म विचार ॥
अष्टपदी ॥
तामें बरसै मेह और आंधी चलै ।
बिजली चमक वामाहिं और पावक जलै ॥
सदा रहै निर्लेप और निर्मल रहै ।
सबही जग वामाहिं आप निर्लम्भ है ॥
पवन हलावै नाहिं अग्नि जारै नहीं ।
ताहि न भिजवै नीर मरै मारै नहीं ॥
लघुदीरघ नहिं होय पुरुष नहिं नार है ।
नहिं सूक्ष्म नहिं भार वार नहिं पार है ॥
शब्द उठै बहु भांति वही जो अबोल है ।
उतपति परलय माहिं सदा जो अडोल है ॥
यह नभ ब्रह्मसमान लखो दृष्टान्त है ।
निरखि हिये की आंखि गयो सब भ्रान्त है ॥
भाँड़े कनक के होहिं चाँदी के देखिया ।
कांसी पितल के होयँ मट्टी के पेखिया ॥
सब माहीं आकाश एकही जानिया ।
यों घट घट में ब्रह्म सकल पहिंचानिया ॥
थिर चरही के माहिं जु थावर जंगमें ।
न्यारा अरु सब बीच भली विधि रंगमें ॥
जो बर्तन गयो फूटि रहो आकाशहूं ।
ऐसेहि काया बिनशि रहै नित ब्रह्मजू ॥
नित्य अनित्य विचार जभी निश्चय भई ।
२६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सदा गुप्तही रहै प्रगट किये होत है ।
ऐसे साधूभेद छिपावै जोत है ॥
षष्ठहु गुरु कियो चंद सदा इक समवहै ।
कला घटै अरु बढ़ै मावस लगना रहै ॥
पूनोको सब होहिं कला भरपूरही ।
चांदनि सब जगमाहिं विराजत नूरही ॥
शशिमण्डल इकभांति रहै नाहीं घटै ।
योंही आतम रूप चरणदासा रटै ॥
दो० उतपति परलय देहको, घटै बढ़ दुख होय ।
आतम इकरस जानिये, अविनाशी है सोय ॥
अष्टपदी ॥
ताते कियो विचार ये काया ना रहै ।
जन्म मरणही होय कलाके ज्योंयहै ॥
परमातम इकभांति सदाही जानिये ।
घटै बढ़ै वह नाहिं यों मनमें आनिये ॥
कायाछोटी होय बड़ी पुनि होत है ।
कवहूँ हो मनमगन कबौं रोवै वहै ॥
आतमहीं नित जानि जु कायामें रहै ।
वही सदा इकभांति कोई ज्ञानी लहै ॥
ताते श्रीभगवानको सबठां पेखिकै ।
मनमाहीं गहिराखि फिरतहूँ भेखिकै ॥
सतवें गुरुकिया सूर जु शिच्छा दोलई ।
आठमहीने किरणि नीर सोखतवही ॥
मनविरक्तकरणगुटकांसारवर्णन । २६६
चारमास वह आप फेरि बरषा करै ।
वा जलको कछु लोभ नहीं मनमें धरै ॥
ऐसे साधू होय जु कछु कोइ देतहै।
वाको आछी भांति सोई वह लेत है॥
मोह न कबहूँ करै जु कोई कछु चहै।
चरणहिंदासा जानि सोई यह गति लहै॥
दो० लेते कछु हरपै नहीं, देते दुख नहिं होय।
ऐसे निर्लोभी रहै, चरणदास है सोय ॥
अष्टपदी ॥
दूजे जो प्रतिबिम्ब सूर को देखिये ।
जल भांडौं के माहिं सबन अवरेखिये ॥
खोजिकै देखौ वाहि सूर तौ एकहै ।
घट घटमें प्रतिबिम्ब विचारि अनेकहै ॥
ना काहूसे वैर प्रीतिहू ना करै ।
सूरज एक निहारि सकल घट छवि धरै ॥
ऐसेही निर्मोह सदा निर्लेप है।
