भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सदा गुप्तही रहै प्रगट किये होत है ।
ऐसे साधूभेद छिपावै जोत है ॥
षष्ठहु गुरु कियो चंद सदा इक समवहै ।
कला घटै अरु बढ़ै मावस लगना रहै ॥
पूनोको सब होहिं कला भरपूरही ।
चांदनि सब जगमाहिं विराजत नूरही ॥
शशिमण्डल इकभांति रहै नाहीं घटै ।
योंही आतम रूप चरणदासा रटै ॥
दो० उतपति परलय देहको, घटै बढ़ दुख होय ।
आतम इकरस जानिये, अविनाशी है सोय ॥
अष्टपदी ॥
ताते कियो विचार ये काया ना रहै ।
जन्म मरणही होय कलाके ज्योंयहै ॥
परमातम इकभांति सदाही जानिये ।
घटै बढ़ै वह नाहिं यों मनमें आनिये ॥
कायाछोटी होय बड़ी पुनि होत है ।
कवहूँ हो मनमगन कबौं रोवै वहै ॥
आतमहीं नित जानि जु कायामें रहै ।
वही सदा इकभांति कोई ज्ञानी लहै ॥
ताते श्रीभगवानको सबठां पेखिकै ।
मनमाहीं गहिराखि फिरतहूँ भेखिकै ॥
सतवें गुरुकिया सूर जु शिच्छा दोलई ।
आठमहीने किरणि नीर सोखतवही ॥