भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६७
जल अरु साधू भांति एक जानौ तहीं ॥
जो कुचील कछु होय सो जलसों धोइये ।
वाको कीजै शुद्ध मैल सब खोइये ॥
साधू ऐसा होय ज्ञान मुख उच्चरै ।
श्रोताके सब पाप ताप ब्याधा हरै ॥
तातेही उपदेश भक्तिका कीजिये ।
नीच ऊंच मतदेख वृक्ष ज्यों सींचिये ॥
मीठे शीतल नीरको यह गुण लीजिये ।
मीठा सबसों बोलि परमसुख दीजिये ॥
गुरु शुकदेव प्रतापसों जल गुण गाइया ।
चरणहिंदासा होय न मनता आइया ॥
दो० पंचमगुरुकियो अग्निको, समझ निहारि निहारि ।
उत्तम मध्यम जारदे, राखै कछुन विचारि ॥
अष्टपदी ॥
ब्राह्मणहूँ करै होम शूद्र जोपै करै ।
दोउपवित्र करि देइ दोऊ के अघ हरै ॥
ऐसे साधूलोग जहां भोजन करैं ।
वाको पावन करैं पाप सबही हरैं ॥
गृही जु सेवा करैं आश ऐसी धरै ।
विरकत भोजन किये पाप निश्चय जरै ॥
धान्य हमारी खाय जु साधूजन कभी ।
हमरे पाछतजाहिं और ब्याधा सभी ॥
साधूजन जो होय अग्नि के भांतिही ।
सकल पाप करै क्षार जु वाकी क्रांतिही ॥