भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ ' श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वाको देखि स्वभाव यही मन आइया ।
चरणहिं दासा होय अंग उपजाइया ॥
दो० 'एक दिना इच्छा करी, भिक्षा मांगी जाय ।
अपनी श्रद्धा उन दियो, भोजन करमें लाय ॥
अष्टपदी ॥
वाकी अस्तुति नाहिं कछू मुखते कही ।
फिरि गयो दूजे द्वार दई भिक्षा नहीं ॥
जाकी निंदा नाहिं कछूक उचारिया ।
अस्तुति निन्दा त्याग यही जु विचारिया ॥
जिन कछु दीन्हो नाहिं नहीं औगुण धरो ।
जो कछु पहिले आयो सोई भोजन करो ॥
जो कहु अपने काज गयो भलि ठांवहीं ।
गिरहण कीन्हो नाहिं रंग नहिं लावहीं ॥
जो गयो भोंड़ी ठौर बुरो नहिं जानियां ।
आतमरूप सँभाल जहाँ मन आनियां ॥
सबही सों निर्लेप सबन के माहिंहूं ।
सहज भवन में आय सहज कहि जाहिंहूं ॥
परालब्ध जो पाय ताहि भोजन कियो ।
नातौ करि प्रणाम बैठि योंही रह्यो ॥
जिद्धालौहीं जान स्वाद भोजन सभी ।
इकसम सबही होयँ उदर जावैं जभी ॥
अब आयो सन्तोष कल्पना सब गई ।
चरणहिंदासा भयो जभी यह मति लई ॥