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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 300

मनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६३
सकल जीव ब्योसाय यही मनसा करी ॥
जो विरक्तसों काज कोई अपनो कहै।
वाको नाटै नाहिं सभी शिर पर सहै ॥
काहुको कछु काज जो काया सों सरै ।
यह शिक्षा भलिभांति वृक्षकी मनधरै ॥
तीजे शिक्षा और मही की धारिया ।
चरणहिंदासा होय अहूँ को मारिया ॥
दो० कोई खोदै नीवको, कोई खोदै कूप ।
अरु ऐसे कारज किये, ऐसो धरो स्वरूप ॥
अष्टपदी ॥
काहूको वह भलो बुरोहू ना कहै ।
ऐसे विरकत रहै सभी दुख सुख सहै ॥
हरि सुमिरण में मगन सदा आनँद रहै ।
भलो बुरो नहिं मान एकता दृढ़ गहै ॥
दूजे गुरु किंयो पवन सीख लह जासुकी ।
दोय भांति पहिंचान हिये धरि तासुकी ॥
इक दिन बाग के माहिं सहजही मैं गयो
देखन लाग्यों फूल जाय ठाढ़ो भयो ॥
पुष्पन सों लगि पवन वास मोहिं आइया ।
जबहीं कीन्हों ज्ञान बात सब पाइया ॥
वह तौ अतिहि सुगन्ध हरष उपजावई ।
फिर आई दुर्गन्ध बहुत अनखावई ॥
गन्धहि सों लगि पवन आप गन्धहि भई ।
पुनि आई बिन गन्ध शुद्ध निर्मल वही ॥
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