वाको साधूजान सो ऐसी विधिरहै ॥
अठवेंकियो कपोत गुरू मैं विचारिकै ।
निर्मोहित मन भयो तभी जु निहारिकै ॥
उठी एक मनमाहिं नारि सुत कीजिये ।
जगमें ह्वै निश्चिन्त बहुत सुख लीजिये ॥
सहज बागके माहिं जाय ठाढ़ो भयो ।
वृक्षपै एक कपोत कपोतिनि को लह्यो ॥
ता ऊपर उन गेह आपनो साजिया ।
बहुत प्रीति सुखमानि सकल दुख भाजिया ॥
२६६ ः श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पायो आतमज्ञान सभी दुबिधा गई ॥
ना काहू से वैर नहीं कहुँ प्रीति है ।
ना काहू दुख देहुं नहीं सुख रीति है ॥
काहूसे नहिं डरूं न काहू सँग लगूं ।
काहु कि शरण न जावँ न काहूसे भगूं ॥
कहैं श्रीशुकदेव विवेक विचार सों ।
दत्तात्रेयी कह्यो यथा यदुराज सों ॥
यह शिक्षा आकाशसों लीन्हीं जानिकै ।
चरणहिंदासा भयो यही मत मानिकै ॥
दो० चौथे गुरु कियो नीरहीं, जाको सुनिय प्रसंग ।
आप महा उज्ज्वल रहै, मिलिजावै सब रंग ॥
अष्टपदी ॥
जल ज्यों निर्मल होय सदा विरकत वही ।
तजै न शीतल अंग बसै नितही मही ॥
गृही संग जो चलै बाट कबहूं कहीं ।
मनसों न्यारा रहै लेह लागै नहीं ॥
ऐसो रखै विचार यथा बरषा समै ।
जल मैला है जाय खेह सँगही रमै ॥
संगति गुण सों होय जु गँदला आपही ।
जाड़े में है शुद्ध लगै नहिं पापहीं ॥
समझो यों चितमाहिं संगको गुण यहै ।
निर्म्मल नीर स्वभाव सदा उज्ज्वल रहै ॥
संसारी के संगसों जब मन फिरगयो ।
तब नारायण रूप ध्यान आनँद लयो ॥
कछू मैल, मनमाहिं कबहूँ व्यापै नहीं ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६७
जल अरु साधू भांति एक जानौ तहीं ॥
जो कुचील कछु होय सो जलसों धोइये ।
वाको कीजै शुद्ध मैल सब खोइये ॥
साधू ऐसा होय ज्ञान मुख उच्चरै ।
श्रोताके सब पाप ताप ब्याधा हरै ॥
तातेही उपदेश भक्तिका कीजिये ।
नीच ऊंच मतदेख वृक्ष ज्यों सींचिये ॥
मीठे शीतल नीरको यह गुण लीजिये ।
मीठा सबसों बोलि परमसुख दीजिये ॥
गुरु शुकदेव प्रतापसों जल गुण गाइया ।
चरणहिंदासा होय न मनता आइया ॥
दो० पंचमगुरुकियो अग्निको, समझ निहारि निहारि ।
उत्तम मध्यम जारदे, राखै कछुन विचारि ॥
अष्टपदी ॥
ब्राह्मणहूँ करै होम शूद्र जोपै करै ।
दोउपवित्र करि देइ दोऊ के अघ हरै ॥
ऐसे साधूलोग जहां भोजन करैं ।
वाको पावन करैं पाप सबही हरैं ॥
गृही जु सेवा करैं आश ऐसी धरै ।
विरकत भोजन किये पाप निश्चय जरै ॥
धान्य हमारी खाय जु साधूजन कभी ।
हमरे पाछतजाहिं और ब्याधा सभी ॥
साधूजन जो होय अग्नि के भांतिही ।
सकल पाप करै क्षार जु वाकी क्रांतिही ॥
