भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ ः श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पायो आतमज्ञान सभी दुबिधा गई ॥
ना काहू से वैर नहीं कहुँ प्रीति है ।
ना काहू दुख देहुं नहीं सुख रीति है ॥
काहूसे नहिं डरूं न काहू सँग लगूं ।
काहु कि शरण न जावँ न काहूसे भगूं ॥
कहैं श्रीशुकदेव विवेक विचार सों ।
दत्तात्रेयी कह्यो यथा यदुराज सों ॥
यह शिक्षा आकाशसों लीन्हीं जानिकै ।
चरणहिंदासा भयो यही मत मानिकै ॥
दो० चौथे गुरु कियो नीरहीं, जाको सुनिय प्रसंग ।
आप महा उज्ज्वल रहै, मिलिजावै सब रंग ॥
अष्टपदी ॥
जल ज्यों निर्मल होय सदा विरकत वही ।
तजै न शीतल अंग बसै नितही मही ॥
गृही संग जो चलै बाट कबहूं कहीं ।
मनसों न्यारा रहै लेह लागै नहीं ॥
ऐसो रखै विचार यथा बरषा समै ।
जल मैला है जाय खेह सँगही रमै ॥
संगति गुण सों होय जु गँदला आपही ।
जाड़े में है शुद्ध लगै नहिं पापहीं ॥
समझो यों चितमाहिं संगको गुण यहै ।
निर्म्मल नीर स्वभाव सदा उज्ज्वल रहै ॥
संसारी के संगसों जब मन फिरगयो ।
तब नारायण रूप ध्यान आनँद लयो ॥
कछू मैल, मनमाहिं कबहूँ व्यापै नहीं ।