२६८ ˙ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सदा गुप्तही रहै प्रगट किये होत है।
ऐसे साधूभेद छिपावै जोत है॥
षष्ठहु गुरु कियो चंद सदा इक समवहै।
कला घटै अरू बढ़ै मावस लगना रहै॥
पूनोको सब होहिं कला भरपूरही।
चांदनि सब जगमाहिं विराजत नूरहीं॥
शशिमण्डल इकभांति रहै नाहीं घटै।
योंही आतम रूप चरणदासा रटै॥
दो० उतपति परलय देहको, घटै बढ़ दुख होय।
आतम इकरस जानिये, अविनाशी है सोय॥
अष्टपदी॥
ताते कियो विचार ये काया ना रहै।
जन्म मरणही होय कलाके ज्योंयहै॥
परमातम इकभांति सदाही जानिये।
घटै बढ़ै वह नाहिं यों मनमें आनिये॥
कायाछोटी होय बड़ी पुनि होत है।
कबहूँ हो मनमगन कबौं रोवै वहै॥
आतमहीं नित जानि जु कायामें रहै।
वही सदा इकभांति कोई ज्ञानी लहै॥
ताते श्रीभगवानको सबठां पेखिकै।
मनमाहीं गहिराखि फिरतहूँ भेखिकै॥
सतवें गुरुकिया सूर जु शिक्षा दोलई।
आठमहीने किरणि नीर सोखतवही॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६६
चारमास वह आप फेरि बरषा करै ।
वा जलको कछु लोभ नहीं मनमें धरै ॥
ऐसे साधू होय जु कछु कोइ देतहै ।
वाको आछी भांति सोई वह लेत है ॥
मोह न कवहूँ करै जु कोई कछु चहै ।
चरणहिंदासा जानि सोई यह गति लहै ॥
दो० लेते कछु हरषै नहीं, देते दुख नहिं होय ।
ऐसे निलोभी रहै, चरणदास है सोय ॥
अष्टपदी ॥
दूजे जो प्रतिबिम्ब सूर को देखिये ।
जल भांडौं के माहिं सबन अवरेखिये ॥
खोजिकै देखौ वाहि सूर तौ एकहै ।
घट घटमें प्रतिबिम्ब विचारि अनेकहै ॥
ना काहूसे वैर प्रीतिहू ना करै ।
सूरज एक निहारि सकल घट छवि धरै ॥
ऐसेही निर्मोह सदा निर्लेप है ।
वाको साधूजान सो ऐसी विधिरहै ॥
अठवैंकियो कपोत गुरू मैं विचारिकै ।
निर्मोहित मन भयो तभी जु निहारिकै ॥
उठी एक मनमाहिं नारि सुत कीजिये ।
जगमें ह्वै निश्चिन्त बहुत सुख लीजिये ॥
सहज बागके माहिं जाय ठाढ़ो भयो ।
वृक्षपै एक कपोत कपोतिनि को लह्यो ॥
ता ऊपर उन गेह आपनो साजिया ।
बहुत प्रीति सुखमानि सकल दुख भाजिया ॥
२७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० करि विचार मनमें धरी, धन्यभाग सुख होय ।
हम समान या जगतमें, और न दीखै कोय ॥
अष्टपदी ॥
भयो कपोतिनि गर्भ अण्ड द्वै वा दिये ।
प्रीतिसों सेवन किये फूटि द्वै सुत भये ॥
केतक दिवसन माहिं पंख निकसे सभी ।
उड़िकै बैठन लगे डार ऊपर तभी ॥
निरखत बहुसुख मानि कपोत कपोतिनी ।
हमरे अति बड़भाग दियो यह सुख धनी ॥
एक रहे घर माहिं जु रक्षा धारने ।
दूजे वन में जाय जीविका कारने ॥
बनसे चूगालाय बचन मुखं डारई ।
बाते उनकी क्षुधा सकल निरवारई ॥
जन्म सुफल मन जानि रैनदिन यों रहै ।
वसुधामें कछु शोच न हियमाहीं लहै ।
इकदिन कह्योकपोत कपोतिनि साथही ।
ये बच्चा अब बड़े भये सब गातही ॥
एतौ रहैं गृहमाहिं दोऊ हम वन चलें ।
चूगा लावैं बहुत करैं भोजन भलैं ॥
है करि निस्संदेह दोऊ वन को चले ।
कहैं चरणहींदास चुगन लागे भले ॥
दो० पाछे बधिक जु आइया, दीनो जाल बिछाय ।
पकरन की मनमें करी, बैठ्यो घात लगाय ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७१
अष्टपदी ॥
दोऊ गये वनमाहिं वधिक इक आइया ।
उन बचनको देखिकै जाल बिछाइया ॥
तापर किणका डारि आपतौ छिपिरह्यो ।
बचन चूगा देखि भेद कछु ना लह्यो ॥
यह कण कारण मात पिता वनको रमै ।
सो पायो यहि ठौर चुगैं क्यों ना हमै ॥
दोऊ उतरे तहां जबै मुख डारिया ।
तब वहि वधिकने जाल फंदकों मारिया ॥
आय कपोतिनि जबै शब्द नाहीं सुनो ।
घरमें पाये नाहि शीश तबहीं धुनो ॥
बचन कारण शब्द कियो हंकारिकै ।
बोले पिंजर माहिं जु वचन निहारिकै ॥
देखि कपोतिनि जालमें यह मन आनिया ।
अपना जीवन अफल जगतमें जानिया ॥
तनमें अतिदुख पाय कल्पना बहु करी ।
कहैं चरणहींदास बुरी आशा धरी ॥
दो० जाल माहिं मोसुत फँसे, जाय परौं वा ठौर ।
विकल होय चाली तबै, कियो विचार न और ॥
अष्टपदी ॥
मोह फंद वश होय जाल माहीं परी ।
वाहू को गहि वधिक पिंजर माहीं धरी ॥
आयो बहुरि कपोत लख्यो सुत बालहूँ ।
इन बिन कैसे जिऊं मरौं बेहालहूँ ॥
३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परो जाल के माहिं बहुत दुख मानिकै ।
चारौ गहिलै चलो वधिक सुख जानिकै ॥
राजा मो मनहुतीं जु सुत दाराकरूं ।
निरखिलई यह सीख बहुरि नहिं चितधरूं ॥
वाकौ कीन्ह्यो गुरू चरित यह देखिकै ।
हरि सुमिरण से पगोरहूं जु विशेषिकै ॥
मोह महादुखरूप सकल बिसराइया ।
लिये रहूं वैराग परमसुख पाइया ॥
सदा रहूं निर्बंध दुःख सब भाजिया ।
चरण कमलको ध्यान हियेमें साजिया ॥
तहां बसौं निशिभोर अंत नहीं बहूं ।
चरणहिंदासा होयकै निज आनँद लहूं ॥
दो० नवां गुरू अजगरकियो, लियो परम संतोष ।
परलब्ध दृढ़ करि गही, रहा राग नहिं दोष ॥
अष्टपदी
जिहि कारण गुरु कियो कहूँ कारण सभी ।
जासों रहौं दृढ़बैठि भयो धीरज तभी ॥
आगे भिक्षा काज ध्यान तजि डोलतो ।
कोऊ देतो भीख कोउ दुर्बोलतो ॥
जो कोउ भोजन दियो मगन होतो तहां ।
जो कोउ नाहीं दियो क्रोध करतो तहां ॥
अजगर इकदिन लखो जहां उतपति भयो ।
निशिदिन ठांईं रह्यो कहूं नाहीं गयो ॥
आंय अचानक मृगा सिंह वा मुख धँसै ।
चौपाये यौं आय तासु मुखमें फँसै ॥
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७३
जो वह जागत होय उन्हें मुख सों गहै ।
तिनको भोजन करै उदर योंही भरै ॥
परालब्ध जो होय सोई ह्वां आरहै ।
परो रहै वहि ठौर सभी दुख सुख सहै ॥
वाकी लीनी रहनि बहुत सुखपाइया ।
चरणहिंदासा होय अधीर गँवाइया ॥
दो० जबसों पर आशा तजी, गृही द्वार नहिं जावँ ।
लगो रहौं हरि ध्यान में, सहज मिलै सो खावँ ॥
अष्टपदी ॥
मन राखौं प्रभु ध्यान सदा आनंदमें ।
ज्ञान दिशा अब भई रहो नहिं द्वन्दमें ॥
याचक घर घर फिरै न भिक्षा पावई ।
साधुनको वनमाहिं भोजन हरि ख्वावई ॥
जब भइ ऐसी समझ निचल बुधि आइया ।
जहँलग जिह्वा स्वाद सभी जु गँवाइया ॥
स्वादी अरु बिन स्वाद जो भोजन आवई ।
करि सब अंगीकार सुरुचि सों पावई ॥
सूखो गीलो होय जु भूनोहो कछू ।
ताको फेरौं नाहिं सभी लेकर भछूँ ॥
जो कछु आवै नाहिं ह्वांईं बैठो रहूँ ।
परालब्धही जानि बुरो भल ना कहूँ ॥
सकल बिकल नहिं होय न आशा कछु कहीं।
नारायण के ध्यान रहूँ लागो वहीं ॥
अजगर की सी वृत्ति निरी मेरे रही ।
२७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणहिंदासा होय भक्ति दृढ़करि गही ॥
दो० दशवें गुरु कियो सिन्धुको, कहूँ सोई परसंग ।
लीन्हे समझ बिचारिकै, जाके तीनों अंग ॥
अष्टपदी ॥
खारी नीर स्वभाव सदा इक रस वही ।
मीठी सरिता बहुत चली आवै बही ॥
मिलि नहिं फिरै स्वभाव तासु को जानिये ।
ऐसे विरकतरहै जगत में मानिये ॥
बहुतै होय गँभीर थाह नहिं पावई ।
ऐसा साधू जानि राम मन भावई ॥
वर्षाऋतुकी नदी रलैं बहु वादसों ।
घटै बढ़ वह नाहिं रहै मर्यादसों ॥
एकादश जो पतंग कहूँ मैं सुनायकै ।
देखि दीपकी ज्योति गिरैहै आयकै ॥
दीन्हो आप जराय हाथ कछु ना लगो ।
समुझि कामिनी रूप सो मैं दूरीभगो ॥
ज्ञान जाय अरु नरकपरै इस रीति को
सुन्दररूप निहारि करो मत प्रीति को ॥
दो० फूल फूलपर बैठिकै, उदर भरै तिस नाल ।
सो भवँरा गुरु बारवां, लई जू वाकी चाल ॥
अष्टपदी ॥
भिक्षा कारण मांगन घर घर जात हो ।
कोऊ देते आनि कोऊ जु रिसात हो ॥
ताते शिक्षा भवँर कि यह उरमें लही ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७५
सूक्ष्म सबही पुष्पसों उन रस मांगही ॥
तब में कियो विचार इकट्ठो लेनते ।
देनहार को दुःख बहुतही होत है ॥
नेक नेकही लेहु बहुत घरजायकै ।
उदर पूरणा करूं जु आनंद पायकै ॥
जितना होय अहार सोई अब लेत हौं ।
वासी नेक न राखि न काहू देत हौं ॥
अलिसुतकी यह रीति भूखभरि खावई ।
और दिना के काज न नेक वचावई ॥
फूलन को रस चाटि नहीं उनसों बँधै ।
ऐसे विरक्त रूप जगत में ना फँधै ॥
चरणहिंदासा होय त्याग मन राखई ।
राजा सों इहिभांति ऋषीश्वर भाखई ॥
दो० देखि दशा माँखीनकी, तजो सकल संग्रह ।
मिटिदुविधा निर्भयहुये, भई सुखारी देह ॥
अष्टपदी ॥
तेरह सहतकी माँखी ताहि पिछानियाँ ।
सब वृक्षनको मीठो इकठाँ आनियाँ ॥
जब छत्ता भयो पूर किसीने तोरिया ।
सब रस लीन्हो काढिकै वाहि मरोरिया ॥
बहुत भयो उन कष्ट जुवै भागी फिरीं ।
बहुत मरीं वहि ठावँ बहुत सिसकैं गिरीं ॥
ताते माँखी गुरू हिये माहीं धरो ।
कोउ जगकी वस्तुको संग्रह ना करो ॥
२७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौदह हाथी जानि काम वश होयकै ।
आपा आप बँधाय जन्म दियो खोयकै ॥
इक गज मातो हुतो जँगल के बीचही ।
अति बलवंत विशेषि कोऊ वा सम नहीं ॥
वा ढिग हस्ती और कोई नहिं जातहौ ।
मानुष पशुजिय योनि कहूं कह बातहौ ॥
वाकी आई बात जु राजापै चली ।
इक कुंजर वनमाहिं रहतहै अतिबली ॥
भूपति आज्ञादई पकरि वा लीजिये ।
जामें आवै हाथ यतन सोइ कीजिये ॥
दो० पीलवान आज्ञा लई, खोदी खंदक जाय ।
चरणदास तहाँ छल कियो, दीन्हीं घास बिछाय ॥
अष्टपदी ॥
भगल की हथिनि बनाय सँवारी बुद्धिसों ।
खंदक ऊपरधरी खरी करि शुद्धिसों ॥
जल पीवनके काज जु हस्ती आइया ।
वा हथिनीको देखिकै अधिक लोभाइया ॥
जब हथिनी की ओर चलो मतिहीनहीं ।
सपरश इच्छा धारि परो खंदकमहीं ॥
निकसन कैसे होय बहुत लंघन करे ।
अतिदुर्बल तन भयो पराक्रम सब हरे ॥
तब वापर चढ़ि बैठ महावत आयकै ।
बाहर लायो काढ़ि जु ताहि सधायकै ॥
फिर राजाके पास खड़ो कियो लायकै ।
मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २७७
अंकुश शिरके माहि जु बेड़ी पायँकै ॥
शीश धुनै पछिताय वै आनँद कितगये ।
जो सुख वनके माहिं सभी स्वप्ना भये ॥
सदाहुतो निर्बन्ध आय बंधन बँधो ।
कहैं चरणहींदास काम फंदन फँधो ॥
दो० सपरशकी इच्छा किये, भया जु ऐसा हाल ।
पशु पक्षी नर नारिही, फँसे कामके जाल ॥
अष्टपदी ॥
भाषत दत्तात्रेय जु साधूजन कभी ।
कामिनि ओर निहारि करै सपरश तभी ॥
हस्ती कैसो हाल साधुको होय है ।
सुमिरण ज्ञानरुध्यान जु सबही खोय है ॥
जो कहै हमहैं साधु जु कोई भार्या ।
चूमै हमरे चरण तासु होयहै कहा ॥
चरणन चूमै आय हाथ धरि पायँ पै ।
साधूमन चलिजाय स्पर्श सुख पायकै ॥
वाको सुख उरधारि करै इक कामिनी ।
वाते पुत्र कलत्र बहुतही यामिनी ॥
वनमें तप अरु योग जु करतो निशदिना ।
सो सबही गयो भूलि नहीं सुख इकछना ॥
ताते हस्ती गुरू हिये में धारिया ।
कामिनि को परसंग सकल निवारिया ॥
काठ कि पुतली होय कै कागज में रंची ।
चरणहिंदासाहोय सोभी देखन तजी ॥
॥७३॥